(Daily News Scan - DNS) जम्मू कश्मीर में पंचायत चुनाव (Local Body Polls In Jammu and Kashmir)


(Daily News Scan - DNS) जम्मू कश्मीर में पंचायत चुनाव (Local Body Polls In Jammu and Kashmir)


मुख्य बिंदु:

  • पिछले दिनों जम्मू- कश्मीर में संपन्न हुए 'शहरी निकाय चुनावों के बाद अब वहां पंचायत चुनावों की भी शुरुआत हो गई है।
  • ये चुनाव 9 चरणों में संपन्न कराए जाएंगे। जिनमें से अभी तक दो चरणों के मतदान और नतीज़े सामने आ चुके हैं।
  • जम्मू- कश्मीर में आखिरी बार पंचायती चुनाव-2011 में हुए थे, जिसके बाद से साल-2016 में पंचायतों का कार्यकाल खत्म हो जाने के बाद से कोई चुनाव नहीं कराये गए।
  • पंचायती राजव्यवस्था से जुड़े ये चुनाव साल 1992 में हुए संविधान के 73वें संशोधन से संबंधित है।
  • जिसमें संविधान के भाग-9 के अंतर्गत अनुसूची 11 को जोड़ा गया है। पंचायती राजव्यवस्था राज्य सूची का विषय है, इसलिए इन चुनावों से संबंधित सभी फ़ैसलों का अधिकार राज्यों के पास ही होता है।
  • पंचायती राज की स्थापना तीन स्तर पर चुनाव कराने के लिए गई थी जिनमें जिला स्तर, खण्ड स्तर और ग्राम स्तर शामिल होते हैं।
  • पंचायत चुनावों की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की होती है, जिसमें निर्वाचन नामावली का निर्माण करना, चुनावों पर नियंत्रण रखना और निगरानी करने का काम सौंपा जाता है।
  • पंचायती राज से संबंधित 73वें संशोधन में राज्य वित्त आयोग का भी गठन किया था।
  • इस आयोग का काम पंचायतों को सहायता अनुदान देना, पंचायतों की वित्तीय स्थिति में सुधार लाना और राज्यों, पंचायतों द्वारा लगाए जाने वाले शुल्क का निर्धारण कर उनके बीच विभाजन करना होता है।
  • जम्मू-कश्मीर में लंबे वक़्त से पंचायत चुनावों को लेकर अस्थिरता रही है। जिसके कारण केंद्र की ओर से भेजी जाने वाली अनुदान राशि को बिना खर्च किए ही वापस भेज दिया जाता है।
  • विशेष राज्य के दर्जे वाले जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में पंचायती चुनाव न कराने की जिम्मेदारी वहां मौजूद राजनीतिक नेतृत्व और व्यवस्था की है।
  • जहां परिस्थितियां अनुकूल होने के बावजूद भी पंचायत चुनाव नहीं कराये जाते हैं।
  • इस बार भी राज्य की क्षेत्रीय पार्टियाँ P.D.P और National Congress ने पंचायत चुनावों का बहिष्कार किया है। इन दोनों ही पार्टियों ने चुनाव में भाग न लेने का कारण अनुच्छेद 35A और अनुछेद 370 को राज्य से खत्म करने को लेकर उठी मांगों को जिम्मेदार बताया है।
  • दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक N.G.O “we citizens” ने इस अनुच्छेद के खिलाफ़ याचिका दायर की थी। जिसमें जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 35A और अनुछेद 370 के तहत मिलने वाले स्वायता दर्जे को देश के अन्य नागरिकों के साथ भेदभावपूर्ण बताया था। फि़लहाल अभी ये याचिका सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
  • 1954 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के आदेश पर Article 35A के साथ अनुछेद 370 की संविधान में शामिल किया था। Article 35A राज्य सरकार को वहां निवास करने वाले लोगों की नागरिकता और अधिकार तय करने की शक्ति देती है, जबकि अनुछेद 370 पूरे जम्मू- कश्मीर क्षेत्र को विशेष राज्य का दर्जा देने का काम करती है।
  • लंबे वक्त के बाद हो रहे पंचायत चुनावों का असर ग्राम स्तर के विकास लिए काफ़ी महत्वपूर्ण रहेगा और सत्ता के विकेंद्रीकरण से संबंधित ये चुनाव जनता को सीधे तौर पर प्रशासन में भी भागीदार बनायेगा।
  • दरअसल भारत जैसे विशाल देश में सिर्फ केंद्र और राज्य के स्तर पर व्यवस्थित शासन नहीं चलाया जा सकता है। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक देश में निचले पायदान पर रहने वाली जनता की भागीदारी आवश्यक होती है।
  • स्थानीय शासन के द्वारा ही पंचायतों की समस्याओं का बेहतर हल निकाला जा सकता है। जबकि इस शासन व्यवस्था में विकास योजनाओं को लागू कराने और समय-समय पर उनकी निगरानी करने में भी स्थानीय लोग अपनी सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
  • जम्मू- कश्मीर में हुए पंचायत चुनाव न सिर्फ स्थानीय जनता की लोकतांत्रिक भागीदारी को मज़बूत करेंगे बल्कि ये चुनाव न कराने को लेकर मिलने वाली आतंकवादी धमकियों के खि़लाफ़ भी एक मिसाल पेश करेंगे।