भारत निर्माण में महिलाऐं - समसामयिकी लेख

सन्दर्भ

8 मार्च को सम्पूर्ण विश्व में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवश के रूप में मनाया जाता है।

परिचय

  • भारत मात्र एक देश नहीं बल्कि संस्कृति , सभ्यता तथा आदर्शो का एक समुच्चय है जिसके निर्माण में पुरुषो तथा महिलाओ द्वारा समान रूप से योगदान दिया गया है। भारतीय संस्कृति, समाज ,विज्ञान, राजनीति के सभी आयामों में महिलाओ का अबिस्मरणीय योगदान रहा है। प्राचीन काल में गार्गी ,अपाला जैसी विदुषियों से आधुनिक काल में किरण बेदी ,ममता बनर्जी जैसी महिलाओ की एक सुखद परम्परा रही है जिन्होंने देश की सर्वांगीण विकास में योगदान दिया है।
  • भारत में महिलाओं की स्थिति ने पिछली कुछ सदियों में कई बड़े बदलावों का सामना किया है। प्राचीन काल में पुरुषों के साथ बराबरी की स्थिति से लेकर मध्ययुगीन काल के निम्न स्तरीय जीवन और साथ ही कई सुधारकों द्वारा समान अधिकारों को बढ़ावा दिए जाने तक, आधुनिक काल में समानता ,स्वतंत्रता तथा अधिकार के सिद्धांतो के पथ पर प्रगतिशील होते हुए भारत में महिलाओं का इतिहास काफी गतिशील रहा है।

प्राचीन काल में भारतीय महिलाऐं

  • सिंधु घाटी सभ्यता में मातृदेवी की मूर्तियों से स्पष्ट है कि इस सभ्यता में महिलाओ को सम्मान प्राप्त था।
  • वैदिक काल में महिलाओ को पुरूषों के समान शिक्षा -दीक्षा का अधिकार था इस काल में गार्गी , अपाला जैसी विदुषी महिलाओं का नाम प्रमुख रहा है। वेदो में अदिति (देवताओ की माता ) का वर्णन भी मिलता है। इस काल में बहुपत्नी तथा बहुपति विवाह प्रचलन में थे।
  • महाजनपद काल आते आते राज्य निर्माण तथा युद्ध की प्रवृत्ति में वृद्धि के कारण स्त्री संतान की इच्छा कम होती गई परन्तु इस काल में भी महिलाओ को सम्मान प्राप्त था।
  • प्राचीन भारत के प्रसिद्द राजा गौतमी-पुत्र शातकर्णि संभवतः मातृ प्रधान वंश से सम्बंधित थे। साक्ष्यों के अनुसार गुप्त काल में प्रभावती गुप्त प्रभावशाली महिला रहीं।
  • परन्तु समग्र रूप से महिलाओं की स्थिति में गिरावट देखने को मिलती है। महिलाओ को जो सम्मान वैदिक काल में मिला वह सामंत काल आते आते कम हो जाता है परन्तु पत्नी तथा माता के रूप में इस समय भी महिलाओं का सम्मान भारतीय समाज में हो रहा था।

मध्यकाल में भारतीय महिलाऐं

  • समाज में भारतीय महिलाओं की स्थिति में मध्ययुगीन काल के दौरान और अधिक गिरावट आयी। इस समय तक भारत वर्ष में सती प्रथा, बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह पर रोक अपने चरम पर पहुंच चुके थे ।
  • पर्दा प्रथा तथा राजस्थान के राजपूतों में जौहर की प्रथा थी। भारत के कुछ हिस्सों में देवदासियां या मंदिर की महिलाओं को यौन शोषण का शिकार होना पड़ा था। बहुपत्नी प्रथा प्रचलन में थी परन्तु बहुपति प्रथा का अंत हो चूका था।
  • इन परिस्थितियों के बावजूद भी कुछ महिलाओं ने राजनीति, साहित्य, शिक्षा और धर्म के क्षेत्रों में सफलता हासिल की। रज़िया सुल्तान दिल्ली पर शासन करने वाली एकमात्र महिला सम्राज्ञी बनीं। गोंड की महारानी दुर्गावती ,अहमदनगर की चांद बीबी ने तात्कालिक भारत के सबसे बड़ी शक्ति अकबर के विरुद्ध युद्ध किया ।
  • अकबर के काल में अकबर की धाय माता महामंगा का मुग़ल राजनीति में अच्छा प्रभाव था। जहांगीर की पत्नी नूरजहाँ ने राजशाही शक्ति का प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल किया और मुगल राजगद्दी के पीछे वास्तविक शक्ति के रूप में स्वयं को स्थापित किया। मुगल राजकुमारिया जहाँआरा और जेबुन्निसा ,रोशन आरा इत्यादि मुग़ल राजनीति में भाग लेती थीं।
  • राणाप्रताप तथा शिवाजी के व्यक्तित्व निर्माण में इनकी माताएं क्रमशः जयवंता बाई तथा जीजाबाई का नाम आदर से लिए जाता है।
  • इसके साथ ही मीराबाई, महारानी पद्मिनी इस काल की प्रभावी महिलाऐं रहीं हैं जिन्होंने समाज , राजनीति तथा भक्ति मार्ग को प्रभावित किया है।

