भारत में बैंकिंग क्षेत्र - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


भारत में बैंकिंग क्षेत्र - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


संदर्भ: -

भारतीय रिजर्व बैंक बैंकिंग धोखाधड़ी के लिए एक विशेष विंग को निर्मित करने की प्रक्रिया में है।

पृष्ठभूमि:-

  • पंजाब नेशनल बैंक  तथा यस बैंक जैसे संकटों ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली को अब बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
  • इन मुद्दों के कारण आरबीआई के शीर्ष प्रबंधन द्वारा धोखाधड़ी की निगरानी का विचार लाया गया था।

भारत में बैंकिंग क्षेत्र के सामने समस्या: -

परिसंपत्ति  गुणवत्ता:

  • भारत के बैंकों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बुरे ऋणों में वृद्धि है। पिछले कुछ वर्षों में अर्थव्यवस्था में मंदी के कारण  गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) में वृद्धि हुई। ये ऐसे ऋण हैं जो उधारकर्ता द्वारा वापस नहीं किए जाते हैं। इस प्रकार, वे बैंक के लिए एक नुकसान हैं।
  • 31 मार्च, 2018 तक, अनंतिम अनुमानों के अनुसार  अर्थव्यवस्था में सकल एनपीए की कुल मात्रा 10.33 लाख करोड़ रुपये है। इनमें से लगभग 85% एनपीए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ऋण और अग्रिम से हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय स्टेट बैंक में एनपीए 2.23 लाख करोड़ रुपये है।
  • पिछले कुछ वर्षों में, बैंकों का सकल एनपीए (कुल ऋण का प्रतिशत के रूप में) 2008 में कुल ऋण का 2.3% से बढ़कर 2017 में 9.3% हो गया है
  • पुनर्निर्मित परिसंपत्तियों ने भी बैंक की लाभप्रदता पर दबाव डाला। कुल मिलाकर, ऐसी स्ट्रेस्ड एसेट्स सिस्टम में कुल लोन का 10.9% हिस्सा होती हैं। और ये केवल ऋण हैं जो तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के रूप में पहचाने जाते हैं।
  • आईएमएफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल कर्ज का 36.9% जोखिम में है तथा बैंकों में केवल 7.9% नुकसान को अवशोषित करने की क्षमता है। अतः इन ऋणों के न मिलने पर बैंकिंग सिस्टम को अत्यधिक हानि होगी।

पूंजी पर्याप्तता:

  • इस प्रावधान के अंतर्गत बैंक बैड लोन्स के सापेक्ष एक निर्धारित अनुपात में धन राशि हटा कर सुरक्षित रखते हैं । इस धन का उपयोग उधार सहित किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता है। परिणामतः यह  बैंकों के पास अपने विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग करने के लिए कम पूंजी उपलब्ध कराता  है।
  • पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय बैंकों विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए CRAR में लगातार गिरावट आई है, । इसके अलावा, बैंक आसानी से धन नहीं जुटा पा रहे हैं, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक जिनके पास ऋणों की संख्या अधिक है। यदि बैंक जल्द ही अपनी पूंजी नहीं लगाते हैं, तो कुछ आरबीआई द्वारा निर्धारित न्यूनतम पूंजी आवश्यकता को पूरा करने में विफल हो सकते हैं। ऐसे में, वे गंभीर मुद्दों का सामना कर सकते थे।

विदेशी मुद्रा जोखिम:

  • विदेशी मुद्रा विनिमय  बाजार में  wild gyrations ऐसी  भारतीय कंपनियों की एकाउंट्स  में महत्वपूर्ण तनाव स्थापित करने की  क्षमता रखते हैं, जिन्होंने विदेशों में भारी उधार लिया है। "यह तनाव भारतीय बैंकों को ऋण चुकाने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकता है। परिणामस्वरूप, आरबीआई चाहता है कि बैंक विदेशी मुद्राओं में अनावश्यक कर्ज न लें ।

बैलेंस शीट प्रबंधन:

