सार्वजनिक स्वास्थ्य व राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


सार्वजनिक स्वास्थ्य व राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


सन्दर्भ :-

आई एम एफ द्वारा जारी यह वक्तव्य कि " कोविड-19 में उत्पन्न संकट ,महान वैश्विक मंदी के उपरांत सर्वाधिक प्रभावी है। " इससे यह निष्कर्षित है कि सार्वजानिक स्वास्थ्य में कमी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। अतः भारतीय अर्थव्यवस्था तथा सार्वजानिक स्वास्थ्य के सम्बन्ध का अवलोकन आवश्यक हो जाता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था तथा कोरोना संकट :-

  • विश्व बैंक तथा अन्य क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के मानकों के अनुसार वर्ष 2021 में भारत की वृद्धिदर सर्वाधिक न्यूनतम आकड़ो तक पहुंचेगी ( उदारीकरण के उपरांत)। भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने भारत को 2021 में नकारात्मक वृद्धिदर की स्थिति का संकेत दिया है। हालाँकि आई एम एफ द्वारा भारत हेतु प्रस्तावित 1.9 % की वृद्धिदर सम्पूर्ण G-20 देशो में सर्वाधिक है।
  • कोरोना संक्रमण के प्रतिक्रमण स्वरुप किये गए लाकडाउन के प्रथम माह में ही बेरोजगारी दर 6.7% से बढ़कर 26% हो गई। जिसके परिणाम स्वरुप देश के लगभग 45 % परिवारों की आय में पिछले वर्ष की तुलना में गिरावट दर्ज की गई है।
  • पूर्ण लॉकडाउन के दौरान भारतीय आर्थिक गतिविधियों का 25% से भी कम हिस्सा कार्यरत था जिसके फलस्वरूप देश को आर्थिक क्षति हो रही थी। भारत में प्रवासी श्रमिक वर्ग सर्वाधिक सुभेद्य था जबकि किसानो की स्थिति भी अनिश्चित हो गई थी। होटल और एयरलाइंस जैसे विभिन्न व्यवसाय, वेतन में कटौती कर रहे हैं और कर्मचारियों की छंटनी कर रहे हैं।
  • अतः यह निष्कर्षित है कि सार्वजानिक स्वास्थ्य में गिरावट से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को गंभीर क्षति होती है।

सार्वजानिक स्वास्थ्य में गिरावट के प्रभाव :-

प्रत्यक्ष प्रभाव :-

  • स्वास्थ्य व आर्थिक वृद्धि में सहसम्बन्ध समझने हेतु सर्वप्रथम आवश्यक है कि स्वास्थ्य के वृहद् मानदंड को समझा जाये। स्वास्थ्य मात्र रोगों का आभाव नहीं वरन यह एक व्यक्ति की आंतरिक क्षमता का सूचक है जिससे वह निरंतर अपनी योग्यता को बढ़ा सकता है। अतः यह सिद्ध है की भारत द्वारा जनसांख्यिकीय लाभ को वास्तविक रूप में प्राप्त करने हेतु स्वास्थय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
  • इसके साथ ही भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा श्रमिक वर्ग , किसान पर निर्भर है इसके साथ ही सेवा क्षेत्र को मजबूत करने हेतु भी बेहतर स्वस्थ्य की आवश्यकता होती है। ये सभी करक अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं।
  • ऐतिहासिक अध्ययनों के परिणाम स्वास्थ्य और आर्थिक विकास के बीच बहुत मजबूत संबंध का सुझाव देते हैं।रॉबर्ट डब्ल्यू फ़ोगेल ने निष्कर्ष दिया कि पिछले 200 वर्षों में इंग्लैंड के आर्थिक विकास के एक तिहाई सुधार वहां की जनसँख्या के भोजन की खपत में सुधार के कारण है।

