भारत में पवन ऊर्जा: संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


भारत में पवन ऊर्जा: संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चर्चा का कारण

वर्तमान में पवन ऊर्जा क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है। खासकर चीन और अमेरिका ने पवन ऊर्जा से संबंधित अपनी शक्ति दोगुनी कर ली है। वैश्विक विद्युत उत्पादन के अक्षय ऊर्जा स्रोतों में पवन ऊर्जा का भाग बढ़ रहा है। हाल ही में इंटरनेशनल एनर्जी एसोसिएशन ने बताया है कि अपतटीय पवन ऊर्जा की संभावना आन्तरिक पवन ऊर्जा से कहीं अधिक है। इस क्षेत्र में निवेश की आकर्षक संभावनाएँ हैं।

परिचय

किसी वस्तु द्वारा कार्य करने की क्षमता उसकी ऊर्जा कहलाती है। समाज की प्रत्येक गतिविधि के लिए ऊर्जा के किसी न किसी रूप की आवश्यकता होती है, चाहे प्राकृतिक गतिविधि हो या मनुष्य अथवा मशीन की गतिविधि।

मनुष्य के जीवन को सुविधाजनक बनाने वाले तमाम साधन, उद्योगों में उत्पादन के लिए लगी मशीनें, कृषि यंत्र, यातायात के साधन आदि सभी ऊर्जा से ही संचालित होते हैं जिसमें परम्परागत जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त ऊर्जा या गैर-परम्परागत नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग किया जाता है।

परम्परागत जीवाश्म ईंधन ऊर्जा के ऐसे गैर-नवीकरणीय स्रोत हैं जिनका उपयोग एक ही बार किया जा सकता है साथ ही ये वैश्विक तापन एवं पर्यावरणीय क्षरण के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। इसके विपरीत गैर-परम्परागत नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बार-बार किया जा सकता है और ये पर्यावरण के लिए नुकसानदेह भी नहीं होते हैं। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के अन्तर्गत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत ऊर्जा बायोमास आदि आते हैं।

हाल के वर्षों में भारत ने आधुनिक ऊर्जा की पहुँच में काफी प्रगति की है। वर्ष 2000 के बाद से भारत में बिना बिजली के पहुँच वाले लोगों की संख्या आधी हुई है और ग्रामीण विद्युतीकरण की दर दो गुनी हो गयी है। फिर भी लगभग 20% आबादी बिजली की पहुँच से दूर है। सभी तक बिजली की पहुँच और उसकी निरंतरता को बनाए रखने में पवन ऊर्जा के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है।

पवन ऊर्जा क्या है

बहती वायु से उत्पन्न की गई ऊर्जा को पवन ऊर्जा कहते हैं। यह ऊर्जा प्रकृति पर निर्भर रहती है और यह कभी ना खत्म होने वाली ऊर्जा होती है पवन ऊर्जा बनाने के लिए हवादार जगहों पर पवन चक्कियों को लगाया जाता है जिनके द्वारा वायु की गतिज ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। इस यांत्रिक ऊर्जा को जनरेटर की मदद से विद्युत में परिवर्तित किया जाता है। सामान्य शब्दों में कहें तो पवन ऊर्जा का तात्पर्य वायु से गतिज ऊर्जा को यांत्रिकी और विद्युत ऊर्जा के रूप में बदलना है।

पवन ऊर्जा की संभावना

विद्युत उत्पादन के लिए नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में से पवन ऊर्जा एक प्रमुख स्वीकृत स्रोत है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पवन की उपलब्धता निःशुल्क और कभी समाप्त नहीं होने वाली है। किसी भी देश या वाणिज्यिक प्रतिष्ठान का इस पर एकाधिकार नहीं है, जैसा कि सीमित जीवाश्मीय ईंधनों के साथ है। चूंकि ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ती ही जा रही है, इसलिए कच्चे तेल के बढ़ते मूल्यों के बदले निश्चित रूप से पवन ऊर्जा एक आसान विकल्प साबित हो सकता है।

