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Daily-current-affairs / 16 Jan 2022

राजनीति का अपराधीकरण - समसामयिकी लेख


राजनीति का अपराधीकरण - समसामयिकी लेख

प्रासंगिकता/ पाठ्यक्रम से सम्बद्धता कीवर्ड: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951, बाहुबल, लालफीताशाही, वोट बैंक की राजनीति, अंतर-दलीय लोकतंत्र, न्याय वितरण, विधि आयोग 244वीं रिपोर्ट, द्वितीय प्रशासनिक सुधार रिपोर्ट।

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से पुछा कि क्या केंद्र सरकार अपराधों के दोषी लोगों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने के पक्ष में है?
  • सरकार ने यह तर्क देते हुए विचार को ख़ारिज कर दिया कि सांसद तथा विधायक किसी विशिष्ट "सेवा शर्तो " में प्रतिबंधित नहीं होते अतः किसी अपराध में दोषी व्यक्ति को चुनाव लड़ने या किसी राजनीतिक दल के पदाधिकारी बनने पर आजीवन प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता।
  • सरकार ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अंतर्गत सजा की अवधि तथा सजा के उपरांत 6 बर्ष तक की अयोग्यता प्रतिनिधियों के लिए पर्याप्त दंड है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सांसदों/ विधायकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए मजिस्ट्रियल कोर्ट न बनाकर ऐसे मामलों को केवल सत्र न्यायालयों के ही क्षेत्राधिकार में रखकर उच्चतम न्यायालय के निर्णय की गलत व्याख्या की है।

राजनीति के अपराधीकरण के कारण :-

  • सफलता दर :- राजनीतिक दल उम्मीदवारों को उनकी जीत की क्षमता के आधार पर टिकट देते हैं। लोकसभा 2019 में घोषित आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार के जीतने की संभावना 15.5 फीसदी थी, जबकि साफ-सुथरी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार के लिए यह महज 4.7 फीसदी थी।
  • चुनाव में धनबल तथा बाहुबल का प्रयोग :- चुनावो में धनबल तथा बाहुबल के उपयोग से जीत की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के पास अक्सर बड़ी मात्रा में धनबल होता है, जो चुनाव में उनकी जीत सुनिश्चित करने में सहायक होता है।
  • एडीआर वेबसाइट के अनुसार, 2019 में विश्लेषण किए गए 539 उम्मीदवारों में से 43% ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामलो की पुष्टि की है। 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान जीते 542 सांसदों में से 185 (34 प्रतिशत) सांसदों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले की पुष्टि की थी, जबकि 2009 में लोकसभा चुनाव के में यह संख्या लगभग 30% थी।
  • भ्रष्टाचार और लालफीताशाही :- लालफीताशाही तथा सरकार व प्रशासन में भ्रष्टाचार की समस्या के कारण नौकरशाहों, राजनेताओं, पुलिस अधिकारियों, अपराधियों और कॉरपोरेट्स के बीच एक गठजोड़ विकसित हो चुका है। यह गठजोड़ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को राजनीति में प्रवेश करने में सहायता करता है।
  • विधि के शासन की कमजोरी तथा वोट बैंक की राजनीति :- विधि के शासन की कमजोरी ने पुलिस और नौकरशाही पर लोगों के विश्वास को कम कर दिया है।
  • जाति और धर्म आदि के आधार पर सामाजिक विभाजन, और सामाजिक तनाव के मामले में अधिकारियों द्वारा त्वरित कार्यवाही की असमर्थता से लोगों का लोकतान्त्रिक संस्थाओ के प्रति विश्वास में कमी होती है। इससे वोटबैंक (संप्रदाय आधारित ,जाति आधारित) की राजनीति करने वाले उम्मीदवारों की लोकप्रियता बढ़ती है तथा उनके निर्वाचन का मार्ग आसान हो जाता है।
  • पार्टी में लोकतंत्र का अभाव :- भारत में, पार्टी में लोकतंत्र की कमी है, तथा शीर्ष नेतृत्व चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर निर्णय लेता है। इस प्रकार आपराधिक रिकॉर्ड वाले राजनेता जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और पार्टी के संगठन की पक्रिया से परे हो जाते हैं।
  • दोषसिद्धि दर में कमी :- भारत में, आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसदों और विधायकों की दोषसिद्धि दर अत्यंत निम्न रही है। दोषसिद्धि का निम्न स्तर तथा न्याय में विलम्ब के कारण कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो पाती तथा राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट देते रहते हैं।
  • चुनाव आयोग की अक्षमता :- चुनाव आयोग नामांकन पत्र दाखिल करने वाले उम्मीदवारों से संपत्ति का विवरण, अदालतों में लंबित मामलों और शैक्षिक योग्यता और उम्मीदवारों के चुनावी खर्च के बारे में भी पूछता है। यद्यपि उम्मीदवार कई बार गलत जानकारी देते हैं, परन्तु चुनाव आयोग गलत जानकारी देने के पर इनके विरुद्ध किसी कार्यवाही को करने में असमर्थ है।

