(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 (Worship Place (Special Provision) Act 1991)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 (Worship Place (Special Provision) Act 1991)


बीते 9 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित अयोध्या मामले में अपना फैसला सुना दिया। अपने निर्णय में, अदालत ने विवादित जमीन रामलला विराजमान को देने की बात कही। इस तरह सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद भारत के सबसे बड़े धार्मिक और कानूनी विवाद पर विराम लगने की उम्मीद जगी है। हालांकि इस मामले में कुछ पक्षकार समीक्षा याचिका दायर करने की भी बात कह रहे हैं। बहरहाल इस मामले में आगे क्या होगा यह बात और है लेकिन मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत ही अहम कानून का जिक्र किया जिसका नाम है पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991।

डीएनएस में आज हम आपको पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के बारे में बताएँगे और साथ ही इसके दूसरे पहलुओं को भी समझने की कोशिश करेंगे।

दरअसल 1990 के दशक के शुरुआती सालों में भारत की राजनीति एक नया मोड़ ले रही थी। इस दौरान राजनीति पर सांप्रदायिकता का रंग और भारत के सामाजिक ताने-बाने की दशा और दिशा दोनों बदल रही थी। अयोध्या मामला पूरी तरह से तूल पकड़ चुका था। साथ ही, काशी और मथुरा जैसे कई धार्मिक स्थल ऐसे थे जहां पर अयोध्या विवाद जैसी स्थिति बन रही थी। इनमें बनारस का ज्ञानवापी मस्जिद विवाद और मथुरा का ईदगाह मस्जिद विवाद शामिल था।

ऐसे में, मौके की नज़ाकत को भांपते हुए केंद्र की तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने एक नया कानून लाने की योजना बनाई। 11 जुलाई, 1991 को लागू हुए इस कानून का नाम पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 रखा गया। अंग्रेजी में इस कानून का शीर्षक प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 1991 है। इस कानून को लाने का मकसद था कि मस्जिदों और मंदिरों के जरिए जो सांप्रदायिक विवाद उभर कर सामने आ रहे थे, उन पर लगाम लगाई जा सके। हालांकि जब इस कानून को लाया गया था तब तक बाबरी विध्वंस की घटना नहीं हुई थी, लेकिन शायद केंद्र सरकार को इसका भान हो चुका था और इसीलिए एहतियातन इस कानून को लाया गया था।

इस कानून का जो सबसे प्रमुख प्रावधान था वह यह कि 15 अगस्त 1947 को भारत में विद्यमान पूजा स्थलों पर जिस कौम या संप्रदाय का हक था वह यथावत बना रहेगा। यानी इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि उस पूजा स्थल को किसी मंदिर या मस्जिद को तोड़कर बनाया गया था या उस पर कितने लंबे समय से किसी समुदाय विशेष का अधिकार था। बस 15 अगस्त 1947 को जो पूजा स्थल जिस भी समुदाय का था वह उसी का है और आगे भी बना रहेगा। हालांकि उस दौरान अयोध्या मामले को इस कानून की जद से बाहर रखा गया था। शायद इसके पीछे कारण यह था कि जब तक यह कानून बना तब तक अयोध्या मामला पूरी तरह से जनमानस के बीच तूल पकड़ चुका था।

यहां यह बताना दिलचस्प होगा कि पिछले साल 2018 में एक मुस्लिम संगठन ने इस इस कानून का विरोध किया था। इस संगठन का तर्क था कि अगर हम विवाद सुलझाने या अवैध तरीके से किसी मस्जिद को हिंदू समुदाय को वापस करना चाहे तो इस कानून के चलते वापस नहीं कर पाएंगे। और इस तरह पूजा स्थलों को लेकर दो समुदायों के बीच विवाद लंबा चलता रहेगा।

बहरहाल अयोध्या मामले में अपनी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के बारे में सकारात्मक बात कही है। बकौल सुप्रीम कोर्ट "देश ने इस एक्ट को लागू करके संवैधानिक प्रतिबद्धता को मजबूत करने और सभी धर्मों को समान मानने और सेक्युलरिज्म को बनाए रखने की पहल की है।" इस तरह सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात का पूरी तरह से संकेत दे दिया है कि देश में अब मंदिर मस्जिद को लेकर और विवाद नहीं होने चाहिए। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के इस वक्तव्य के बाद देश में संवैधानिक मूल्य और सेकुलरिज्म को बढ़ावा मिलेगा।