  • पिछले कुछ वर्षों में, कई बैंकों CRAR के रूप में धन अलग करने में देरी की है  (भविष्य के खराब ऋण के लिए)। इसका एक कारण यह है कि एक बैंक के मुख्य अधिकारियों का कार्यकाल कम होता है, जिस दौरान वे उच्च शुद्ध लाभ और निवेशकों को खुश करना चाहते हैं। "परन्तु  यह सोचना चाहिए कि सीईओ / सीएमडी आएंगे और जाएंगे लेकिन संस्थाएं स्थायी  हैं। केवल एक चीज जो उनके अस्तित्व को बनाए रख सकती है वह है एक मजबूत और स्वस्थ बैलेंस शीट।"
  • इस तरह के अनियमितताएं  दीर्घकाल  में हानिकारक है। यह वित्तीय दबावों को झेलने की बैंक की क्षमता को कम करता है। भारतीय बैंकों में कमजोर  पूंजी की पर्याप्तता को देखते हुए यह और भी अधिक चिंताजनक  है। वास्तव में, निवेशक तब  अधिक खुश होंगे यदि प्रबंधन उच्च शुद्ध लाभ पोस्ट करने के बजाय समस्याओं को संबोधित करता है और उन्हें दूर करता है।

भारत में बैंकिंग क्षेत्र पर स्थायी समिति की रिपोर्ट

  • वित्त संबंधी स्थायी समिति ने भारत में 31 अगस्त, 2018 को बैंकिंग क्षेत्र पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।  बैंकों में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की उच्च मात्रा ने उनके पूंजी आधार को मिटा दिया है,  तथा ऋण  देने की उनकी क्षमता को प्रतिबंधित कर दिया है।

समिति की प्रमुख प्राप्तियां तथा अनुशंसाएं निम्न हैं

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एनपीए:

  • समिति ने उल्लेख किया कि उच्च ऋण राइट-ऑफ और एनपीए की समस्या, , निजी बैंकों की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के लिए अधिक गंभीर है। हालांकि, यह कहा गया है कि एक बार अधिकांश बड़े एनपीए इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड या अन्य तंत्रों के अनुसार हल हो जाते हैं, तो स्थिति पीएसबी के लिए बेहतर हो जाएगी। इस संबंध में समिति ने कहा कि वर्तमान संकट क्षणिक है और इससे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण का कारण  नहीं होना चाहिए।
  • समिति ने एनपीए के परिणामस्वरूप पीएसबी की अल्पकालिक आय में सीमित सुधार के बारे में चिंता व्यक्त की। बैंको में बढ़ती धोखाधड़ी के कारण समिति ने  सार्वजनिक क्रेडिट रजिस्ट्री स्थापित करने के लिए एक कानून बनाने की सिफारिश की।
  • जोखिम-भारित संपत्ति अनुपात (CRAR) की आवश्यकता पूर्ती के लिए पूंजी का कम होना:
  • समिति ने नोट किया कि बैंकों को अत्यधिक लाभान्वित होने से रोकने के लिए RBI की न्यूनतम CRAR की आवश्यकता 9% है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय बैंकों के लिए बासेल III मानदंडों से 1% अधिक है। यह सभी पीएसबी पर लागू होता है।
  • समिति ने देखा कि इन बैंकों के लिए सीआरएआर की इतनी अधिक आवश्यकता अव्यावहारिक है और इसमें  निम्न छूट मिलेगी
  • लगभग 5.34 लाख करोड़ रुपये की पूंजी दी जाये
  • ऋण बढ़ाएं और सालाना 50,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय उत्पन्न करें,
  • इन बैंकों में पूंजी डालने की आवश्यकता से बचें

त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) के तहत बैंक:

  • समिति ने अवलोकित किया कि 11 पीएसबी को पूंजी अपर्याप्तता और उच्च एनपीए जैसे कारकों के आधार पर आरबीआई द्वारा पीसीए ढांचे के तहत रखा गया है। इन बैंकों ने ऋण देने और जमा करने की क्षमताओं को प्रतिबंधित कर दिया है। पीसीए लगाए जाने के बावजूद, इन बैंकों में वसूली या तो स्थिर हो गई है, या मामूली रूप से बढ़ी है।
  • समिति ने सिफारिश की कि RBI को इन बैंकों को रोडमैप प्रदान करना चाहिए ताकि वे पीसीए से बाहर निकल सकें और सामान्य परिचालन फिर से शुरू कर सकें।
  • यह देखा गया कि क्रेडिट उपलब्धता की समस्या को बढ़ाकर, पीसीए के तहत अधिक बैंकों को लाने से बैंकिंग क्षेत्र और अर्थव्यवस्था दोनों पर असर पड़ेगा।
  • समिति ने  अनुशंसा  की कि पीसीए के तहत बैंकों पर कड़ी निगरानी रखी जाए, और प्रतिबंधों में ढील दी जाए , उनकी समीक्षा की जाए, विशेषतया  उन बैंकों के लिए जहां खुदरा बैंकिंग भी प्रतिबंधित है। इसने यह भी सिफारिश की थी कि धोखाधड़ी को रोकने के लिए RBI के knee-jerk  प्रतिक्रियाएं, जैसे कि लेटर ऑफ अंडरटेकिंग  (सस्ते क्रेडिट प्रदान) करते हैं, से बचा जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें क्रेडिट वृद्धि में बाधा होती है।

