भारत में कछुआ संरक्षण : कार्ययोजना, आवश्यकता तथा प्रयास - समसामयिकी लेख

सन्दर्भ

हाल ही में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा नई दिल्ली में समुद्री मेगा जीव श्रृ्ंखला के दिशा-निर्देश और राष्ट्रीय समुद्री कछुआ कार्ययोजना का दस्तावेज जारी किया गया है।

परिचय

  • भारत में सात हजार पांच सौ किलोमीटर से अधिक विशाल तटरेखा के साथ एक समृद्ध समुद्री जैव विविधता पायी जाती है । अरब सागर , लक्षदीप सागर ,बंगाल की खाड़ी , अंडमान सागर में विभाजित हिंदमहासागर की यह विशाल समुद्री संसाधन न सिर्फ मानव कल्याण के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करते हैं बल्कि रंगीन मछलियों, शार्क, कछुओं और बड़े स्तनधारियों जैसे- व्हेल, डॉल्फ़िन ,प्रवालों भित्ति तक को समुद्री निवास के साथ शरण प्रदान करते हैं।
  • मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप कई समुद्री जन्तुओ का अस्तित्व खतरे में आ गया है जिसमें समुद्री कछुआ एक प्रमुख संकटग्रस्त प्रजाति है। समुद्री जीवो के संरक्षण के लिए भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा समुद्री मेगा जीव श्रृ्ंखला के दिशा-निर्देश और राष्ट्रीय समुद्री कछुआ कार्ययोजना का दस्तावेज जारी किया गया है।

राष्ट्रीय समुद्री कछुआ कार्ययोजना की आवश्यकता क्यों ?

  • भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी समुद्री मेगा जीव श्रृ्ंखला के दिशा-निर्देश और राष्ट्रीय समुद्री कछुआ कार्ययोजना का दस्तावेज समुद्री स्तनधारी जीवों के संकट में फंसे होने, क्षतिग्रस्त होने , मृत्यु को प्राप्त होने और समुद्री कछुओं के संरक्षण के सम्बन्ध में कार्यवाही करने के लिए सरकार, समाज और सभी संबंधित हितधारकों के बीच समन्वय का सुझाव देता है।
  • सम्पूर्ण विश्व में नौवहन, मत्स्यन ,व्यापार के लिए संचालनों से समुद्री कछुओं और उनके अंडे विनष्ट होने के कारण यह अपने कई प्राकृतिक निवासों से लुप्त हो गए हैं अथवा विलुप्त होने की स्थिति में हैं।
  • अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने इस प्रजाति को वर्तमान में लुप्त प्राय प्रजातियों की सूची में शामिल किया है। जो यह दर्शाता है कि समुद्री कछुओं की स्थिति संकटग्रस्त है।
  • जबकि इन कछुओ की एक महत्वपूर्ण जनसँख्या भारत में पायी जाती है तथा भारत ने इनके संरक्षण के लिए अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए इस कार्ययोजना को रूप दिया है।

समुद्री कछुओं की लगातार घटती संख्या का कारण:-

  • नारियल के पेड़ कोकस न्यूसीफेरा के बागान और कासुआराना वृक्ष, जो समुद्री तटो पर लगाए जाते हैं , प्रजनन के दौरान समुद्री कछुओं की मृत्यु का कारण बनते हैं।
  • समुद्री कछुओं के अंडों और वयस्कों का शिकार और तटीय क्षेत्रों में विकासपरक गतिविधियों के कारण भी समुद्री कछुओं की संख्या में गिरावट देखी गई है।
  • मछली पकड़ने की जाल में फँसे और घायल कछुओं स्थानीय लोगों के द्वारा मार दिया जाता है तथा उनके मांस का उपयोग किया जाता है ।
  • समुद्री तटों पर रेत के खनन के कारण भी समुद्री कछुओं की स्थिति संकटग्रस्त हो जाती है इसके साथ ही अवैध खनन करने वाले समूहों द्वारा इन कछुओं का अवैध व्यापार भी किया जाता है।
  • कई बार तट पर कम हुई रेत को आपदा नियंत्रित करने के उद्देश्य से बढ़ाया जाता है, इससे समुद्री कछुओं के घोसलों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाते हैं।
  • आस पास के घरो की कृत्रिम रौशनी के कारण शिशु समुद्री कछुए अपने मार्ग से भटक जाते हैं तथा मृत्यु का वरण करते हैं।
  • गीदड़ों (कनीस एइरइस), लकड़बग्घे और जंगली कुत्ते भी व्यस्क कछुओं, अंडों और शिशु कछुओं के का शिकार करते हैं ।
  • समुद्री तथा तटीय पर्यटन में वृद्धि समुद्री कछुओं को उनके प्राकृतिक क्षेत्रों में घोसलें बनाने में बाधा उत्पन्न कर रही है
  • इसके साथ ही वैश्विक तापन के प्रभाव से समुद्री जल स्तर तथा ताप में बढ़ोत्तरी समुद्री कछुओं के प्राकृतिक आवास तथा दैनिक दिनचर्या को नष्ट कर रही है।
  • प्रदूषण (विशेष रूप प्लास्टिक प्रदूषण का बढ़ना ) इन कछुओं के लिए संकट उत्पन्न कर रहा है।