प्राचीन काल में पवन ऊर्जा का उपयोग नावों और जलपोतों को चलाने में किया जाता था। फिर इस ऊर्जा का उपयोग पनचक्कियों में पाइपों द्वारा पानी को उठाने में किया जाने लगा। अब वैज्ञानिकों ने पवन वेग से टरबाइनों को चला कर विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में नई क्रांति ला दी है। उम्मीद है कि पवन टरबाइनों के जरिए अब पूरे विश्व की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा।

वर्तमान में महासागर और वायुमंडलीय परिसंचरण के पैटर्न में बदलाव के कारण वैश्विक स्तर पर हवा की गति में वृद्धि हो रही है। इस बढ़ोत्तरी का लाभ पवन ऊर्जा के उत्पादन के रूप में मिल सकता है। वर्ष 2010 के बाद से जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक स्तर पर हवा की गति में हुई बढ़ोतरी से पवन ऊर्जा के उत्पादन में 37 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है।

हवा की गति का जो अनुमान लगाया गया है उससे वर्ष 2024 तक पनचक्कियों से उत्पन्न होने वाली बिजली की मात्र प्रति घंटे 3।3 मिलियन किलोवाट बढ़ जाएगी।

वर्ष 2018 के अंत तक, वैश्विक स्तर पर पवन ऊर्जा की कुल उत्पादन क्षमता (स्थापित) करीब 591,549 मेगावाट थी, जो कि 2017 की तुलना में 9.6 फीसदी अधिक है। जबकि भारत में इसकी कुल स्थापित उत्पादन क्षमता 35,129 मेगावाट है।

एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) का अनुमान है। भारत में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा परियोजनाओं में वार्षिक निजी निवेश 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक का हो सकता है।

वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो जर्मनी में कोयले और पेट्रोल की जगह सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है। जर्मनी ने पिछले सालों में जीवाश्म उर्जा पर निर्भरता कम करने और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने का फैसला किया और इसके लिए वहां लगातार कदम उठाए जा रहे हैं।

जर्मनी 2050 तक जीवाश्म ईंधन और परमाणु ऊर्जा पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहता है।

इसके बाद यहां हर काम के लिए अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल होगा।

चूँकि अपतटीय क्षेत्रों में वायु का बहाव तटीय प्रभाव के चलते आंतरिक भागों की तुलना में अधिक और निरंतरता के साथ होता है जिससे अपतटीय क्षेत्रों में पवन ऊर्जा के संभावनाएं और बढ़ ताजी हैं। विश्व के विभिन्न देश अपतटीय क्षेत्रों में पवन ऊर्जा की प्राप्ति के लिए अवसंरचनात्मक विकास पर जोर दे रहे हैं।

अपतटीय पवन ऊर्जा

भारत के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने भारत में एक गीगावाट की प्रथम अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजना की शुरूआत गुजरात में की है। अपतटीय पवन ऊर्जा की संभावनाओं में गुजरात और तमिलनाडु सबसे समृद्ध राज्य हैं। वर्ष 2022 तक अपतटीय पवन ऊर्जा से 5 गीगावाट और 2030 तक 30 गीगावाट का लक्ष्य घोषित किया गया है।

विभिन्न बहुपक्षीय एजेंसियों द्वारा सहायता प्राप्त एनआईडब्ल्यूई ने भारत में अपतटीय पवन ऊर्जा क्षमता का आकलन किया है। प्रारंभिक अनुमान से पता चलता है कि गुजरात और तमिलनाडु के तट पर अच्छी क्षमता मौजूद है। यूरोपीय संघ द्वारा समर्थित फोविंड परियोजना के तहत, गुजरात और तमिलनाडु में आठ-आठ जोन की पहचान अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजना के विकास के लिए की गई है।

वैश्विक रूप से, अपतटीय पवन ऊर्जा का लगभग तीन दशक पुराना इतिहास है, दिसंबर 2018 तक 17 विभिन्न देशों में कुल स्थापना क्षमता 23-35 गीगावाट की है, जिनमें से महत्वपूर्ण हैं- यूके (6,836 मेगावाट), जर्मनी (6,410 मेगावाट), चीन (4,558 मेगावाट), डेनमार्क (1,358 मेगावाट), नीदरलैंड (1,118 मेगावाट), बेल्जियम (1,178 मेगावाट) और स्वीडन (206 मेगावाट)। ‘विंड यूरोप आउटलुक’ के अनुसार 2030 तक यूरोप में अपतटीय पवन ऊर्जा क्षमता 70 गीगावाट तक पहुँच सकती है। एक अनुमान के अनुसार वैश्विक स्तर पर लगभग 400 गीगावाट अपतटीय पवन ऊर्जा का उत्पादन 2045 तक संभव हो सकता है।