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का प्रदर्शन:

  • समिति ने उल्लेख किया कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत बड़े एनपीए का समाधान 270 दिनों की निर्धारित समयावधि की तुलना में अधिक समय ले रहा है। इसने अनुशंसा  की कि एनसीएलटी के संसाधनों को बढ़ाकर उन्हें ऐसे मामलों को तेजी से निपटाने में सक्षम बनाया जाए।
  • इसके अलावा, समिति ने कहा कि कई ऋणदाताओं को अपने कुछ ऋणों के लिए बड़े '‘haircuts’' (ऋण राशि और जमानत के मूल्य के बीच अंतर) लेना पड़ा। इसने सिफारिश की कि बोली लगाने के लिए एक उचित आधार मूल्य तय किया जाना चाहिए ताकि NCLT में IBC प्रक्रिया के दौरान लेनदारों द्वारा बड़े 'haircuts' से बचा जा सके।

पीएसबी के मामले में आरबीआई की शक्तियां:

  • समिति ने उल्लेख किया कि  आरबीआई ने कहा था कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के तहत RBI को उपलब्ध कुछ शक्तियां PSB के मामले में उपलब्ध नहीं हैं।
  • इसमें निम्न शामिल है:
    • बैंकों के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक को हटाना और नियुक्त करना,
    • निदेशक मंडल का अधिशेष
    • लाइसेंस देना
  • समिति ने यह भी उल्लेख किया कि  आरबीआई निम्न कार्य  कर सकता है
  • बैंक का निरीक्षण करें,
  • वरिष्ठ बैंक अधिकारियों की नियुक्ति पर सरकार के साथ परामर्श करें,
  • PSB की प्रबंधन समिति में एक  व्यक्ति  नामित कर सकता है।

इस संबंध में, समिति ने अनुशंसा की कि सरकार को विभिन्न विधियों के तहत प्रदान की गई पीएसबी के संबंध में आरबीआई की शक्तियों का मूल्यांकन करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करना चाहिए।

PSB कर्मचारियों के लिए प्रोत्साहन:

  • समिति ने अनुशंसा  की कि पीएसबी के वरिष्ठ प्रबंधन को उच्च पारिश्रमिक दिया जाए, क्योंकि उनके निजी क्षेत्र के समकक्षों के साथ एक व्यापक अंतर मौजूद है। इसके अलावा, सुगम संक्रमण की सुविधा के लिए क्रमिक सीईओ के कार्यकाल के बीच एक ओवरलैप प्रदान किया जाना चाहिए।
  • वरिष्ठ बैंकरों की विशेषज्ञता का उपयोग करने के लिए PSBs के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर 70 वर्ष (निजी बैंकों के समान) की जानी चाहिए। इसके अलावा,बैंकरों पर किसी  कार्रवाई से पहले उन्हें  अपने निर्णय को समझाने का मौका दिया जाना चाहिए।

आगे का रास्ता :-

  • बैंक हर अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बैंक आर्थिक रूप से स्वस्थ रहें। अन्यथा, एक वित्तीय संकट (2008 में अमेरिका की तरह ) देश को प्रभावित कर सकता है।
  • यह भारत जैसे विकासशील देशों के लिए  “बैंक अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा हैं और आर्थिक विकास को सक्रिय करने और बनाए रखने में एक उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं।
  • यह भारत में आर्थिक मंदी का समय है। जैसा कि हम जानते हैं कि वित्तीय संस्थान देश की अर्थव्यवस्था में प्रभावी भूमिका निभाते हैं और एक-दूसरे पर  निर्भर हैं । इसलिए जमाकर्ताओं के हित के लिए, फिनेशियल संस्थानों की विश्वसनीयता के लिए यह बहुत आवश्यक है कि सरकार इन मुद्दों से निपटने के लिए आगे कदम उठाए।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र- 3

  • अर्थव्यवस्था

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • भारतीय रिजर्व बैंक बैंकिंग धोखाधड़ी के लिए एक विशेष विंग को निर्मित करने की प्रक्रिया में है।

 

 

 

© www.dhyeyaias.in

<< मुख्य पृष्ठ पर वापस जाने के लिये यहां क्लिक करें