(Daily News Scan - DNS) NOTA - नापसंदगी का अधिकार (NOTA - Right to Reject)


(Daily News Scan - DNS) NOTA - नापसंदगी का अधिकार (NOTA - Right to Reject)


मुख्य बिंदु:

हाल ही में हरियाणा चुनाव आयोग ने NOTA को लेकर एक महत्तवपूर्ण फैसला लिया है। इस फैसले के मुताबिक हरियाणा में होने वाले निकाय चुनावों में NOTA वोटों की संख्या ज़्यादा होने पर दोबारा चुनाव करने की बात कही गई है।

हरियाणा चुनाव आयोग के अनुसार यदि किसी भी इलाके में पड़े नोटा मतों की संख्या अन्य उम्मीदवारों से ज़्यदा हुई तो इस स्थिति में सभी प्रत्याशियों को अयोग्य घोषित करते हुए दोबारा से मतदान कराये जायेंगे।

NOTA लागू होने के बाद ये पहला ऐसा मौका है जब नोटा के तहत पड़ने वाले वोटों को एक प्रत्याशी के तौर पर गिना जायेगा । जिसके द्वारा चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने वाले अधिकार राइट टू रिजेक्ट को और ज़्यदा मज़बूत मिलेगी।

नोटा भारतीय मतदाताओं को चुनाव के दौरान अपने पसंद का कैंडिडेट न होने पर वोट न देने का अधिकार देती है जिसका मतलब होता है - None of the Above भारत में नोटा की शुरुआत साल 2013 के आखिरी महीनों में हुई थी। जिसकी मांग वर्ष 2009 से ही की जा रहे थी। निर्वाचन आयोग की ओर से जारी की जाने वाली मतदान सूची में शामिल सभी नागरिकों को नोटा का अधिकार प्राप्त है जोकि अपने पसंद के उमीदवार को चुनने या नहीं चुनने की आज़ादी देता है।

2015 से पूरे भारत भर में नोटा लागू हो जाने के बाद भारत दुनिया का 14 वा नोटा विकल्प उपलब्ध करने वाला देश बन गया था। इसके पहले अमेरिका, कोलंबिया, यूक्रेन, और ब्राज़ील जैसे देश में नोटा विकल्प लम्बे समय से नागरिकों को प्राप्त है।

2009 में पहली बार चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से नोटा अधिकार मांग की थी। जिस पर साल 2013 के अंत में सुनवाई हुई।

23 सितम्बर 2013 को तात्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया प. सदाशिवम की अगुवाई वाली पीठ ने इस मांग का स्वागत किया। उस दौरान के अपने ऐतिहासिक फैसले में इस पीठ ने कहा कि दरअसल लोकतंत्र चुनावों का ही नाम है इसलिए मतदाताओं को वोट न देने का भी अधिकार मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने नोटा के विषय में कहा था कि जिस तरह से नागरिकों को वोट डालने का अधिकार है उसी तरह से वोट नहीं देने का अधिकार भी ज़रूरी है जिसका इस्तेमाल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों चुनावों में किया जाना चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने नोटा के तहत पड़ने वाले वोटो को रद्द मतों की ही श्रेणी में रखने का आदेश दिया था जिसके कारण उसकी प्रसंगिगता पर सवाल खड़े होने लगे।

इसके बाद वर्ष 2013 में ही चुनाव आयोग ने जब अप्रत्यक्ष चुनावों यानी राजयसभा और विधानपरिषद् के चुनावों में नोटा इस्तेमाल की सूचना जारी की तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी रोक लगा दी । जिसके बाद 21 अगस्त 2018को आये अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नोटा का इस्तेमाल होने से अप्रत्यक्ष चुनावों में समाहित निष्पक्षता समाप्त हो जाएगी। जिससे भ्रष्टाचार और डिफेक्शन को बढ़ावा मिलेगा।

सुप्रीमकोर्ट ने अपने इस फैसले में नोटा को भी आधारहीन बताया और कहा कि इससे चुनावों में मतदाता की भूमिका को नज़र अंदाज किया जा रहा है जिससे लोकतान्त्रिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नोटा को सिर्फ प्रत्यक्ष चुनावों तक ही सीमित रखने की बात कही।

दरसल चुनाव सुधार का साधन माने जाने वाले नोटा के लागू होने के बाद भी इसका कोई असर हमारे चुनाव प्रक्रिया पर नहीं पड़ा है।

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के आंकड़ों पर नज़र डालें हर राज्य में सैंकड़ों आपराधिक मामले वाले संसद और विधायक मौजूद हैं और यही उमीदवार हर बार पार्टी की ओर से चुनाव भी लड़ते हैं।

हरियाणा चुनाव आयोग की ओर से लिया गया हालिया फैसला चुनाव सुधार के नज़रिये से काफी महत्वपूर्ण है। जोकि निकाय चुनावों के ज़रिये ही सही इसे अन्य प्रत्यक्ष चुनावों में शामिल कराने में अहम् भूमिका निभाएगा।

दरसल ये फैसला इस नज़रिये से भी महत्तवपूर्ण होगा कि यदि किसी उमीदवार को दिए गए वोटों से उसकी हार जीत तय हो सकती है तो फिर नोटा की कोई वैल्यू क्यों नहीं ? नोटा मतों की संख्या ज़्यदा होने के बावजूद भी यदि कोई खारिज किया हुआ उमीदवार लोकतान्त्रिक शासन में बना रहता है तो भारतीय चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिए ये बड़ा संकट भी है।