राजद्रोह कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील : डेली करेंट अफेयर्स

राजद्रोह कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 की धारा 124-A को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
  • गौरतलब है कि इस धारा के तहत दो पत्रकारों पर केस दर्ज हुआ था और दोनों को जेल में भी रहना पड़ा है। पत्रकारों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करते हुए कहा कि सरकारें आलोचना भी सुनने को तैयार नहीं हैं। अगर कोई आलोचना करता है तो सेक्शन 124-A के तहत उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है।

Maratha Quota Law Unconstitutional - Supreme Court : Daily Current ...

याचिककर्ताओं के तर्क

  • पत्रकारों द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि धारा 124-A बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत प्रदान किया गया है।
  • याचिका में कहा गया कि 1962 से धारा 124-ए के दुरुपयोग के मामले लगातार सामने आए हैं। इसके अतरिक्त, याचिका में कहा गया कि दुनियाभर के तुलनात्मक उपनिवेशवादी लोकतांत्रिक न्यायालयों में राजद्रोह की धाराओं को निरस्त कर दिया गया है, जबकि भारत खुद को लोकतंत्र कहता है, लेकिन पूरी लोकतांत्रिक दुनिया में राजद्रोह के अपराध को अलोकतांत्रिक, अवांछनीय और अनावश्यक बताया गया है।
  • याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि धारा 124-ए की अस्पष्टता व्यक्तियों के लोकतांत्रिक स्वतंत्रता पर एक अस्वीकार्य प्रभाव डालती है, जो वहां आजीवन कारावास के डर से वैध लोकतांत्रिक अधिकारों और स्वतंत्रता का आनंद नहीं ले सकते हैं।

राजद्रोह (Sedition) क्या है?

  • भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के अनुसार, जब कोई व्यक्ति बोले गए या लिखित शब्दों, संकेतों या दृश्य प्रतिनिधित्व द्वारा या किसी और तरह से घृणा या अवमानना या उत्तेजित करने का प्रयास करता है या भारत में क़ानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति असंतोष को भड़काने का प्रयास करता है तो वह राजद्रोह का आरोपी है।
  • राजद्रोह एक ग़ैर-जमानती अपराध है और इसमें सज़ा तीन साल से लेकर आजीवन कारावास और जुर्माना है।
  • यह एक औपनिवेशिक क़ानून है। यह स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए था, उसी क़ानून का इस्तेमाल अंग्रेजों ने महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक आदि के खि़लाफ़ किया था।

केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य मामला

  • केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (1962) के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 124ए के बारे में कहा था कि इस प्रावधान का इस्तेमाल "अव्यवस्था पैदा करने की मंशा या प्रवृत्ति, या क़ानून और व्यवस्था की गड़बड़ी, या हिंसा के लिए उकसाने वाले कार्यों" तक सीमित होना चाहिए।
  • इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने अपने फ़ैसले में आईपीसी के तहत राजद्रोह क़ानून की वैधता को बरकरार रखा था और इसके दायरे को भी परिभाषित किया था। अदालत ने कहा था कि धारा 124ए केवल उन शब्दों को दंडित करता है जो क़ानून और व्यवस्था को बिगाड़ने की मंशा या प्रवृत्ति को प्रकट करते हैं या जो हिंसा को भड़काते हैं। उसी समय से इस परिभाषा को धारा 124ए से संबंधित मामलों के लिए मिसाल के तौर पर लिया जाता रहा है। इस मामले में साफ हुआ कि सरकार की आलोचना करना राजद्रोह नहीं है।

बलवंत सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब केस

  • 1995 में बलवंत सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ नारेबाजी से राजद्रोह नहीं हो सकता। कैजुअल तरीके से कोई नारेबाजी करता है तो वह राजद्रोह नहीं माना जाएगा। उक्त मामले में दो सरकारी कर्मियों ने खलिस्तान जिंदाबाद व देश के खिलाफ नारेबाजी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नारेबाजी भर से देश को खतरा का मामला नहीं बनता। राजद्रोह तभी बनेगा जब नारेबाजी के बाद विद्रोह पैदा हो जाए और समुदाय में नफरत फैल जाए।

विधि आयोग के सुझाव

  • विधि आयोग की 2018 की रिपोर्ट में धारा 124-A पर विस्तार से चर्चा की गई थी। इसमें सुझाया गया कि धारा 124-A का इस्तेमाल उन्हीं मामलों में होना चाहिए जहां कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने या सरकार को हिंसक या अवैध तरीके से हटाने की मंशा दिखाई दे।

राजद्रोह के मामलों में बढ़ोतरी

  • देश के विभिन्न भागों में 2019 के दौरान राजद्रोह के 93 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 96 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 76 लोगों के खिलाफ आरोप-पत्र दायर किए गए, जबकि 29 लोगों को अदालतों द्वारा बरी कर दिया गया। इससे पहले राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने बताया था कि साल 2019 के दौरान देश भर में दर्ज राजद्रोह और कठोर यूएपीए मामलों में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसमें सिर्फ तीन फीसदी राजद्रोह मामलों में आरोपों को साबित किया जा सका है।
  • इसके अतिरिक्त कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए मदद मांगने पर आलोचकों, पत्रकारों, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं, कार्यकर्ताओं और नागरिकों के खिलाफ राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया गया है ।