अप्रत्यक्ष प्रभाव :-

  • गरीबी का दुष्चक्र :- स्वास्थ्य में गिरावट परिवारों के आय को कम करती है। जिससे जीवन के अन्य महत्वपूर्ण आयामों की मांग कम हो जाती है जो पुनः आर्थिक वृद्धि दर को कम करती है।
  • शिक्षा पर प्रभाव :- पारिवारिक आय के स्वास्थ्य क्षेत्रक में जाने से शिक्षा के क्षेत्र में खर्च कम हो जाता है जो पुनः मानव संसाधन विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।
  • असमानता को जन्म :- स्वास्थ्य में अधिक खर्च आर्थिक असमानता को जन्म देता है। जो संबैधानिक सिद्धांतो के विरुद्ध है।

सार्वजानिक स्वास्थ्य पर ब्यय की आवश्यकता का अवलोकन :-

  • इस तथ्य के साक्ष्य हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्राथमिक चिकित्सा में निवेश से समृद्ध आर्थिक लाभांश मिलता है। डब्ल्यूएचओ कमीशन ऑन मैक्रोइकॉनॉमिक्स एंड हेल्थ (2001) के अलावा, दो अन्य अर्थशास्त्रियों की अगुवाई वाली रिपोर्ट इनवेस्टिंग इन हेल्थ (1993, 2013) ने निष्कर्ष निकाला कि जनसंख्या स्वास्थ्य में निवेश से आर्थिक विकास के समृद्ध लाभ प्राप्त होंगे। 2013 की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों को स्वास्थ्य में निवेश पर क्रमशः 9 से 20 गुना प्रतिफल की प्राप्ति होगी ।
  • फ्रांस और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपतियों की अध्यक्षता में संयुक्त राष्ट्र के एक उच्च स्तरीय आयोग ने 2016 में रिपोर्ट दी कि स्वास्थ्य कर्मचारियों के आकार और कौशल को बढ़ाने के लिए निवेश से बेहतर जनसंख्या स्वास्थ्य और उत्पादकता के माध्यम से आर्थिक विकास होता है,
  • भारत द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश भारत को वृहद् जनसांख्यिकीय लाभ की ओर ले जाती है । जनसांख्यिकी रूप से युवा आबादी द्वारा किए गए उत्पादकता को संरक्षित किया जा सकता है। विविध स्वास्थ्य कर्मचारियों की शिक्षा और कौशल जनसंख्या और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का उत्थान कर सकते हैं। भारत में क्षमता है की घरेलु स्वस्थ्य आवश्यकताओं को पूर्ण करने के उपरांत भारत विस्तारित वैश्विक स्वास्थ्य सेवा प्रदान कर अपनी वैश्विक छवि मजबूत कर सकता है।
  • इन सिद्धांतो ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण को आगे बढ़ाया।अब यह प्रश्न संभव है की आर्थिक मंदी के दौर में सार्वजानिक स्वास्थ्य पर व्यय कैसे किया जाये ? इतिहास हमें सिखाता है कि इस तरह का निवेश आर्थिक प्रतिकूलता के समय में विशेष रूप से उपयोगी है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने 1990 के दशक के एशियाई वित्तीय संकट के दौरान और उसके तुरंत बाद स्वास्थ्य और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में निवेश किया। द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद यूनाइटेड किंगडम ने सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को स्वीकारा । जापान ने 1960 के दशक की शुरुआत में उस युद्ध में हार से प्रभावित आर्थिक चोटों से उबरने के लिए इसे लागू किया था । उन सभी ने माना कि स्वास्थ्य में अधिक निवेश आर्थिक विकास के लिए उपयोगी है है। भारत को भी अपनी आर्थिक वृद्धि के प्रक्षेपवक्र को बढ़ावा देने के लिए इस मार्ग का अनुशरण करना होगा ।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र- 3

  • अर्थशास्त्र

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य में निवेश की आवश्यकता पर चर्चा करें? यह राष्ट्रीय आय को कैसे बढ़ाता है?

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