(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) बढ़ता वैश्विक तापमान (Rising Global Temperature)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) बढ़ता वैश्विक तापमान (Rising Global Temperature)



पर्यवरण में हो रहे बदलाव..और पृथ्वी पर मंडराता संकट....ऐसे में विश्व मौसम विज्ञान संगठन की और आये कुछ आंकड़े चिंता का विषय है... .

आज DNS कर्यक्रम में चलिए जानते है.... Global Annual to Decadal Climate Update रिपोर्ट के बारे में आने वाले सालों में कैसे बढेगा धरती का तापमान...और कैसे विश्‍व का तापमान बढ़ने की वजह से क्‍लाइमेट चेंज को लेकर बनाए गए लक्ष्‍यों को पूरा करना मुश्किल है....और एक नज़र पेरिस समझोते पर.

वैश्विक समझौते के तहत दुनिया के देशों ने दीर्घकालीन औसत तापमान वृद्धि को पूर्व औद्योगिक स्तरों से 1.5-2 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित करने का लक्ष्य निर्धारित किया था. इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया लंबी अवधि की तापमान वृद्धि सीमा 1.5 डिग्री को पार कर जाएगी. तापमान के इस स्तर को वैज्ञानिकों ने विनाशकारी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचने के लिए निर्धारित किया है.

आने वाले पांच वर्षों में वार्षिक वैश्विक तापमान, पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में कम से कम 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की आशंका है.... इसकी वजह से वैश्विक जलवायु परिवर्तन के लक्ष्य खटाई में पड़ सकते हैं। ये आशंका विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के नए आंकड़ों के सामने आने के बाद जताई गई है। यूएन एजेंसी की जिनेवा में जारी रिपोर्ट - Global Annual to Decadal Climate Update में ये पूर्वानुमान लगाया गया है कि वर्ष 2024 तक किसी एक वर्ष के दौरान, तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ सकता है...

डब्ल्यूएमओ के सचिव पेटेरि तालस कहते हैं यह तापमान के बढ़ने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। यह उस विशाल चुनौती को रेखांकित करता है जिसकी वजह से देशों ने पेरिस समझौते के तहत वैश्विक तापमान को 2 डिग्री के भीतर सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। इसी समझौते के तहत देशों को ग्रीन हाउस गैसों में कटौती करने के लिए कहा गया था।

पेरिस जलवायु समझौता मूल रूप से वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने से जुड़ा है। साथ ही यह समझौता सभी देशों को वैश्विक तापमान बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रखने की कोशिश करने के लिए भी कहता है। तभी जलवायु परिवर्तन के खतरनाक प्रभावों से बचा जा सकता है।

डब्ल्यूएमओ का कहना है कि 20 फीसदी संभावना है कि औसत सालाना तापमान 1.5 डिग्री के स्तर को साल 2020-2024 के बीच कभी भी छू लेगा। इस बीच, उन वर्षों में से प्रत्येक में पूर्व-औद्योगिक स्तरों से कम से कम 1 डिग्री ऊपर होने की "संभावना" है। लगभग हर क्षेत्र इसका प्रभाव महसूस करेगा।

डब्ल्यूएमओ के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जहां पिछले साल जंगलों में आग लगी थी और सैकड़ों एकड़ की भूमि बर्बाद हो गई थी, शायद वहां सामान्य से अधिक सूखा होगा। जबकि अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में बहुत बरसात हो सकती है। वहीं यूरोप में और अधिक तूफान आएंगे तो उत्तरी अटलांटिक में तेज गति में हवाएं चलेंगी।

दरअसल यह तापमान, बारिश और हवा के पैटर्न की अल्पकालीन अवधि के पूर्वानुमान मुहैया कराने के लिए डब्ल्यूएमओ के नए प्रयास का हिस्सा है। इसके जरिए देशों को यह जानने में मदद मिलेगी कि कैसे जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में बदलाव हो रहा है। हालांकि, दुनिया शायद दीर्घकालीन 1.5 डिग्री तापमान वृद्धि के स्तर को अगले एक दशक तक कम से कम नहीं छू पाएगी लेकिन डब्ल्यूएमओ की कोशिश है कि वह छोटी अविध की भविष्यवाणी देकर देशों को बड़े विनाश से बचा सके।

जलवायु परिवर्तन की वजह से लगातार ग्लेशियरों के पिघलने की घटनाएं आती रहती हैं। शोधकर्ताओं ने ग्लेशियरों पर पड़ रहे प्रभाव और बर्फ पिघलने की दर आदि पर तमाम अध्ययन किए हैं। लेकिन, पहली बार नदियों में जमने वाली बर्फ पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन किया गया है।

शोधकर्ताओं ने बताया है कि वैश्विक तापमान में एक प्रतिशत की बढ़ोतरी होने से नदियों में प्रत्येक वर्ष जमने वाली बर्फ छह दिन पहले ही पिघल जाएगी। इसके पर्यावरणीय प्रभाव के साथ ही आर्थिक प्रभाव भी देखने को मिलेंगे। नेचर जर्नल में इस अध्ययन को प्रकाशित किया गया है।