(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) मृदा स्वस्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) मृदा स्वस्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme)


भारत की आधी से ज़्यादा आबादी गावों में रहती है और कृषि भारत की अर्थव्यस्था की धुरी होने के साथ साथ ही भारत की ज़्यादातर आबादी के लिए रोज़गार का साधन भी मुहैया कराती है । किसानों के लिए उनकी ज़मीन का उपजाऊ होना बेहद ज़रूरी है और ज़मीन की अच्छी सेहत के लिए ज़रूरी है की किसान को ज़मीन में इस्तेमाल होने वाले पोषक तत्वों की पूरी जानकारी हो ।मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी नहीं होगी तो किसान की फसल पर भी असर पड़ सकता है ।किसानों की इसी ज़रुरत को देखते हुए 19 फरवरी 2015 को राजस्थान के श्रीगंगा नगर के सूरत गढ़ से देश के किसानों के लिए मृदा स्वास्थय कार्ड या सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम की शुरुआत की । इस योजना की थीम है: स्वस्थ धरा, खेत हरा। इस योजना के तहत ग्रामीण युवा एवं किसान जिनकी उम्र 40 साल तक है, मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना एवं नमूना परीक्षण कर सकते हैं। प्रयोगशाला स्थापित करने में 5 लाख रूपए तक का खर्च आता हैं, जिसका 75 प्रतिशत केंद्र एवं राज्य सरकार वहन करती है। स्वयं सहायता समूह, कृषक सहकारी समितियाँ, कृषक समूह या कृषक उत्पादक संगठनों के लिये भी यहीं प्रावधान है। योजना के तहत मृदा की स्थिति का आकलन नियमित रूप से राज्य सरकारों द्वारा हर 2 वर्ष में किया जाता है, ताकि पोषक तत्त्वों की कमी की पहचान के साथ ही सुधार लागू हो सकें।

मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना हेतु इस योजना के तहत राज्यों के लिये अब तक 429 नई स्टेटिक लैब (Static Labs), 102 नई मोबाइल लैब (Mobile Labs), 8752 मिनी लैब (Mini Labs), 1562 ग्रामस्तरीय प्रयोगशालाओं की स्थापना और 800 मौजूदा प्रयोगशालाओं के सुदृढ़ीकरण को मंज़ूरी दी गई हैं।

योजना के तहत मृदा की स्थिति का आकलन नियमित रूप से राज्य सरकारों द्वारा हर 2 वर्ष में किया जाता है, ताकि पोषक तत्त्वों की कमी की पहचान के साथ ही सुधार लागू हो सकें।

इस योजना में किसानों को एक कार्ड दिया जाता है जिसमे उनकी खेत की मिट्टी की पूरी जानकारी लिखी होती है जैसे उनके खेतों में किस पोषक तत्व की कितनी कितनी मात्रा है और उन्हें कौन से उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए । हर किसान को ये मृदा स्वास्थय कार्ड हर 3 साल पर दिया जाता है ।आंकड़ों पर अगर गौर करें तो मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के दूसरे चरण में बीते दो साल के दौरान 11।69 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड किसानों में बांटे गए हैं। मृदा स्वास्थय कार्ड के इस्तेमाल से रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल में 8 से 10 फीसदी की कमी आई है।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के मुताबिक़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड से किसानों को मिट्टी की सेहत के पैरामीटर जानने में मदद मिली है। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों के सही इस्तेमाल से इसकी उर्वरा शक्ति में सुधार हुआ है। नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल (एनपीसी) के सर्वेक्षण से ये पता चला है की मृदा स्वास्थ्य कार्ड के सुझावों पर अमल करने से रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल में 8 से 10 फीसदी की कमी आई है।

गौर तलब है की केंद्र सरकार की मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के पहले चरण (वर्ष 2015-2017) के दौरान किसानों को 10।74 करोड़ कार्ड बांटे गए, जबकि दूसरे चरण (2017-19) के दौरान 11।69 करोड़ कार्ड बांटे गए हैं।

कृषि मंत्रालय ने बताया कि चालू वित्तवर्ष में आदर्श ग्राम विकास का एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इसके तहत किसानों की साझेदारी में कृषि योग्य भूमि के नमूने लेकर उसकी जांच पड़ताल करने के कार्यक्रम को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इस परियोजना के तहत मिट्टी के नमूनों का संग्रह करने और प्रत्येक कृषि जोत भूमि का विश्लेषण करने के लिए आदर्श ग्राम का चयन किया गया है।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना किसानों के लिये वरदान के रूप में साबित हो रही है। इतना ही नहीं इसने ग्रामीण युवाओं के लिये रोज़गार भी मुहैया कराने में मदद की है । इस कार्ड के ज़रिये किसानों को अपनी ज़मीन की सेहत जानने और उसमे उर्वरकों के इस्तेमाल को लेकर मदद मिलती है। मिट्टी की सेहत और खाद के बारे में सही जानकारी न होने के चलते किसान आम तौर पर नाइट्रोजन का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, जो न सिर्फ कृषि उपजों की गुणवत्ता के लिये खतरनाक है बल्कि इससे भूमिगत जल में नाइट्रेट की मात्रा भी बढ़ जाती है। इससे पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं। मृदा स्वास्थ्य कार्ड इस्तेमाल करके इन समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है।