निःशुल्क बीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए ऑनलाइन टेस्ट सीरीज (Free Online Test Series for BPSC Mains Examination): सामान्य अध्ययन (पेपर - I) General Studies (Paper - I) - 19, नवंबर 2019


निःशुल्क बीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए ऑनलाइन टेस्ट सीरीज (Free Online Test Series for BPSC Mains Examination)


सामान्य अध्ययन : पेपर - I (General Studies - Paper I)

मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम:

  • आधुनिक भारत का इतिहास, समसामयिकी एवं सांखिकी (Modern History, Current Affairs and Statistics)

Q. समग्रतः इस निष्कर्ष से बच पाना मुश्किल है कि तथाकथित प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम न तो प्रथम, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था। इस कथन पर विचार करें।

मॉडल उत्तर:

1857 का विद्रोह औपनिवेशिक शासन की नीतियों तथा देश के विभिन्न वर्गों पर पड़े उसके नकारात्मक प्रभाव का परिणाम था। विद्रोह के संदर्भ में उपस्थित साक्ष्यों की अपर्यापत्ता तथा तत्कालीन इतिहासकारों के परस्पर विरोधाभाषी दावों ने इसके स्वरूप को लेकर एक विवाद को जन्म दिया है।

इतिहासकारों का एक वर्ग इसे महज एक विद्रोह मानता है तो वही दूसरा वर्ग इसे राष्ट्रीय स्तर पर जनसंघर्ष के द्वारा स्वतंत्रता की चेतना एवं प्रथम अभिव्यक्ति मानता है। विद्यमान मतभेदों के बीच आर-सी- मजूमदार ने तथाकथित ‘‘प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को न तो प्रथम, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम’’ के रूप में स्वीकार किया है। वे अपना विचार रखते हुए तर्क देते हैं कि 1857 से पहले भी जनांदोलनों और विद्रोहों का लम्बा इतिहास रहा है।

1757 के बाद औपनिवेशिक शासन ने निरंतर अपने क्षेत्रें का विस्तार आरंभ किया और इस क्रम में उन्हें निरंतर कई क्षेत्रीय शक्तियों के विरोध का सामना करना पड़ा। ये क्षेत्रीय शक्तियां बढ़ती औपनिवेशिक शोषण के विरूद्ध पहले तो छिट-पुट संघर्ष में संलग्न हुई परंतु धीरे-धीरे इन क्षेत्रीय शक्तियों ने विस्तृत आकार लेना प्रांरभ कर दिया, जिसमें पश्चिम भारत में भील, कच्छ, बघेरो व रामोसियों का विद्रोह है तो वहीं पूर्वी भारत व बंगाल में सन्यासियों कोलो, तमारों, चेरो, भूमिजों व संथालो का विद्रोह प्रमुख है, वहीं अगर दक्षिण भारत की बात करे तो विजयनगरम् के राजा और ट्रावनकोर के दीवान वेलु-थम्पी का विद्रोह प्रमुख है।
आर-सी- मजूमदार ने 1857 के विद्रोह को ‘राष्ट्रीय’ मानने के विरोध में तर्क देते हुए कहते हैं कि विद्रोह का विस्तार सीमित था यह अखिल भारतीय नहीं था। समाज के प्रत्येक वर्ग की सहभागिता भी सीमित थी। भौगोलिक दृष्टिकोण से भी विद्रोहियों/ नेताओं के दृष्टिकोण संकीर्ण प्रतीत होते हैं, जो अपने निहित सामंती स्वार्थ व क्षेत्रीय हितों को ज्यादा प्रमुखता देते थे, जैसे - झांसी की रानी ने उत्तराधिकार के मामले को लेकर युद्ध किया था तो वहीं नाना साहेब अपने पेंशन के अधिकार के लिए।

इसके अलावा आर- सी- मजमूदार ने इसे ‘स्वतंत्रता संग्राम’ मानने से भी इंकार कर दिया है क्योेंकि सभी विद्रोहियों का उद्देश्य एक अखिल भारतीय स्वरूप की स्थापना करना नहीं था बल्कि अपने हितों की क्षणिक पूर्ति करना था जिससे उनकी सत्ता कायम रह सकें। विद्रोहियों का कोई स्पष्ट लक्ष्य भी नहीं था जिससे यह प्रतीत हो सकें कि अगर विद्रोही, विद्रोह मे सफल हो भी जाते तो उनका भविष्य क्या होता? विद्रोह में सुनियोजित कार्यक्रम एवं किसी सुविचारित संगठन का अभाव भी नजर आता है, जिसके कारण आर-सी- मजूमदार ने इसे स्वतंत्रता संग्राम मानने से भी इंकार कर दिया है।

उपरोक्त तर्को की व्याख्या में आर-सी- मजूमदार मुख्यतः कुछ तथ्यों की ओर ईशारा करते हैं -

  • औपनिवेशिक शासन के विरूद्ध उपजे असंतोष की पृष्ठभूमि में आकार ग्रहण करने वाले विद्रोहों की परंपरा में 1857 का विद्रोह विशिष्ट है, चाहे वे अपने उद्भव में हो, प्रसार में हो या चरम परिणति में हो।
  • विद्रोह का उद्भव एक सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, चाहे बाद में इसकी प्रकृति में कितना परिवर्तन आया हो,

