(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) कमज़ोर होता पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र (Weakening of Earth's Magnetic Field)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) कमज़ोर होता पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र (Weakening of Earth's Magnetic Field)



यह एक ऐसा दौर जब पूरी दुनिया कोरोना जैसी वैश्विक महामारी की गिरफ्त में है....लोग अपने घरों में सिमटे हुए हैं…कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं ध्वस्त हो चुकी है….दुनिया वैश्विक मंदी की कगार पर खड़ी है। इन्ही सब चिंताओं के मद्देनज़र एक और मसला है जिसने दुनिया के सारे वैज्ञानिको और भूगर्भशास्त्रियों के माथे पर बल ला दिया है।

ये समस्या है धरती के चुम्बकीय क्षेत्र के एक भाग का तेज़ी से कमज़ोर होना। हालांकि इसकी वजह क्या है इसके बारे में कोई सटीक जानकारी मौजूद नहीं है। वैज्ञानिकों को जो उपग्रह के आंकड़े मिले हैं उनसे ये पता चला है की अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के बीच चुम्बकीय क्षेत्र कमज़ोर हो रहा है..

वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र को दक्षिण अटलांटिक विषमता या साउथ अटलांटिक अनोमली कहा है। यह विषमता क्षेत्र हाल के कुछ सालों में चौड़ाई में बढ़ा है। चुंबकीय क्षेत्र में यह बदलाव महज़ 5 साल के भीतर हुआ है

वैज्ञानिकों का मानना है कि धरती के ध्रुवों में बदलाव (Earth Magnetic Field Reversal) की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

क्यों कमज़ोर हो रहा है पृथ्वी का चुम्ब्कीय क्षेत्र और इससे क्या बदलाव आएंगे धरती पर इन्ही सब वजहों की पड़ताल आज हम DNS में करेंगे

इससे पहले हम धरती के चुम्बकीय क्षेत्र कमज़ोर होने की वजह की पड़ताल करें सबसे पहले ये जानते हैं की पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र क्या होता है और कैसे बनता है...दरसल में पृथ्वी के गर्भ में लोहा , निकिल, मैग्नीज़ समेत कई हल्की और भारी धातुएं मौजूद हैं। लेकिन ये सारी धातुए बाहरी कोर में पिघले हुए रूप में मौजूद हैं..

पृथ्वी के बाहरी कोर में पिघली धातु के बहाव से विद्युत् धाराएं या इलेक्ट्रिक करंट पैदा होती है.. जैसा की हम जानते हैं की पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती रहती है...पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने की वजह से इन धाराओं से चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण होता है।

यही चुम्ब्कीय क्षेत्र पृथ्वी के चारों ओर मौजूद रहती है। पृथ्वी के केंद्र में बनने वाले चुम्बकीय क्षेत्र की वजह से ही कंपास हमेशा उत्तर दिशा की ओर संकेत करता है और यही चुम्बकीय क्षेत्र धरती को खतरनाक सौर हवाओं से बचाता है..

क्‍यों जरूरी है पृथ्‍वी का चुंबकीय क्षेत्र

पृथ्‍वी का चुंबकीय क्षेत्र जीवन के लिए एक रक्षा कवच की तरह से है। माना जाता है कि पृथ्वी का चुम्बकीय बल एक भीमकाय छड़ चुम्बक सरीखा है। ‘भौगोलिक उत्तर दक्षिण ध्रुवों’ के अतिरिक्त पृथ्वी में एक और जोड़ी ध्रुव ‘उत्तर और दक्षिण चुम्बकीय ध्रुव’ मौजूद हैं।

यह क्षेत्र धरती पर आने वाले सूर्य के आवेशित कणों को मोड़ देता है। चुंबकीय क्षेत्र के बिना सूर्य की आवेशित कण ओजोन परत को भेदकर धरती पर आ जाएंगे। इससे यूवी रेड़ीएशन का खतरा बढ़ जाएगा...ये चुंबकीय क्षेत्र ही है जिसकी वजह से पृथ्‍वी अंतरिक्ष से आने वाले ख़तरनाक विकिरणों से बच पाती है...

इसके साथ ही सूरज के ज़रिये आने वाले आवेशित कणों या Charged Particles से बचने में भी पृथ्वी का चुम्ब्कीय क्षेत्र ही हमारी मदद करता है...लेकिन इसी चुंबकीय क्षेत्र के कमजोर पड़ने की वजह से धरती का वज़ूद खतरे में आने लगा है..

अफ्रीका-लैटिन अमेरिका के बीच कमजोर हो रहा पृथ्‍वी का चुंबकीय क्षेत्र, अंतरिक्ष में संकट

पृथ्‍वी का चुंबकीय क्षेत्र अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका (Africa and South America) महाद्वीप के बीच में तेजी से कमजोर पड़ रहा है। इसे दक्षिण अटलांटिक विषमता या साउथ अटलांटिक अनोमली कहा जा रहा है। चुंबकीय क्षेत्र में यह बदलाव महज़ 5 साल के भीतर हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्‍वी के ध्रुवों में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

वैज्ञानिकों का कहना है की बीते हुए कुछ सालों से चुंबकीय क्षेत्र में कमी आ रही है....आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले 200 सालों में चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता में 9 प्रतिशत की कमी आई है। लेकिन यह कमी भी धरती के कुछ हिस्सों में ज़्यादा है और कुछ हिस्सों में कम। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के बीच काफी बड़े हिस्‍से में चुंबकीय क्षेत्र में ज्‍यादा कमी आई है।

वैज्ञानिकों का मानना है की पृथ्वी के ध्रुवों में बदलाव अचानक से नहीं हो जाता है बल्कि यह प्रक्रिया धीरे धीरे चलती है । धरती पर ध्रुवों के बदलाव का यह सिलसिला हर 2,50,000 साल में होता है।

उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों पर मंडराया गंभीर संकट

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी वर्ष 2013 से पृथ्‍वी के चुंबकीय क्षेत्र का अध्‍ययन कर रही है। इस मिशन में तीन सैटलाइट लगे हुए हैं जो उच्‍च गुणवत्‍ता के आंकड़े मुहैया कराते हैं..जर्मन शोधकर्ता जुरगेन मटज्‍का ने कहा कि दक्षिण अटलांटिक विषमता पिछले दशक में सामने आई और अब यह बहुत तेजी से बढ़ रही है। हम भाग्‍यशाली हैं कि अंतरिक्ष में स्‍वार्म सैटलाइट हैं जो दक्षिण अटलांटिक विषमता के बारे में जांच करते हैं और आंकड़े बताते हैं।

चुंबकीय क्षेत्र के कमजोर होने से धरती पर कई बदलाव देखे जा सकते हैं। इन बदलावों में सबसे ज़्यादा नुक्सान उपग्रहों या सॅटॅलाइट पर पडेगा। धरती पर चुम्बकीय क्षेत्र कमज़ोर होने की वजह से अंतरिक्ष से आने वाली विकिरणों में मौजूद आवेशित कण उपग्रहों के काम पर असर डाल सकते है। इससे उपकरणों के खराब होने का भी खतरा है। हालांकि अभी वैज्ञानिक यह नहीं बता पा रहे हैं की इससे पड़ने वाला असर कितना व्यापक होगा, लेकिन उनका मानना है कि यह निश्चित है कि सबसे पहले उपग्रहों पर ही असर हो सकता है...