पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) : डेली करेंट अफेयर्स

पॉक्सो एक्ट (POCSO Act)

चर्चा में क्यों?

बॉम्बे हाइकोर्ट की नागपुर पीठ ने एक पॉक्सो मामले के अभियुक्त को यह कहकर बरी कर दिया कि ‘‘बिना स्किन से स्किन टच किये किसी नाबालिग के अंगों को छुआ जाये तो उसे यौन हमला नहीं माना जा सकता।’’

बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पॉक्सो ...

पृष्ठभूमिः

यौन अपराधों से बच्चों को संरक्षण करने संबंधी अधिनियम 2012 (पॉक्सो) को कानूनी प्रावधानों के माध्यम से बच्चों के साथ होने वाले यौन व्यवहार और यौन शोषण को प्रभावी ढंग से रोकने हेतु लाया गया था।

प्रमुख प्रावधान:

  1. यह अधिनियम नाबालिग (18 वर्ष से कम आयु के) व्यक्ति को बच्चे के रूप में परिभाषित कर उसके विरूद्ध अवैध यौन गतिविधियों में शामिल होने से निषिद्ध करता है।
  2. यह लैंगिक रूप से तटस्थ कानून है। इसके अंतर्गत लड़कियों के साथ ही लड़कों को भी (18 वर्ष से कम उम्र के सभी व्यक्तियों को) अवैध यौन गतिविधियों के विरूद्ध संरक्षण दिया गया है।
  3. ऐसे अपराधों की त्वरित सुनवाई के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान करता है।

भारत संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन का एक पक्षकार है जिसके तहत भारत पर सभी बच्चों को सभी प्रकार के यौन शोषणों से बचाने का कानूनी दायित्व भी है।

बाल यौन शोषण का दायरा केवल बलात्कार या गंभीर यौन आघात तक सीमित नहीं है बल्कि बच्चों का इरादतन यौनिक कृत्य दिखाना, गलत तरीके से छूना, जबरन यौन कृत्य के लिये मजबूर करना और चाइल्ड पोर्नोग्राफी बनाना आदि बाल यौन शोषण के अंतर्गत आते हैं।

भारत में बाल यौन दुव्यर्वहार की स्थितिः

  1. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़ों के अनुसार भारत में 2011 में बाल यौन शोषण के लगभग 33000 मामले सामने आये हों
  2. यूनिसेफ के द्वारा 2005-13 के बीच किशोरियों पर किये गये अध्ययन के आँकड़ों के अनुसार भारत में 10-14 वर्ष की 10 प्रतिशत लड़कियों को यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा, जबकि 15 से 19 वर्ष की 30 प्रतिशत लड़कियों को इस दौरान यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा।

यद्यपि पॉक्सो (संशोधन के बाद) कानून के अंतर्गत मृत्युदण्ड जैसी सख्त दण्डात्मक प्रावधान है किंतु आवश्यक विशेष न्यायालयों (फास्ट ट्रैक अदालतों) की संख्या में कमी, पुलिस-प्रशासन-समाज में परंपरागत सोच (विषय की संवेदनशीलता को न समझना) और सुस्त न्याय प्रक्रिया के चलते न्याय मिलने में विलम्ब होता है।

कानून के क्रियान्वयन को दुरस्त किये जाने की आवश्यकता है। इसके लिये न्यायालय प्रक्रिया में आधुनिक प्रौद्योगिक (डिजिटलीकरण, एआई) के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।