(Daily News Scan - DNS) विज्ञान आजकल: जीसैट 29 (GSLV Mk III - GSAT 29)


(विज्ञान आजकल) जीसैट 29 (GSLV Mk III - GSAT 29)


मुख्य बिंदु:

  • हाल ही में 14 नवंबर 2018 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने सतीश धवन स्पेस सेंटर से जीसैट 29 उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया है ।
  • इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है, जिसकी स्थापना साल 1969 में की गई थी ।
  • इसका प्रमुख कार्य भारत के उपयोग के लिए विशिष्ट उपग्रहों का निर्माण करना और उपकरणों के विकास में सहायता प्रदान करना है ।
  • इसरो विश्व की छठी सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसी है, जो कि भारत के प्रसारण संचार, आपदा प्रबंधन उपकरण, भौगोलिक सूचना प्रणाली, मानचित्रकला, मौसम पूर्वानुमान और दूर चिकित्सा संबंधी उपग्रह को अंतरिक्ष में स्थापित करने का काम करती है ।
  • यह एजेंसी प्रौद्योगिकी क्षमता को बढ़ाने के अलावा देश में विज्ञान एवं विज्ञान की शिक्षा के प्रसार में भी सहयोग करती है ।
  • जीसैट 29 उपग्रह को भू-स्थिर कक्षा में स्थापित किया गया है । भू-स्थिर कक्षा यानी जियोस्टेशनरी ऑर्बिट पृथ्वी से लगभग 36000 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित होती है ।
  • भू-स्थिर कक्षा में किसी उपग्रह को पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में 24 घंटे यानी पूरे 1 दिन का समय लगता है ।
  • 3423 किलोग्राम के वजन वाला जीसैट 29 उपग्रह भारत का अब तक का सबसे भारी उपग्रह है । इस उपग्रह को भू-स्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यानी यानी GSLV MARK 3 के द्वारा कक्षा में पहुंचाया गया ।
  • GSLV MARK 3 इसरो का एक Launch vehicle है ।
  • इसका निर्माण अंतरिक्ष में उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए किया जाता है ।
  • GSLV MARK 3 प्रक्षेपण यान में, क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किया जाता है जोकि 2 टन से अधिक भार के उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने की क्षमता रखता है ।
  • दरअसल GSLV में क्रायोजेनिक इंजन का प्रयोग होता है, जिसमें द्रव्य ईंधन को काफ़ी कम ताप पर भरा जाता है । इसी कारण GSLV प्रक्षेपण यान ज़्यादा भार के उपग्रहों को ले जाने में सक्षम होता है ।
  • 2014 के पहले जब भारत के पास क्रायोजेनिक इंजन प्रक्षेपण यान नहीं विकसित हुए थे, तब उस दौरान भारत अपने भारी वजन के उपग्रहों को भेजने के लिए रूस तथा यूरोपियन यूनियनों की मदद लेता था ।
  • लेकिन साल 2014 में क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण हो जाने के बाद भारत अब अपने भारी मात्रा वाले उपग्रहों को खुद से ही स्पेस सेंटर से भेजता है ।
  • जीसैट 29 सेटेलाइट में KU और KA बैण्ड के ट्रांसपोंडर्स का उपयोग होता है ।
  • ट्रांसपोंडर उपग्रह में प्रयोग किए जाने वाला एक ऐसा उपकरण है जिसके माध्यम से वेव सिगनल्स को प्राप्त कर उसे वापस पृथ्वी की ओर प्रसारित किया जाता है ।
  • Ku बैण्ड का इस्तेमाल मुख्य रूप से सेटेलाइट कम्युनिकेशन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें 12 से 18 गीगाहर्टज़ की फ्रीक्वेंसी शामिल होती है ।
  • इन बैण्डों में अधिक फ्रीक्वेंसी होने के कारण इनकी Wave Length काफ़ी कम होती है , इसलिए इनके डेटा रिसीव करनें में अपेक्षाकृत छोटे डिश की ज़रूरत होती है ।
  • इन बैण्डों का इस्तेमाल टेलीविजन पर सीधा प्रसारण करने के लिए भी किया जाता है ।
  • जबकि अंतरिक्ष उपकरण में लगा Ka बैण्ड इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम के Micro wave पार्ट से जुड़ा होता है, जिसमें 26 से 40 गीगाहर्टज़ की फ्रीक्वेंसी शामिल होती है ।
  • इन बैंडों का इस्तेमाल वाहनों की गति नापनें, सुरक्षा संबंधी कार्यों में सहयोग करनें और Space Communication को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है ।
  • जीसैट-29 के सफल प्रक्षेपण के बाद इसरो ने अपने आधिकारिक वेबसाइट के एक संदेश में बताया कि जीसैट-29 के लॉन्च होने के बाद डाटा हस्तांतरण में तेज़ी आएगी और इसके साथ ही ये पूर्वोत्तर और जम्मू कश्मीर जैसे भारत के दूर दराज इलाकों में भी संचार की ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करेगी ।
  • GSLV अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है । क्योंकि इस सफलता के बाद राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो 4 टन तक के भारी प्रक्षेपण के लिए भी अब तैयार हो जाएगी ।
  • इसरो की व्यापारिक विपणन शाखा एंट्रिक्स के नज़रिए से भी जीसैट 29 काफ़ी महत्वपूर्ण रहेगा ।
  • इस सफलता के बाद इसरो अब अपने अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को अंतरिक्ष उत्पाद, तकनीकी परामर्श और अपने प्रौद्योगिकियों को मज़बूती से पेश कर सकेगा ।
  • इससे पहले भी भारत यूरोप और मध्य पूर्वी दक्षिण व दक्षिण पूर्वी कई प्रमुख एशियाई देशों को अंतरिक्ष संबंधी सेवाएं उपलब्ध कराता रहा है ।
  • जीसैट 29 के सफल प्रक्षेपण के बाद न सिर्फ संचार की गुणवत्ता में बढ़ोतरी होगी बल्कि ये हमारे सैन्य एवं सुरक्षा के नज़रिए से भी काफ़ी अहम साबित होगी ।