मनरेगा के प्रावधानों पर पुनर्विचार की आवश्यकता - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


मनरेगा के प्रावधानों पर पुनर्विचार की आवश्यकता - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चर्चा का कारण

  • कोरोना महामारी के फैलाव और लॉकडाउन की लंबी अवधियों के बीच भारत में लगभग आठ करोड़ प्रवासी श्रमिक अपने गांवों में लौट रहे हैं। कोरोना संकट के बीच आने वाले दिनों के लिए श्रम शत्तिफ़ में सुधार से जुड़े सवाल भी उठे हैं और संघीय ढांचे वाले भारत के लिए विकास कार्यक्रमों और नीतियों पर नये सिरे से चिंतन और क्रियान्वयन की जरूरत भी आ पड़ी है। ऐसे में जानकारों का मानना है कि यह मनरेगा के पुनरुद्धार के लिए बेहतर समय है।
  • गौरतलब है कि भारत सरकार ने हाल ही में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के लिये अतिरिक्त 40,000 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा की है। इससे घर लौट रहे प्रवासी श्रमिकों को रोजगार मुहैया कराने में मदद मिलेगी।

परिचय

  • कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के दौरान अन्य योजनाओं के साथ मनरेगा का भी कार्य पूरी तरह ठप पड़ गया। मजदूरों की माली हालत को देखते हुए और लॉकडाउन की अवधि में बढ़ोतरी के कारण केंद्र सरकार ने मनरेगा के अंतर्गत तालाब बनाना, कुएं खोदना, बागबानी से जुड़ी गतिविधियां आदि के कार्य धीरे-धीरे शुरू करवाये हैं।
  • साथ ही सरकार का जोर महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत निजी संपत्ति को बढ़ावा देने पर है। ग्रामीण विकास मंत्रलय मनरेगा की बकाया देनदारी पूरी करना शुरु कर रही है। गौरतलब है कि इस वित्त वर्ष में मनरेगा में 8 करोड़ लोग पंजीकृत हुए हैं।
  • श्रम मंत्रलय ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केंद्र शासित प्रदेशों के लेफ्रिटनेंट गवर्नरों को सुझाव दिया है कि वो डीबीटी के जरिए निर्माण क्षेत्र के कामगारों के खातो में उस सेस फंड से जो लेबर वेलफेयर बोर्ड ने इकठ्ठा किया था, खर्च करें। इस सेस फंड में 52,000 करोड़ इकठ्ठा है। करीब 3-5 करोड़ निर्माण क्षेत्र में कामगर इन बोर्डों में रजिस्टर्ड हैं।
  • जिन इलाकों में कोविड-19 संक्रमण (Covid-19 Pandemic) के नये मामले कम आ रहे हैं या जहाँ अब कोरोना पर अपेक्षाकृत काबू पा लिया गया है, उन क्षेत्रें में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत विभिन्न विकास कार्य शुरू किए जा रहे हैं।

मनरेगा योजना

  • मनरेगा का पूरा नाम महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना है, इससे पूर्व इस योजना को राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना (एनआरईजीए) नरेगा के नाम से जाना जाता था।
  • केंद्र सरकार ने इस योजना की शुरुआत 2 अक्टूबर 2005 को की थी। इसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम के अंतर्गत रखा गया था। इस योजना को ग्रामीण लोगों की क्रय शत्तिफ़ को बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। 31 दिसंबर 2009 को इस योजना के नाम में परिवर्तन करके इसे महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना कर दिया गया। मनरेगा योजना में ग्रामीण लोगों को अपने परिवेश में ही रोजगार प्राप्त हो जाता है। केंद्र सरकार ने इस योजना के अंतर्गत 100 कार्य दिवस के रोजगार की गारंटी दी है।
  • इस योजना में मजदूरी का भुगतान बैंक या डाकघर के बचत खातों के माध्यम से किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर नगद भुगतान की व्यवस्था विशेष अनुमति लेकर की जा सकती है।
  • इस योजना के अंतर्गत विभिन्न कार्य कराये जाते हैं, जिनमें से प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं -
  • जल संरक्षण
  • सूखे की रोकथाम के अंतर्गत वृक्षारोपण
  • बाढ़ नियंत्रण
  • भूमि विकास
  • विभिन्न तरह के आवास निर्माण
  • लघु सिंचाई
  • बागवानी
  • ग्रामीण सम्पर्क मार्ग निर्माण
  • कोई भी ऐसा कार्य जिसे केन्द्र सरकार राज्य सरकारों से सलाह लेकर अधिसूचित करती है।