राजनीति के अपराधीकरण के प्रभाव

  • लोकतंत्र की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव :- आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सदस्यों की उपस्थिति संसद और राज्य विधानसभाओं के विधि निर्माण की शक्ति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। यह लोकतंत्र पर सेंध की तरह है तथा यह लोकतंत्र की गुणवत्ता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
  • न्याय प्रक्रिया में बाधक :- राजनीति का अपराधीकरण न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालता है तथा मामलो के निस्तारण में विलम्ब का कारण बनता है। अपराधी सत्ता में आने के बाद इसका दुरुपयोग करते हैं तथा अपने द्वारा किये गए अपराधों से स्वयं को मुक्त करा लेते हैं।
  • भ्रष्टाचार में वृद्धि :- राजनीति के अपराधीकरण से सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार में वृद्धि होती है। इससे अपराधी, राजनेता और नौकरशाही का गठजोड़ प्रभावी होता है। इन समस्त कारकों से राज्य की संस्थाए यथा विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका नकारात्मक रूप से प्रभावित होती हैं।
  • समाज में हिंसा को बढ़ावा :- राजनीति का अपराधीकरण समाज में हिंसा का प्रसार करता है। उदाहरणार्थ पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा के स्तर ने राज्य के युवाओं पर बुरा प्रभाव पड़ा।
  • चुनाव में धन बल वृद्धि :- राजनीति का अपराधीकरण चुनावी प्रक्रिया में अवैध धन के प्रवाह को बढ़ावा देता है तथा इससे जनता तथा राष्ट्र की सुरक्षा नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

राजनैतिक अपराधीकरण को रोकने के उपाय :-

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए :- निर्वाचन आचरण नियम, 1961 के अंतर्गत यह प्रावधान है कि- फॉर्म 26 में जानकारी छिपाने या गलत जानकारी प्रदान करने के लिए अधिनियम में संसोधन कर सजा को और कठोर करना चाहिए।

विधि आयोग की 244वीं रिपोर्ट में राजनैतिक अपराधीकरण को रोकने के लिए निम्नलिखित अनुशंसाएं की गई :-

  • एक मौजूदा सांसद और विधायक के विरुद्ध किसी मुक़दमे का निस्तारण 1 वर्ष में हो जाना चाहिए।
  • 5 वर्ष से अधिक सजा वाले लंबित आपराधिक आरोपों वाले सांसद या विधायकों को कुछ सुरक्षा उपायों के अधीन अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
  • धारा 125ए के तहत झूठा हलफनामा दाखिल करने पर 2 साल की सजा प्रावधान होना चाहिए।

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की अनुशंसाएं :-

  • जघन्य अपराधों और भ्रष्टाचार से संबंधित आरोपों का सामना कर रहे उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करने के लिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 में संशोधन करने की सिफारिश की।
  • चुनावी प्रचार के वित्तपोषण में और अधिक पारदर्शिता रखने की आवश्यकता है। इससे राजनैतिक दल अपराधियों को सम्मिलित करने में हतोत्साहित होंगे।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय :-

  • यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एंड एनआर केस, 2002 :- इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि प्रत्येक उम्मीदवार को शैक्षणिक योग्यता के साथ अपने आपराधिक और वित्तीय रिकॉर्ड घोषित करने होंगे।
  • रमेश दलाल बनाम भारत संघ का मामला, 2005-: इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक मौजूदा संसद सदस्य या राज्य विधान सभा के किसी भी सदस्य को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाएगा यदि उसके द्वारा किये गए अपराध के लिए 2 वर्ष से अधिक सजा का प्रावधान हो।
  • लिली थॉमस बनाम भारत संघ मामला, 2013:- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4) को असंवैधानिक घोषित किया। यह धारा दोषी विधायकों और सांसदों को तब तक पद पर बने रहने की अनुमति देती थी जब तक कि उनके विरुद्ध की गई अपील का निस्तारण नहीं हो जाता था। तदनुसार विधायक और सांसदों की दोषसिद्धि (2 या 2 से अधिक वर्षो की सजा पर) पर उन्हें अयोग्य घोषित किया जाने लगा। हालाँकि 2017 में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि यदि अपीलीय अदालत दोषसिद्धि पर रोक लगाती है, तो उस स्थिति में विधायकों तथा सांसदों को पद पर बने रहने की अनुमति दी जाएगी।

आगे की राह :-

  • राजनीति के अपराधीकरण तथा भ्रष्टाचार से लोकतंत्र की जड़े कमजोर होती हैं। आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों तथा समर्थन देने वाले राजनीतिक दलों के बारे में प्रचार-प्रसार कर जनता को जागरूक करना होगा।
  • राजनीतिक दलों के अभियान के वित्तपोषण में अधिक पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। राजनीतिक दलों को उनकी पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार के लिए सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में लाया जाना चाहिए।
  • संसद को राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण के निस्तारण के लिए विधि का निर्माण करना चाहिए तथा न्यायालय को अपनी न्याय प्रक्रिया को और अधिक तीव्र करने की आवश्यकता है।
  • इसके साथ ही विधि आयोग, चुनाव आयोग, द्वितीय प्रशासनिक सुधार रिपोर्ट के अनुशंसाओं तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को लागू करना चाहिए।

स्रोत:

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2
  • चुनाव और इसकी प्रक्रिया

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  • वर्तमान राजनीति, अपराधीकरण की समस्या से ग्रस्त है, इस संबंध में राजनीति के अपराधीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति, इसके कारणों और प्रभावों पर चर्चा कीजिये। यह भी बताएं कि राजनीति को विअपराधिकृत बनाने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं?

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