भारत, कोरिया, बांग्लादेश और चीन अपतटीय पवन ऊर्जा के विकास के लिए कार्य कर रहे हैं, वहीं अन्य देश जैसे- जापान, कनाडा आदि भविष्य के अपतटीय पवन ऊर्जा के विकास के लिए आधार तैयार कर रहे हैं। अपतटीय पवन एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बाहर कई नये बाजारों में खुद को स्थापित करने के लिए तैयार है। यदि वर्तमान नीतियों के संदर्भ में देखा जाये तो 2040 तक कोरिया, भारत और जापान की संयुक्त क्षमता 60 GW तक हो जायेगी।

बढ़ती ऊर्जा की माँग एवं पर्यावरणीय महत्त्व

इस वक्त दुनियाभर में ऊर्जा का महत्व काफी बढ़ गया है। ऊर्जा की कमी से जूझ रहे देश भी अब सभी गैर परंपरागत ऊर्जा के स्त्रेत पर अपनी निर्भरता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इस दिशा में भारत भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। पवन ऊर्जा उत्पन्न करने के मामले में भारत चौथे नंबर पर पहुँच गया है। भारत के बाद क्रमशः स्पेन, इंग्लैंड और फ्रांस का नाम आता है।

वैश्विक रैंकिंग के दृष्टिकोण से चीन सर्वाधिक पवन ऊर्जा उत्पादक देश है इसके द्वारा स्थापित कुल क्षमता 22.1 गीगावाट है। वहीं दूसरे स्थान पर संयुक्त राज्य अमेरिका जो कि दूसरा बड़ा उत्पादक देश है जिसकी क्षमता 964 गीगावाट है। विश्व का तीसरा सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक देश जर्मनी है जिसकी स्थापित क्षमता 59.3 गीगावाट है।

ऊर्जा उत्पन्न करने के वैकल्पिक स्त्रेतों के उपयोग की दिशा में भारत तेजी से प्रगति कर रहा है। जिस गति से भारत में इस ओर ध्यान दिया जा रहा है उससे साल 2050 तक बिजली के अन्य स्त्रेतों पर निर्भरता काफी कम होने वाली है।

सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी की रिपोर्ट के मुताबिक अक्षय ऊर्जा के विकास के लिए देश के सभी राज्य भरसक प्रयास कर रहे हैं। साल 2017 में तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, ओडिशा, पंजाब और उत्तराखंड ने अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के विकास के लिए बैंक से ऋण लिए और कोयला आधारित परियोजनाओं के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

2022 तक नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के 1,75,000 मेगावाट के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2014 तक देश की नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता 34,000 मेगावाट थी, जो सितंबर 2019 में बढ़कर 82,580 मेगावाट हो गई है और 31,150 मेगावाट की क्षमता स्थापित करने के लिये प्रयास विभिन्न चरणों में है।

भारत सरकार ने 2022 के आखिर तक 60 गीगावाट पवन ऊर्जा से, 100 गीगावाट सौर ऊर्जा से, 10 गीगावाट बायोमास ऊर्जा से एवं पाँच गीगावाट लघु पनबिजली से, नवीकरणीय ऊर्जा को संस्थापित करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पिछले वर्षों के दौरान सोलर पार्क, सोलर रूफटॉप योजना, सौर रक्षा योजना, नहर के बांधों तथा नहरों के ऊपर सीपीयू सोलर पीवी पॉवर प्लांट के लिए सौर योजना, सोलर पंप, सोलर रूफटॉप के लिए बड़े कार्यक्रम शुरू किये गए हैं।

