जयंती विशेष : लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) : डेली करेंट अफेयर्स

जयंती विशेष : लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak)

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती मनाई गई है।

प्रमुख बिन्दु

  • भारत के प्रधानमंत्री ने लोकमान्य तिलक की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी है।
  • प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं महान लोकमान्य तिलक को उनकी जयंती पर नमन करता हूं। उनके विचार और सिद्धांत वर्तमान परिस्थितियों में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं, जब 130 करोड़ भारतीयों ने एक आत्मनिर्भर भारत बनाने का फैसला किया है जो आर्थिक रूप से समृद्ध और सामाजिक रूप से प्रगतिशील है।
  • इसके अलावा, प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकमान्य तिलक भारतीय मूल्यों और लोकाचार में दृढ़ विश्वास रखते थे। शिक्षा और महिला सशक्तिकरण जैसे विषयों पर उनके विचार बहुत से लोगों को प्रेरणा देने का कार्य कर रहे हैं। वह एक संस्थान निर्माता थे, जिन्होंने कई उच्च-गुणवत्ता वाले संस्थानों को विकसित किया, जिन्होंने वर्षों में अग्रणी रूप से कार्य किया है।

लोकमान्य तिलक

  • लोकमान्य तिलक का पूरा नाम लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक है तथा इनका जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था।
  • लोकमान्य तिलक ने ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’ का नारा दिया था।
  • इसके अलावा, लोकमान्य तिलक पेशे से वकील थे।
  • लोकमान्य तिलक की मृत्यु 1 अगस्त, 1920 को हुई थी।

भारतीय पहचान को महत्त्व देने वाले पहले नेता

  • आरंभिक समाज विज्ञानियों द्वारा पहचान को एक पुरातन विषय माना जाता था। लेकिन इसमें धीरे-धीरे परिवर्तन होने लगा और बहुत से समाज विज्ञानियों ने पहचान के महत्व को समझा और इसे मानव उद्यम को प्रेरित करने वाले कारक के रूप में पहचाना।
  • लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक आधुनिक भारत में पहचान के महत्व को आगे बढ़ाने वाले पहले नेता थे। तिलक ने महसूस किया कि पहचान नीरस पड़े समाज को सक्रिय करने का एक बेहतरीन उपकरण हो सकता है।
  • उनका मानना था कि एक बार जब लोग अपनी पहचान को समझ जाएंगे तो स्वतंत्रता के संघर्ष में शामिल होने के लिए वह स्वयं ही प्रेरित होने लगेंगे।

लोकमान्य तिलक: आधुनिक भारत के निर्माता

  • "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मै इसे लेकर रहूँगा!", यह वह नारा है जिसने स्व-राज के प्रति भारतीयों में राजनीतिक विवेक पैदा किया। • यह नारा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा दिया गया था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन उनके योगदान को देखते हुए, तिलक को भारतीय जनमानस के नेता के रूप में सम्मानित किया जा जाता है।
  • महात्मा गांधी द्वारा उन्हें “आधुनिक भारत का निर्माता” कहा जाना या ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता द्वारा “भारतीय अशांति का जनक” कहा जाना भारतीय समाज और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान और उनकी विरासत को प्रमाणित करता है।
  • तिलक स्वराज और स्वदेशी के विचार को आगे बढ़ाने वाले पहले नेता थे। उन्होने जिस तरह से लोगों में स्वराज और स्वदेशी की भावना को जगाने के लिए भारतीय संस्कृति, शिक्षा और समाचार पत्रों का उपयोग किया है उसे देखते हुये यह कहा जा सकता है कि एक दार्शनिक-राजनीतिज्ञ के रूप में उनका योगदान अतुलनीय है।

स्वराज और स्वदेशी के लिए तिलक का आह्वान

  • स्वराज और स्वदेशी दोनों में ‘स्व’ अर्थात स्वयं के द्वारा उभयनिष्ठ है। स्वाधीनता के लिए तिलक की रणनीति का पहला मजबूत कदम आत्मनिर्भरता का प्रयास था।
  • इसके लिए लोकमान्य तिलक कार्यवाही के साथ-साथ सामूहिक सोच का विकास करना चाहते थे। जिसके लिए उन्होने “केसरी और मराठा” जैसे समाचार पत्रों का सहारा लिया और “डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी” की स्थापना की।
  • संस्कृति, शिक्षा और प्रेस के माध्यम से जनमानस के बीच राजनीतिक चेतना को जागृत करने का तिलक का यह प्रयोग इतना शक्तिशाली और सफल था कि बाद में गाँधी और अंबेडकर जैसे अन्य लोगों ने भी इसी प्रयोग को अपनाया।
  • स्वराज और स्वदेशी के उनके विचारों को दबाने के लिए ब्रिटिश शासन द्वारा अपनाए गए तरीकों के तिलक के विचारों को प्रत्येक भारतीय तक पहुँचाने का कार्य किया।
  • तिलक के होमरूल आंदोलन के उद्देश्य बिलकुल स्पष्ट थे। उन्होने अपने होमरूल आंदोलन के माध्यम से स्वराज के लिए एक उर्वर जमीन तैयार करने का कम किया।
  • स्वदेशी के प्रति तिलक के विचार सिर्फ विलायती सामनों का बहिष्कार तक सीमित नहीं था। वे इस बहिष्कार को स्वदेशी उद्यमशीलता को बढ़ावा देने का एक कारक बनाना चाहते थे।
  • तिलक का स्वराज भी राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था। वह सांस्कृतिक और आर्थिक स्वतंत्रता की आवश्यकता के प्रति भी सचेत थे।
  • उनके द्वारा शुरू किए गए सार्वजनिक उत्सव- गणेश उत्सव और शिवाजी जयंती, का उद्देश्य स्पष्ट रूप से सभी जातियों और समुदायों का सांस्कृतिक मिलन करना था।
  • केसरी के एक संपादकीय में उन्होंने लिखा था, “यह (गणेश) उत्सव सदियों पुराना और सार्वभौमिक है; लेकिन इस बार इसके बारे में नई बात यह है कि सभी जातियां – न कि सिर्फ ब्राह्मण - एक साथ आई और इसे सभी हिंदुओं का त्योहार बना दिया, यह एक ऐसी चीज है जिस पर हमें गर्व करना चाहिए।"

आधुनिक भारत के भविष्यवक्ता

  • लोकमान्य तिलक के अंदर आजादी के बाद के भारत का एक खाका भी था। जिसके लिए, स्वराज के साथ-साथ स्व-भाषा और स्व-भूषा, अर्थात मातृभाषा और स्वदेशी पोशाक को उन्होने पसंद किया गया था।
  • शायद, वह पहले राष्ट्रीय नेता थे जिन्होंने भाषाई राज्यों के गठन की कल्पना की थी। उन्होंने कहा था कि हमें मराठी, तेलुगु और कन्नड़ लोगों के लिए अलग राज्य बनाना चाहिए।
  • उनका बहुत ही स्पष्ट सिद्धान्त था कि शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए।
  • एक बेहतरीन रणनीतिकार के रूप में तिलक ने दो चीजों का इस्तेमाल किया - संवैधानिकता और लोकतंत्र – जिसे ब्रिटिश शासक दुनिया को अपनी देन समझते थे। उन्होंने संपादक के रूप में अपने पेशेवर कौशल से इसका का बड़ी ही निडरता से इस्तेमाल किया।
  • उनके संपादकीय न केवल कठोर होते थे, बल्कि कानूनी निहितार्थों से बचने के लिए तर्क-वितर्क के साथ सावधानीपूर्वक लिखे जाते थे।