हालांकि इनके मत की काफी आलोचना अन्य इतिहासकारों द्वारा की गई जिसमें अशोक मेहता व वी- डी- सावरकर प्रमुख है। अशोक मेहता ने 1857 के विद्रोह का स्वरूप ‘‘राष्ट्रीय’’ माना है, तो वही बी-डी- सावरकर ने इसे ‘‘सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम’’ की संज्ञा दी है।

उपरोक्त के मतानुसार, 1857 का विद्रोह ‘‘प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम’’ था क्योंकि इसमें समाज के अधिकतर वर्गों ने भाग लिया, जैसे- किसान, जमींदार, आम-नागरिक इत्यादि। इसके अलावा विस्तार, गहनता एवं तीव्रता के स्तर पर यह अद्वितीय था। विद्रोहों का विस्तार दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, बंगाल, मुंबई (महाराष्ट्र) इत्यादि राज्यों तक फैला था जहां लगभग प्रत्येक वर्ग के नागरिक इसमें शामिल थे इसकी तीव्रता का आकलन तो इसी से लगाया जा सकता है कि एक दिन के अंदर मेरठ से विद्रोही सेना दिल्ली पहुंचकर बहादुरशाह जफर को अपना सम्राट घोषित कर उनके सेनापति के नेतृत्व मे विद्रोह का विस्तार करती है और धीरे धीरे इसमें क्ष्ेात्रीय शक्तियाँ भी शमिल होती जाती है जिनमें अवध, कानपुर, ग्वालियर, झांसी, मथुरा, मिर्जापुर, आरा, जगदीशपुर इत्यादि मुख्य हैं।

इसे ‘‘राष्ट्रीय’’ कहना इसलिए भी सार्थक होगा क्योंकि भले ही क्षेत्रीय हित इस विद्रोह के केन्द्र में थे, फिर भी सभी के हित, एक दूसरे को जोड़ने का काम कर रहे थे एक तरह का अंर्तसंबंध भी इनमें नजर आता है। एक क्षेत्र के विद्रोही दूसरे क्षेत्र की गतिविधियों से न सिर्फ प्रभावित थे, वरन् उनमें निरंतर सहयोग एवं संवाद भी कायम था। सभी विद्रोही एक साझे शत्रु के खिलाफ गहरे असंतोष के भाव से ग्रसित/ प्रेरित थे। इस विद्रोह के दौरान धार्मिक सहिष्णुता का बेजोड़ गठबंधन देखने को मिलता है। हिन्दुओं और मुसलमानों मेे अभूतपूर्व एकता नजर आती है जिसकी प्रतिकृति मुुगल बादशाह के रूप में, सभी के स्वीकारोक्ति में नजर आता है। विद्रोह की अभिव्यक्ति भले ही कुछेक क्षेत्रें तथा वर्गों में हुई हो, परंतु विद्रोह की प्रेरणा के अंश की व्याप्ति लगभग संपूर्ण भारतवर्ष में थी। अंग्रेजों के खिलाफ असंतोष का स्वरूप भी राष्ट्रीय था। यह विद्रोह जितना अधिक व्यापक था उतनी ही इसमें गहराई भी थी।

अगर हम इसे ‘स्वतंत्रता संग्राम’ के रूप में देखें तो स्पष्टतः यह नजर आता है कि धीरे-धीरे जनचेतना में आजादी के लिए छटपटाहट होने लगी थी। अनेक जगहों पर सिपाहियों से पहले जनता ने विद्रोह आरंभ कर दिया कई जगह, जहां फौज तैनात नहीं थी वहां तो सिर्फ जनता ने ही अपना झण्डा बुलंद कर रखा था, क्योंकि आम नागरिक भी ब्रिटिशों के शोषण को भली-भांति समझने लगे थे। इस प्रकार की अभिव्यक्ति इस विद्रोह को जन-चेतना का चरित्र प्रदान कर रही थी जिनमें, आजादी के लिए चेतना विद्यमान थी। इसके अलावा जो भी छिट पुट रणनीतियां हमें नजर आती है, वे इसे स्वतंत्रता संग्राम की ओर ही ले जाती है, जिनमें रोटी, व कमल का फूल, विद्रोह के प्रतीक के रूप में प्रमुख रहे है।

हॉलाकि इस विद्रोह ने स्वतंत्रता की पटकथा तो नहीं लिखी परंतु भविष्य के आंदोलनों/ विद्रोहों के लिए प्रेरणा स्रोत जरूर बनी जिसने इस विद्रोह को भविष्य के विद्रोहों के लिए प्रासंगिक बना दिया। नवीनतम शोधो के आधार पर 1857 के विद्रोह को ‘‘भारतीय राष्ट्रवाद की आरंभिक अभिव्यक्ति’’ माना जा सकता है। क्योंकि इसमे वे सारे तत्व विद्यमान थे जो राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति के लिए होना आवश्यक था। इस विद्रोह का दमन बहुत अधिक क्रुरता से कर दिया गया जिसमें मरने वालो की संख्या अनुमानतः 5 लाख के आस-पास थी। फिर भी अल्प संसाधन, अल्प सैन्य संगठन एवं धनाभाव के बावजूद जिस एकता एवं धार्मिक सहिष्णुता का परिचय इस विद्रोह ने दिया वैसी अभिव्यक्ति तात्कालीन समय मे किसी विद्रोह में दृष्टिगत नहीं होती।


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