(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) बोडोलैंड विवाद (Bodoland Dispute)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) बोडोलैंड विवाद (Bodoland Dispute)


केंद्र ने असम के बोडो उग्रवादी संगठन एनडीएफबी पर लगे प्रतिबंध को अगले पांच सालों के लिए बढ़ा दिया है। केंद्र का कहना है कि संगठन लगातार हिंसक गतिविधियों के साथ-साथ रंगदारी मांगने जैसी आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहा है। यही नहीं, वह भारत विरोधी ताकतों के साथ मिलकर देश की संप्रभुता के लिए खतरा भी पैदा कर रहा है।

कौन है बोडो:

दरअसल में बोडो असम का सबसे बड़ा जनजातीय समूह है जो की राज्य की कुल जनसँख्या का 5-6 फीसदी है।असम के 4 जिले कोकराझार बक्सा उदालगुरी और चिरांग मिलकर बोडोलैंड प्रांतीय क्षेत्रीय जिले का निर्माण करते है जिसमे कई सारे नृजातीय समूह रहते हैं।

गौरतलब है की बोडो लोगों का सशस्त्र संघर्ष और अलगाववादी मांगों का एक लंबा इतिहास रहा है। साल 1966-67 में, एक राजनैतिक संगठन प्लेन ट्राइबल कौंसिल ऑफ़ असम (पीटीसीए), ने बोडोलैंड नामक एक अलग राज्य की मांग उठायी।

साल 1987 में, ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (ABSU) बोडोलैंड राज्य की मांग को फिर से उठाया। एबीएसयू के तत्कालीन नेता, उपेंद्र नाथ ब्रह्मा ने असम को दो बराबर भागों में बांटने का प्रस्ताव रखा। असम में फ़ैली अशांति और अराजकता का मुख्य कारण साल 1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन था जिसकी परिणति असम समझौते के रूप में हुई ।असम समझौते ने जहाँ एक ओर असम के नागरिकों की सुरक्षा की मांगों को सुनिश्चित किया वहीं दूसरी ओर इसने बोडो लोगों को अपनी पहचान बनाने के लिए आंदोलन करने के लिए भी प्रेरित किया।

साल 2014 के दिसंबर के महीने में अलगाववादियों ने कोकराझार और सोनितपुर में ३0 से अधिक लोगों की हत्या कर दी । 2012 में हुए बोडो मुस्लिम दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए और तकरीबन 5 लाख के आसपास लोग बेघर हो गए ।

क्या है NDFB?

राजनीतिक आंदलनों के इतर कई सशत्र समूहों ने भी एक अलग बोडो राज्य बनाने की कोशिशें की ।एनडीएफबी मतलब नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड एक ऐसा संगठन है जिसका मकसद है असम से बोडो बहुल इलाके को अलग कर एक स्वतंत्र और संप्रभु बोडोलैंड देश की स्थापना। भारत सरकार ने इस ग्रुप को आतंकी गुट की श्रेणी में डाल रखा है। लगभग 28 साल पहले 1986 में बना ये संगठन सामूहिक नरसंहार के लिए कुख्यात है और ऐसे हमलों में वो अब तक हजार से भी ज्यादा लोगों की जान ले चुका है। इस ग्रुप में फिलहाल 1200 के करीब आतंकी हैं, जो अक्सर सुरक्षा बलों और गैर बोडो समुदाय पर हमला करते रहते हैं। एक समय ये संख्या 3500 से ज्यादा थी, लेकिन भारत और भूटानी सुरक्षा बलों के अभियानों और आंतरिक फूट के चलते इसकी ताकत कम हो रही है। जिसकी बौखलाहट में इस संगठन ने अपने हमलों को तेज कर दिया है।

एनडीएफबी को अघोषित तौर पर चीनी मूल के संगठनों से मदद मिलती है। ये मदद म्यांमार के रास्ते इन तक पहुंचती है। इनकी पहुंच का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एनडीएफबी का जाल भारत, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार में फैला हुआ है। हालांकि भारत सरकार के अनुरोध पर भूटानी सेना ने भूटान के अंदर से गतिविधियां संचालित कर रहे एनडीएफबी के खिलाफ जबरदस्त कार्रवाई की थी। भूटानी सेना के चलाए ऑपरेशन ऑल क्लियर में एनडीएफबी के कई लड़ाके गिरफ्तार हुए, तो कई मार गिराए गए। 2006 में एनडीएफबी और भारत सरकार के बीच संघर्ष विराम का समझौता भी हुआ था, लेकिन ये 6 महीने तक ही चला था क्योंकि एनडीएफबी ने लोगों पर हमले करने की नीति नहीं छोड़ी थी और न ही अपने हथियार डाले थे।

एनडीएफबी में दो गुटः एनडीएफबी में दो गुट हैं, पहला आईके सांग्बिजित के नेतृत्व में एनडीएफबी(एस)। जो भारत सरकार से वार्ता के पक्ष में है। वहीं, दूसरा धड़ा एनडीएफबी(आर-बी) रंजन डायमरी के नेतृत्व में जो हमेशा से संघर्ष का ही रास्ता अख्तियार करता रहा है। हालांकि पहले दोनों धड़े एक ही थे, लेकिन साल 2012 के बाद से दोनों धड़े अलग हुए हैं। ज्यादातर हमलों के लिए एनडीएफबी(आर-बी) ग्रुप ही जिम्मेदार है।

नेतृत्व और मददः इस गुट का शीर्ष नेतृत्व बांग्लादेश से चलता है। जिसे म्यांमार और भूटान के रास्ते मदद मिलती है। इस गुट को म्यांमार बेस्ड चिन नेशनल लिबरेशन आर्मी से हथियार मिलते हैं। एनडीएफबी के पूर्वोत्तर के अन्य विद्रोही गुटों से भी घनिष्ट संबंध हैं, जैसे युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम(उल्फा), कामतापुर लिबरेशन ऑर्गनाईजेशन (केएलए), अचिक नेशनल वालंटियर्स काउंसिल (एएनवीसी), जो भारत सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष छेड़े हुए हैं।




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