(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) चंद्रशेखर आजाद : कभी अंग्रेजों के हाथ न आने वाले (Chandr Shekhr Azaad : Always Free from holds of Britishers)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) चंद्रशेखर आजाद : कभी अंग्रेजों के हाथ न आने वाले (Chandr Shekhr Azaad : Always Free from holds of Britishers)



23 जुलाई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पूरे भारतवर्ष के आत्मगौरव चंद्रशेखर आजाद की जयंती है. चद्रशेखर आजाद, यह नाम सुनते ही इंसानों के मन में दो छवि सामने आती है....मूछों पर भारतीयों के आत्मसम्मान का ताव...और भारत माता के प्रति आत्मसमर्पण ऐसा कि आखिरी गोली से खुद की जान ले ली, क्योंकि आजाद हमेशा आजाद रहता है.....लेकिन ऐसी कई किस्से कहानियां है जो चंद्रशेखर आजाद स्वाधीनता संग्राम में एक अलग स्थान दिलाता है.

आज DNS कार्यक्रम में एक बार फिर ताज़ा करेंगे उनसे जुड़े किस्सों को ..जानेंगे उस महान देश भक्त के बारे में....

चन्द्रशेखर आज़ाद से जुदा की बेहद ही खूबसूरत किस्सा हमेशा याद आता है...जो उनकी देश भक्ति, देश के प्रति प्रेम को दर्शाता है...यह वही आजाद हैं, जिन्होंने जेल में जब अंग्रेज पूछताछ कर रहे थे तो इन्होंने अपने पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया था….

यह वही आजाद हैं, जिन्होंने मात्र 17 साल की उम्र में आजाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े थे. यह वही आजाद हैं जिन्हें इनके शानदार दिमाग के कारण क्विक सिल्वर कहा जाता है. यह वही आजाद हैं जिन्होंने 1925 के काकोरी कांड में अहम भूमिका निभाई और अंग्रेजों की जड़ों को हिलाकर रख दिया था. यह वहीं चंद्रशेखर हैं, जिन्हें पहली बार जेल जाने पर 15 कोड़े मारने की सजा दी गई थी…..

पंड़ित जी के घर एक योद्धा का जन्म

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को आदिवासी ग्रम भाबरा में हुआ था. उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी था….ये उन्नाव जिले के बदर गांव के रहने वाले थे. आकाल पड़ने के कारण बाद में इनका पिरवार भाबरा में बस गया. यही से चंद्रशेखर आजाद की प्रारम्भिक जीवन की शुरुआत हुई....आज़ाद का बचपन का नाम चंद्रशेखर सीताराम तिवारी था ...उन्होंने धनुष बाण चलाना सीखा. बता दें कि इस गांव का नाम अब बदलकर चंद्रशेखर आजाद के नाम पर रख दिया गया है...आपको बता दें चन्द्र शेखर आज़ाद नही चाहते थे की उनकी तस्वीर अंग्रेजों के हाथों में पड़े इसीलिए उन्होंने अपनी सारी तस्वीरें नष्ट करवादी थी..हालाकि उनकी एक तस्वीर झाँसी में रह गई उन्होंने अपने एक दोस्त अपनी यह तस्वीर नष्ट करवाने के लिए भिजवाया था......लेकिन यह मुमकिन हो नही पाया....

गांधी से प्रभावित थे आजाद

यह बात कोई झुंठला नहीं सकता है कि हर एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महात्मा गांधी का सम्मान करता था, उनसे प्रभावित था. चंद्रशेखर आजाद भी गांधी से कापी प्रभावित थे. बता दें कि पहली बार जब अंग्रेजों ने आजाद को गिरफ्तार किया तो उन्हे मिजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. लेकिन आपको पता है कि आजाद का हर सवाल का जवाब क्या था. आजाद से पिता का नाम पूछने पर उन्होंने बताया स्वतंत्रता, चंद्रशेखर से जब जज ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने बताया आजाद, घर का पता पूछने पर आजाद बोले जेल मेरा घर है. बता दें कि आजाद के जवाबों के कारण मिजिस्ट्रेट को काफी गुस्सा आ गया और उसने आजाद को 15 कोड़े मारने की सजा दी थी. इस दौरान हर कोड़े के बाद आजाद दो ही शब्द बोलते थे- वंदे मातरम, महात्मा गांधी की जय. इसी घटना के बाद से ही चंद्रशेखर आजाद के नाम से प्रसिद्ध हुए..

बात दरअसल 1922 की है जब महात्मा गांधी ने चौरा-चौरी घटना के बाद असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया था. इससे आजाद गांधी से काफी नाराज हुए. इसके बाद उनका परिचय राम प्रसाद बिस्मिल से हुए. इसके बाद 1925 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की गई. इसके बाद दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ती गई और अंग्रेजों के खिलाफ शस्त्र के दम पर आजादी छीनने की ठान ली. यहीं से आजाद गरम दल में शामिल होते हैं.

चंद्रशेखर आजाद ने एक निर्धारित समय के लिए झांसी को अपना गढ़ बना लिया। झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे। अचूक निशानेबाज होने के कारण चंद्रशेखर आजाद दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से बच्चों को पढ़ाने का भी काम करते थे। वह धिमारपुर गांव में अपने इसी नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे। झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी।

चंद्रशेखर आजाद ने एक बार स्वतंत्रता सेनानियों की बैठक में कहा था कि अंग्रेज कभी मुझे जिंदा नहीं पकड़ सकते हैं...फरवरी 1931 में पहली बार गणेश शंकर विद्यार्थी के कहने पर वह इलाहाबाद में जवाहर लाल नेहरू से मिलने आनंद भवन गए थे....लेकिन वहां पर नेहरू ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया था....इसके बाद वह गुस्‍से में वहां से एल्फ्रेड पार्क चले गए। इस वक्‍त उनके साथ सुखदेव भी थे। वह यहां पर अपनी आगामी रणनीति तैयार कर रहे थे, तभी किसी मुखबिर के कहने पर वहां पर अंग्रेजों की एक टुकड़ी ने उन्‍हें चारों तरफ से घेर लिया। आजाद ने तुरंत खतरा भांपते हुए सुखदेव को वहां से सुरक्षित निकाल दिया और अंग्रेजों पर फायर कर दिया...

लेकिन जब उनके पास आखिरी एक गोली बची तो उन्‍होंने उससे खुद के गोली मारकर वीरगति को प्राप्त हो गये....और अपनी कथनी को सच साबित कर दिया था। एल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को उनके दिए इस बलिदान को भारत कभी नहीं भुला पाएगा। आजादी के बाद इस पार्क का बाद में नाम बदलकर चंद्रशेखर आजाद पार्क और मध्य प्रदेश के जिस गांव में वह रहे थे उसका धिमारपुरा नाम बदलकर आजादपुरा रखा गया...यहां से आजाद ने बच्चे बच्चे के अंदर आजादी का वह बीज बोया जिसे अंग्रेज कभी जीते जी दबा नहीं सकते थे. आजाद की बातें और उनका खुद को शहीद कर देना ही उनके आजादी पसंद होने का प्रमाण था....