सरकारी प्रयास

  • भारत में रक्षा क्षेत्र के स्वदेशीकरण से संबंधित कई चुनौतियाँ व्याप्त हैंः
  • भारत पर ऐसे आरोप लगते हैं कि यहाँ रक्षा हथियारों की खरीद (Procurement) प्रक्रिया काफी धीमी रहती है, जो उत्पादकों को हतोत्साहित करती है।
  • रक्षा क्षेत्र की भारतीय कम्पनियाँ जिन हथियारों या अन्य सामग्रियों का निर्माण करती हैं, उनमें उन्नत प्रौद्योगिकी सीमित तौर पर उपस्थित होती है जिससे वे विश्व के अन्य अत्याधुनिक हथियारों से प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर पाते हैं। इसलिए भारतीय सेना स्वेदशी हथियारों की खरीद पर कम बल देती है।
  • भारत सरकार ऐसी कोई भी नीति को निर्मित नहीं करती है जिससे कि स्वदेशी कम्पनियों को पता चल सके कि आने वाले समय में सरकार किस तरह के और कितने हथियारों या अन्य रक्षा सामग्री की खरीद करेगी। ऐसा न करने से भारतीय रक्षा कम्पनियाँ पहले से तैयारी नहीं कर पाती हैं।
  • रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), भारत सरकार का सलाहकार, विकासकर्ता और मूल्यांकनकर्ता है (रक्षा क्षेत्र से सम्बन्धित)। जब कोई निजी कम्पनी सरकार के लिए रक्षा सामग्री का उत्पादन करती है तो डीआरडीओ ही उसका मूल्यांकन (Evaluation) करता है, लेकिन कभी-कभी देखने में आता है कि डीआरडीओ और निजी कम्पनी एक ही प्रकार के उत्पाद बनाती हैं तो इस स्थिति में डीआरडीओ का निजी कम्पनी के परिप्रेक्ष्य में हितों का टकराव (Conflict of interests) हो जाता है जो निजी क्षेत्र के लिए घातक है।

सरकार के प्रयास

  • कोविड-19 कंटेनमेंट जोन में रह रहे लोगों के लिए आरोग्य सेतु मोबाइल ऐप इस्तेमाल करना जरूरी होगा। केन्द्रीय गृह मंत्रलय के आदेश के मुताबिक, पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर के सभी कर्मचारियों के लिए आरोग्य सेतु ऐप का इस्तेमाल अनिवार्य होगा। सभी संस्थानों (सरकारी और प्राइवेट सेक्टर) के प्रमुख की यह जिम्मेदारी होगी कि वह यह सुनिश्चित करें कि सभी कर्मचारियों द्वारा ऐप का इस्तेमाल किया जाए।

सुझाव

  • भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग ने कोविड-19 वैश्विक महामारी के मद्देनजर राज्य सरकारों के साथ करीबी सहयोग में कई कदम उठाए हैं। इसी क्रम में भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा के तहत काम करने वाले श्रमिकों की मजदूरी को 1 अप्रैल, 2020 से संशोधित करने का निर्णय लिया है। मनरेगा मजदूरी में 20 रुपये की औसत राष्ट्रीय वृद्धि की गई है। अब तक सरकार मनरेगा मजदूरों को रोज की मजदूरी के तौर पर 182 रुपये देती थी, जो अब बढ़कर 202 रुपये हो गया है।
  • मनरेगा के तहत मुख्य तौर पर व्यक्तिगत लाभार्थी-उन्मुख कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया गया है जिससे सीधे तौर पर एससी, एसटी और घरेलू महिलाओं के अलावा लघु एवं सीमांत किसान तथा अन्य गरीब परिवार लाभान्वित होते हैे। हालांकि यह सुनिश्चित करने के लिए राज्यों के साथ-साथ जिला अधिकारियों के भी परामर्श एवं मार्गदर्शन की आवश्यकता होगी कि लॉकडाउन की अवधि में दिशानिर्देशों का उल्लंघन न होने पाए और सामाजिक दूरी के मानदंडों का गंभीरतापूर्वक पालन किया जाए।
  • कोविड-19 के प्रसार को देखते हुए गृह मंत्रलय ने नई गाइडलाइन भी जारी की हैं जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि कैसे यथोचित आपसी दूरी, मुँह पर मास्क और अन्य सुरक्षा मानकों का ध्यान रखते हुए मनरेगा के तहत काम किया जाएगा।
  • गृह मंत्रलय ने यह भी साफ तौर पर कहा है कि इन कार्यों में प्राथमिकता सिंचाई और जल संरक्षण से जुड़े कामों को ही दी जाएगी। इसके अतिरिक्त सिंचाई और जल संरक्षण से जुड़ी विभिन्न केंद्र और राज्य स्तरीय योजनाएं भी कार्यान्वित की जा सकेंगी और उनका समायोजन मनरेगा के तहत होगा।