स्वदेशी नवीकरणीय संसाधनों के बढ़ते उपयोग से महंगे आयातित जीवाश्म ईंधनों पर भारत की निर्भरता में कमी आने की उम्मीद है। लगभग 3 प्रतिशत बंजर भूमि के अनुमान के साथ भारत के पास 1096 गीगावाट की वाणिज्यिक अक्षय ऊर्जा क्षमता है, जिसमें पवन - 302 गीगावॉट_ लघु हाइड्रो - 21 गीगावाट_ जैव ऊर्जा - 25 गीगावाट_ और 750 गीगावाट सौर ऊर्जा शामिल है।

दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन के लक्ष्य को हासिल करने के लिये ऊर्जा के नए विकल्पों के लिए शोध हो रहे हैं क्योंकि सतत व संधारणीय विकास के लक्ष्य को स्वस्थ पर्यावरण द्वारा ही प्राप्त करना संभव है। ध्यातव्य है कि कोयले और प्राकृतिक गैस के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्पादन बढ़ा है जिसका शुष्क हवा की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत अधिक घनत्व है। इस गैस ने पृथ्वी से उत्पन्न गर्मी को पर्यावरण में ऊपर जाने से रोक दिया है। इसी का परिणाम है कि तापमान बढ़ने से गर्मी बढ़ रही है। यह गर्मी ही जलवायु परिवर्तन का सबसे प्रमुख कारण है।

पवन ऊर्जा के लाभ

  • स्वच्छ ऊर्जाः पवन ऊर्जा, अन्य ऊर्जा की तुलना में काफी स्वच्छ है। पवन ऊर्जा को उत्पादित करने वाली टरबाइन किसी भी प्रकार का वायुमण्डलीय उत्सर्जन नहीं करती जिनसे ग्रीनहाउस गैस व एसिड वर्षा जैसी समस्या उत्पन्न हो।
  • सस्ती ऊर्जाः पवन ऊर्जा कम लागत प्रभावी ऊर्जा है, यह आज उपलब्ध सबसे कम कीमत वाली नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में से एक है।
  • सुविधाजनकः टरबाइन को किसी भी स्थान पर स्थापित किया जा सकता है तथा इसके आस-पास के क्षेत्र में दैनिक कार्य किये जा सकते हैं। पवन ऊर्जा का उपयोग कई कार्यों के लिये किया जाता है, जैसे कि पानी की पंपिंग, बैटरी को चार्ज करने के लिये, बिजली का व्यापक उत्पादन करने के विकल्प के रूप में आदि।
  • यह सुरक्षित हैः पवन ऊर्जा संयंत्रें का संचालन सुरक्षित है। आधुनिक एवं उन्नत माइक्रोप्रोसेसरों के प्रयोग से संयंत्र पूर्णतः स्वचालित हो गया है तथा संयंत्र के परिचालन के लिए अधिक श्रमिकों की आवश्यकता भी नहीं होती है।
  • अधिक स्थान की आवश्यकता नहीं: पवन चालित प्रणाली के लिए तुलनात्मक रूप से कम स्थान की आवश्यकता होती है और इसे हर स्थान पर जहाँ वायु की स्थिति अनुकूल होती है लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए इसे पहाड़ी के शिखर पर, समतल भू-प्रदेश पर, वनों तथा मरुस्थलों तक में लगाया जा सकता है। संयंत्र को अपतटीय क्षेत्रों तथा छिछले पानी के साथ कृषि योग्य भूमि पर भी लगाया जा सकता है।

पवन ऊर्जा के विकास में बाधाएँ

नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि के लिए केन्द्र सरकार के मजबूत सहयोग के बावजूद 2022 तक के लक्ष्य के प्राप्ति में पवन ऊर्जा के विकास में कई बाधाएं हैं। चूंकि विद्युत क्षेत्र समवर्ती सूची का विषय है जिससे केन्द्र एवं राज्य सरकारों के मतभेद और स्थानीय मुद्दे को तरजीह दिये जाने से अवसंरचनात्मक विकास में बाधा आती है। इसके अलावा कुछ अन्य समस्याएँ हैं जिन्हे निम्न बिंदुओं के अंतर्गत देखा जा सकता है-