राष्ट्रीय समुद्री कछुआ कार्ययोजना के विषय में

  • इसमें अंतर्क्षेत्रीय परियोजना को बढ़ावा देने के साथ साथ केंद्र सरकार, राज्य सरकार , नागरिक समाज के मध्य समन्वय स्थापित करने के लिए मार्गदर्शन सम्मिलित है।
  • इस कार्य योजना का उद्देश्य भारतीय उपमहाद्वीप में कछुआ संरक्षण के लिए सामूहिक भागीदारी बढ़ाना तथा महत्वपूर्ण स्थलों को चिह्नित करना है।
  • इसमें उन सभी कारको तथा गतिविधियों की पहचान की जाएगी जो समुद्री कछुवे के लिए संकट उत्पन्न करते हैं।

भारत में समुद्री कछुओं के संरक्षण के लिए किये गए प्रयास

भारत के संविधान में जन्तुओ के संरक्षण के दायित्व सम्मिलित किये गए हैं तथा भारत में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 ,जैव विविधता अधिनियम 2002 ,जैसे कानून भी हैं जो समग्र रूप से जैव विविधता का संरक्षण करते हैं। परन्तु समुद्री कछुओं के लिए भारत में विशेष रूप से परियोजनाए भी चलाई गेन हैं।

समुद्री कछुआ परियोजना

  • 1999 में भारतीय वन्य जीव संसथान , देहरादून मे यूनडीपी (संयुक्त राष्ट्र विकास प्रोग्राम ) तथा भारत के पर्यावरण,वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सम्मिलित प्रयास से समुद्री कछुआ परियोजना का आरम्भ किया गया।
  • यह परियोजना कछुओं के प्रजनन क्षेत्रो को सुरक्षित करने , अन्य प्रकार की असुविधाओं से इन क्षेत्रो का संरक्षण करने तथा संरक्षण की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए क्षेत्र में विकासात्मक गतिविधियों के लिए दशानिर्देश जारी करती है।
  • इसके साथ ही यह परियोजना क्षेत्र के विकास तथा मॉनिटरिंग के लिए फण्ड जारी करता है।
  • इसमें ओलिव रिडले कछुओं के घोसलो के क्षेत्र की सैटेलाइट विधि से जांच की जाती है।

अन्य प्रयास

  • 1975 में ओडिशा सरकार द्वारा भितरकनिका अभ्यारण्य में समुद्री कछुओं के संरक्षण की योजना का आरम्भ किया गया था।
  • सह्याद्रि निसर्ग मित्र नामक संस्था ने कछुओं के शिकार को देखते हुए 2002 में कछुआ संरक्षण योजना का आरम्भ किया था जो प्रतिवर्ष कोकण कछुआ महोत्सव का आयोजन करते हुए प्रतिवर्ष कछुओ की कुछ नवजातों को समुद्र में छोड़ देते हैं।

भारत में पाए जाने वाले कछुए

  • लेदरबैक कछुआ (डर्मीचेरलस कोरीअसीआ)
  • हास्कबील कछुआ (इरीटमोचेइलस इम्ब्रीकेट)
  • लागरहैड कछुआ (केरेटा)
  • हरा कछुआ (चेइलोनिआ मायडास)
  • ओलिव रिडले कछुआ (लेपीडोचेइलस ओलिविसीया)

निष्कर्ष

सात समुद्री कछुओं की प्रजातियों में से पाँच प्रजातियाँ भारत के तटीय समुद्रों में पाई जाती है। इन प्रजातियों में ओलिव रिडले प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली प्रजाति है। विश्व में ओलिव रिडले कछुओं का एक बड़ा अनुपात भारत के पूर्वी तट पर पाया जाता है। अतः इनके संरक्षण का दायित्व भी भारत पर है जिसे भारत की सरकार, राज्य सरकारों तथा नागरिक समाज ने बेहतर ढंग से निभाया है। इससे भारत की जीव संरक्षण के प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3
  • पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी (संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • हाल ही में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा कछुआ संरक्षण के लिए राष्ट्रीय समुद्री कछुआ कार्ययोजना का दस्तावेज जारी किया गया है। उन कारको पर चर्चा करें जो कछुओं की घटती संख्या के लिए उत्तरदायी हैं। इनके संरक्षण के लिए किये गए प्रयासो का भी वर्णन करें?