चुनौतियाँ

  • 13 मई तक 14-62 लाख व्यक्ति प्रतिदिन (पर्सन-डे) का काम उत्पन्न हुआ, साथ ही मनरेगा के तहत 10 हजार करोड़ रुपये का खर्च किया गया। इसके अतिरिक्त 2-33 करोड़ मनरेगा का काम मांगने वालों को 13 मई तक काम दिया गया। सरकार का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले 40-50 फीसदी ज्यादा व्यक्ति मनरेगा के तहत नामांकित किए गए।
  • उपर्युक्त आँकड़े तो सरकार की बेवसाइट से मेल खाते हैं, लेकिन 40-50 फीसदी ज्यादा लोग मनरेगा के तहत नामांकित किए गए ये बात उनकी ही बेवसाइट पर नहीं दिखती।
  • सरकारी आँकड़ों के मुताबिक मार्च महीने तक तकरीबन 18 करोड़ 19 लाख ‘व्यक्ति प्रतिदिन’ काम हुआ था, जो अप्रैल-मई में 13 करोड़ 60 लाख व्यक्ति प्रतिदिन रह गया है।
  • पिछले पांच साल से मनरेगा का बजट लगभग एक सा ही रहा है। औसत देखें तो ये लगभग 60 हजार करोड़ का है। अगर सरकार ये कह रही है कि अब तक 10 हजार करोड़ खर्च हो गए तो ये कोई नई सूचना नहीं है। पिछले साल के बकाया चुकाने और नए साल के काम का पैसा देने में ये खर्च तो होना ही था।
  • भारत सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल अप्रैल के महीने में पिछले पांच सालों में सबसे कम काम हुआ है। साल 2015 को छोड़ दिया जाए तो ये पिछले पांच सालों में सबसे कम है और सरकारी दावे के बिलकुल उलट भी।
  • मनरेगा के कामों में भी सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क पहनने को अनिवार्य बना दिया गया है। लेकिन जमीन पर इसके पालन में दिक्कतें आ रही हैं। इसके अलावा मनरेगा के तहत लोगों को रोजगार देने का काम ग्राम सभाओं से पहले पास करना होता है, लेकिन लॉकडाउन की वजह से ग्राम सभाएँ बैठ नहीं पा रही हैं और इस वजह से काम की मांग ही नहीं हो पा रही है।
  • सरकारी आदेशों में सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनना और बार-बार हाथ धोने की बात तो की गई है, लेकिन इसको ग्राम पंचायतों के स्तर पर अमल में कैसे लाया जाए, यह भी बड़ी चुनौती है।

राज्यों का प्रदर्शन

  • सरकारी बेवसाइट पर उपलब्ध आँकड़ों के मुताबिक मई के महीने में मनरेगा के तहत काम देने की बात की जाए तो छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा है। उसके बाद मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है।
  • सबसे खराब प्रदर्शन वाले राज्यों की बात करें तो तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और अरूणाचल प्रदेश आदि हैं। अरूणाचल प्रदेश में तो मई में एक भी रोजगार नहीं दिया गया। उत्तराखंड, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि ऐसे राज्य हैं जिनमें रोजगार मिलने की शुरूआत हुई है, लेकिन उसकी दर बहुत कम है।
  • मनरेगा की आधिकारिक बेवसाइट पर दर्ज आँकड़ों के मुताबिक देश में सबसे ज्यादा मजदूरी दर केरल सरकार देती है और सबसे कम राजस्थान सरकार देती है।

आगे की राह

  • साल 2017 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस में छपे एक लेख के मुताबिक, मनरेगा ने ग्रामीण भारत में लोगों की कमाई पर सकारात्मक प्रभाव डाला है, जिसकी वजह से गरीबी उन्मूलन में भी मदद मिली है।
  • सरकार ना केवल उन लोगों को काम मुहैया कराए जो मजदूर मनरेगा साइट पर काम के लिए पहुंच रहे हैं, बल्कि उन्हें नगद भुगतान की भी व्यवस्था कराए। इसके अतिरिक्त सरकार मनरेगा मजदूरों के साथ-साथ प्रवासी मजदूरों की समस्याओं का हल भी मनरेगा में काम दे कर, कर सकती है। जो प्रवासी मजदूर अभी घर लौटे हैं, उनके मनरेगा कार्ड बनवा कर उन्हें भी काम दिया जाए।
  • कोविड-19 से उत्पन्न हुई वर्तमान परिस्थितियों में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी एक्ट (मनरेगा) सबसे अच्छा विकल्प हो सकता है। इससे न केवल मजदूरों को काम और पैसा मिलेगा बल्कि सामुदायिक और स्थाई परिसम्पत्तियों का भी निर्माण होगा जिनका सीधा संबन्ध कृषि, बागवानी, पशुपालन, मछली और रेशम कीट पालन आदि से है। इस महामारी में मजदूरों को आर्थिक संकट से उबारने के लिये मनरेगा को रामबाण औषधि की तरह देखा जा सकता है।

सामान्य अध्ययन पेपर-2

  • केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन, इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिए गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।
  • स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • कोविड-19 से उत्पन्न हुई वर्तमान परिस्थितियों में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी एक्ट ग्रामीण भारत में सबसे अच्छा विकल्प हो सकता है। इससे न केवल मजदूरों को काम और पैसा मिलेगा बल्कि सामुदायिक और स्थाई परिसम्पत्तियों का भी निर्माण होगा। चर्चा कीजिये।

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