(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) कुवैत से भारतीयों का निर्वासन क्यों? (Why are Indians being sent back from Kuwait?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी)  कुवैत से भारतीयों का निर्वासन क्यों? (Why are Indians being sent back from Kuwait?)



हम सब इस बात से वाकिफ है की COVID- 19 महामारी के कारण वैश्विक अर्थवयवस्था की हालात कुछ ख़ास अच्छी नही है....ऐसे में अर्थव्यवस्था को सम्भालने के लिए हर मुमकिन कोशिश की जा रही है....जहाँ खाड़ी देशों में रोज़गार को लेकर बहुत बड़ा बदलाव देखा जाने वाला है....covid 19 सदमे से उभरने के लिए कुछ कानून भी बनाये गये है और कुछ बदलाव भी हुए.....इन बदलाओं से देश के बाहर भारितियों की स्थिति एक चिंता का विषय बन सकती है.....क्या होगा अगर खाड़ी देशों में बसे भारतियों को वापस लौटना पड़ा.....

आज DNS कार्यक्रम में हम बात करेंगे पूरे Gulf States में कठिन स्थितियों में घिरे भारतीयों के बारे में...साथ ही समझें कि क्या दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी पलायन नज़र आने वाला है...

COVID-19 महामारी की मार के बाद अर्थवयवस्था को संभालने के लिए खाड़ी देशों में रोज़गार को लेकर बहुत बड़ा बदलाव देखा जाने वाला है.....जून में हज़ारों प्रवासी इन देशों से अपने घर लौटे थे.... ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि श्रम के बाज़ार में रोज़गार के लिए स्वदेशियों को तरजीह दिए जाने वाले प्रावधान बनाए गए...

वहीँ हाल ही में कुवैत ने प्रवासी कोटा बिल यानी Expat Quota Bill मंज़ूर किया है, जिसके बाद संभावना है कि करीब 8 लाख भारतीयों को वहां से लौटना होगा.....कुवैत, कतर, बहरीन, UAE और सऊदी अरब जैसे देशों में बाहरी आबादी अत्यधिक रही है.....इंटरनेशनल लेबर संस्था ILO के मुताबिक सऊदी की कुल आबादी करीब साढ़े तीन करोड़ है जिसमें से साढ़े दस करोड़ विदेशी हैं....वहीँ सऊदी अरब और यूएई में विदेशी प्रवासियों की आबादी दुनिया में तीसरी और पांचवी सबसे बड़ी प्रवासी आबादी है और ये माइग्रेंट गल्फ देशों के साथ ही अपने देशों के लिए अर्थव्यवस्था के अहम हिस्से रहे हैं......

खाड़ी देशों में भारतीय समुदाय का सामाजिक और आर्थिक महत्व रहा है...एक अनुमान के मुताबिक भारतीय समुदाय के तीन करोड़ दस लाख से ज़्यादा लोग दुनिया के 134 चौतीस देशों में बसे हुए हैं....इनमें से 80 लाख से ज़्यादा भारतीय खाड़ी देशों में हैं....इतनी बड़ी संख्या में इस क्षेत्र में बसे भारतीयों के कारण भारत के खाड़ी देशों से बेहतर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रिश्ते रहे हैं और समय के साथ मज़बूत होते गए हैं...

प्रवासी भारतीयों की खाड़ी में इतनी तादाद को भारत के राजनीतिक दर्शन में तो जगह हासिल है ही, भारत की विदेश नीति में भी इन प्रवासियों को सॉफ्ट पावर के तौर पर देखा जाता है. हालांकि 1950 और 1960 के दशक में ऐसा नहीं था, लेकिन 1970 के दशक से बदलाव शुरू हुआ. अब तो भारत नीतिगत तौर पर अपने मूल के लोगों के प्रवासियों को लेकर एक्टिव रहता है. इन प्रवासी भारतीयों को भारत में वोट करने तक के अधिकार दिए जा चुके हैं. इसका सबसे बड़ा कारण इस समुदाय से जुड़ी भारी अर्थव्यवस्था है.

भारत सहित कई विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का काफी महत्व है क्योंकि इससे जीडीपी विकास दर सीधे तौर पर जुड़ी हुई है. साल 2018 में दुनिया के जिस देश को विदेशों से भेजा गया धन सबसे ज़्यादा मिला, 79 उनासी अरब डॉलर के साथ वह देश भारत ही था. सऊदी अरब से 11.2 अरब डॉलर, कुवैत से 4.6, कतर से 4.1, ओमान से 3.3 और यूएई से 13.8 अरब डॉलर भारत भेजे गए थे.

खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर

अपने देश के लोगों को रोज़गार और बेहतर आर्थिक अवसर मुहैया कराने के लिए खाड़ी देशों में विदेशियों की संख्या कम किए जाने संबंधी कानूनों को लेकर कहा जा रहा है कि इससे इन देशों में रोज़गार में गिरावट आएगी. ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की एक रिसर्च में कहा गया कि प्रवासियों के इतनी बड़ी तादाद में खाड़ी देशों से जाने पर 13 फीसदी रोज़गार गिरावट होगी, इसका मतलब होगा कि सऊदी अरब में ही करीब 17 लाख रोज़गार कम होंगे.

अरब के खाड़ी देशों में बहुसंख्या में रहने वाले भारतीय, पाकिस्तानी, मिस्री और फिलीपीनी प्रवासी तेज़ी से अपने घरों को लौट रहे हैं. एक इन्वेस्टमेंट कंपनी का अनुमान है कि इस साल सऊदी अरब से ही करीब 12 लाख विदेशी वर्कर चले जाएंगे. अब हालात ये हैं कि कुवैत समेत खाड़ी देशों के कानूनी हालात पर भारतीय दूतावास लगातार नज़र रखे हैं और बातचीत चल रही है. हालांकि इस स्थिति पर भारत की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है...ऐसे में यह कहना की खाड़ी देशों से भारतीयों की स्वदेश वापसी से भारत की अर्थवयवस्था पर फर्क पद सकता है गलत नही होगा....