  • दक्षिण के प्रमुख राज्यों के अंतर्विरोधों के चलते पारेषण लाइनों (Transmission Lines) के विकास में बाधाएं उत्पन्न हुई हैं।
  • अवसंरचना विकास के लिए किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण भी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आती है।
  • बिजली उत्पादन कम्पनी में वित्त एवं तकनीकी की कमी ने भी पवन ऊर्जा के प्रभावी विकास में बाधा उत्पन्न की है।
  • पवन ऊर्जा की उत्पत्ति और उपयोगिता की कुछ सीमाएं हैं। पवन स्थल की दूरी शहरों से अधिक है। टरबाइनों से ध्वनि प्रदूषण की समस्या बनी रहती है। टरबाइनों के ब्लेड से स्थानीय वन्य जीवों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है।
  • केंद्रीय नोडल एजेंसियों और राज्य की वितरण कंपनियों ने फरवरी 2017 से 12,000 मेगावाट से अधिक क्षमता की पवन ऊर्जा का आवंटन किया है। हालांकि, जमीनी स्तर पर प्रगति धीमी रही है और वित्त वर्ष 2018-19 में केवल 1,600 मेगावाट का इजाफा हुआ। जमीन अधिग्रहण से जुड़े मुद्दे और पारेषण संपर्क के कारण परियोजनाओं के क्रियान्वयन में हुई देरी इसकी संभावनाओं को सीमित कर देती है।

पवन ऊर्जा वृद्धि के लिये प्रयास

पवन ऊर्जा सम्मेलन का प्रथम संस्करण 25-28 सितंबर 2018 को जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में आयोजित किया गया था। वैश्विक पवन ऊर्जा शिखर सम्मेलन 2018 व्यापार, नेटवर्किंग तथा सूचना के लिहाज से पवन ऊर्जा इंडस्ट्री के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

पवन ऊर्जा से सम्बन्धित इस सम्मेलन में 1400 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए। यह विश्व का सबसे बडा पवन ऊर्जा कार्यक्रम था। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य नेटवर्क, व्यापार एवं दुनियाभर में लोगों के बीच पवन ऊर्जा का प्रसार करना था।

इस पवन ऊर्जा कार्यक्रम में 100 से अधिक देशों ने भाग लिया जिसमें भारत, चीन, अमेरिका, स्पेन एवं डेनमार्क आदि भी शामिल थे। इस सम्मेलन में दुनियाभर से आये विशेषज्ञों को इको-फ्रेंडली तकनीक के लिए प्लेटफॉर्म प्राप्त हो सका। वैश्विक पवन उर्जा सम्मेलन के तीन मुख्य विषय थे- गतिशील बाजार, कम लागत, स्मार्ट ऊर्जा। इस शिखर सम्मेलन में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण थी क्योंकि भारत की कई कंपनियां हिस्सा ले रही थीं। यह कार्यक्रम पवन ऊर्जा की दिशा में सभी को आकर्षित करने में सफल रहा।

आगे की राह

वर्तमान पर्यावरण ह्वास को देखते हुए इस बात की आवश्यकता है कि ऊर्जा उत्पादन हेतु नवीनीकृत ऊर्जा के संभाग को बढ़ाया जाए ताकि विकास एवं पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे।

इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की पाँचवीं आकलन रिपोर्ट के अनुसार जीवाश्म ईंधन दहन एवं उद्योगों के कारण लगभग 78 प्रतिशत तक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन होता है। हाल ही में वैश्विक स्तर पर तटीय पवन ऊर्जा को बढ़ाने की ओर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है। इसके लिये उत्तरी सागर के डोगर बैंक पर कृत्रिम द्वीप बनाया जाना है। भारत में पवन ऊर्जा विकास के लिये तटीय क्षेत्रों में पौधों को लगाया जाना होगा। पवन टॉवरों की उन्नत तकनीकी का प्रयोग करना होगा, साथ ही जैव-ऊर्जा, अपशिष्ट प्रबन्धन ऊर्जा एवं भूतापीय तथा समुद्री ऊर्जा के विकास के लिये नई प्रौद्योगिकी को बढ़ाना होगा जिससे पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहे।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-3

  • बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।


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