उपनिवेशी काल में महिलाऐं

  • कर्नाटक में कित्तूर रियासत की रानी, कित्तूर चेन्नम्मा ,तटीय कर्नाटक की महारानी अब्बक्का रानी ,झाँसी की महारानी रानी लक्ष्मीबाई, अवध की सह-शासिका बेगम हज़रत महल जैसी महिलाओं ने न सिर्फ अपने प्रशासनिक गुणों का परिचय दिया बल्कि अंग्रेजो तथा अन्य यूरोपीय शक्तियों से युद्ध कर अपनी वीरता का भी परिचय दिया।
  • होल्कर वंश की महारानी आहिल्या बाई होल्कर अर्थव्यवस्था , राजव्यवस्था,प्रशासन , सैनिक कुशलता में दक्ष थीं।
  • भोपाल की बेगमें भी इस अवधि की कुछ उल्लेखनीय महिला शासिकाओं में शामिल थीं। उन्होंने परदा प्रथा को नहीं अपनाया और मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण भी लिया।
  • कालांतर में , कादम्बिनी गांगुली , एनी बेसेंट , सुचेता कृपलानी ,कस्तूरबा गाँधी इत्यादि महिलाओं सहित अनेक जन सामान्य से आई महिलाओं ने स्वदेशी आंदोलन , असहयोग आंदोलन , भारत छोड़ो आंदोलनों में सहयोग दिया।
  • सावित्री बाई तथा कूचविहार की महारानी नारी शिक्षा पर जोर दिया। दुर्गा भाभी जैसी कई महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलनों में अपने प्राणो की परवाह न करते हुए अपना योगदान दिया था। इस काल में सतीप्रथा , शिशु बध पर रोक तथा विधवा पुनर्विवाह के प्रोत्साहन से महिलाओं को एक नवीन स्फूर्ति मिली जिसका प्रयोग उन्होंने राष्ट्र को स्वतंत्र कराने में किया।

स्वतंत्र्योत्तर भारत में महिलाऐं

  • स्वतंत्र्योत्तर भारत में स्वतंत्रता , अधिकार ,समानता जैसे आदर्शो के साथ भारत की महिलाऐं समस्त क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहीं हैं।
  • भारत के सफल नेतृत्वकर्ताओं में श्रीमती इंदिरागांधी जी का नाम आदर से लिया जाता है। प्रतिभा देवीसिंह पाटिल देश के सर्वोच्च पद पर भी आसीन रहीं।
  • वर्तमान में भी बहन मायावती, ममता बनर्जी , सोनिया गाँधी , वसुंधरा राजे ने यह सिद्ध किया है कि महिलाओ की प्रशासनिक क्षमता भी राष्ट्र निर्माण में सहायक होती है।
  • खेल के क्षेत्र में मिताली राज , पीबी सिंधु , सानिया मिर्जा ,साइना नेहवाल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यहाँ तक की कॉर्पोरेट जगत में नीता अम्बानी , अरुंधति भट्टाचार्य , चंदा कोचर , इंदिरा नूई का नाम प्रसिद्द है।

निष्कर्ष

ऐतिहासिक रूप से पिछड़ेपन से उबरकर भारत की महिलाओ ने सभी क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित कर राजनीति से लेकर खेल , अभिनय , कला , पत्रकारिता , प्रशासन में अपना लोहा भी मनवाया है तथा भारत के निर्माण में योगदान दिया है। भारत को सर्वोच्चता के शिखर पर पहुंचाने में इन महिलाओं का योगदान अविस्मरणीय रहेगा।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1
  • भारतीय समाज
  • महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • भारत के विभिन्न ऐतिहासिक पक्षों में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा करें?