जलवायु परिवर्तन पर सतर्क होने का सही समय - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


जलवायु परिवर्तन पर सतर्क होने का सही समय - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चर्चा का कारण

  • वर्तमान समय में विभिन्न देशों के प्रधानों ने जिस प्रकार कोरोना से लड़ने में तात्कालिक तत्परता दिखाई है उसी प्रकार अब उन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रति भी सतर्कता दिखाने की आवश्यकता है, क्योंकि कार्बन -डाइऑक्साइड के साथ अन्य ग्रीन हाउस गैसों (जीएचजी) के अत्यधिक उत्सर्जन के कारण औसत वैश्विक तापमान बढ़ गया है।

कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती हुई सांद्रता तथा वैश्विक औसत तापमान वृद्धि का इतिहास

  • गौरतलब है कि 18,000 साल पहले CO2 की सांद्रता में स्वतः वृद्धि शुरू हुई थी , जब इसकी मात्र 200 पीपीएम से कम थी और तात्कालिक समय में पृथ्वी बहुत अधिक ठंडी थी।
  • 11,500 साल पहले CO2 के 270 पीपीएम तक पहुंचने से उत्पन्न गर्म वायुमंडलीय परिस्थितियों ने पृथ्वी पर कृषि उत्पादन को संभव बना दिया।
  • तत्पश्चात पिछले 10,000 वर्षों में औद्योगिक क्रांति से पहले CO2 स्तर कभी भी 280-300 पीपीएम से अधिक नहीं हुआ। 19 वीं शताब्दी के मध्य में, मानव द्वारा औद्योगिक क्रांति को बढ़ावा देने के लिए कोयले और तेल के उपयोग और कृषि एवं बस्तियों का विस्तार करने के लिए जंगलों को जलाना शुरू कर दिया गया।
  • नतीजतन 1850 में मात्र 0.2 बिलियन टन CO2 उत्सर्जन से लेकर, 2018 तक वार्षिक उत्सर्जन बढ़कर 36 बिलियन टन हो गया। हालाँकि, हमारी प्रकृति ने इस बढ़े हुए CO2 उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा वायुमंडल से साफ कर दिया, जिसमें वनों और महासागरों द्वारा कार्बन सिंक के रूप में काम करना भी शामिल है। परन्तु फिर भी वनीकरण और प्रकृति के अधिकाधिक्य दोहन के कारण वातावरण में CO2 का स्तर 2018 में 407 पीपीएम तक पहुंच गया। पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की यह सांद्रता पिछले 3 मिलियन से अधिक वर्षों पहले देखी गई थी।
  • इसके अलावा यदि हम वैश्विक तापन के आकड़ों की तरफ देखे तो पता चलता है कि 1850 के बाद से लगभग एक शताब्दी से अधिक समय तक वैश्विक तापमान में मामूली गिरावट दर्ज की जा रही थी और इसलिए किसी भी प्रकार के गंभीर परिवर्तन की कोई आशंका भी नहीं जताई गयी , परन्तु 1975 के बाद से तापमान के ग्राफ ने एक अलग ही उर्ध्वगामी रुझान प्रदर्शित किया और 2015 तक तो पृथ्वी सौ साल पहले के मुकाबले 1 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो गई।
  • जलवायु विज्ञान के जानकर एक सटीक अनुमान लगाते हुए बताते है कि अगर मौजूदा परिस्थितियों में कोई सुधार नहीं किया गया तो पृथ्वी इस शताब्दी के अंत तक 4˚C गर्म हो जाएगी।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

  • हाल में बढ़ते हुए ग्लोबल वार्मिंग ने ग्लेशियरों को पिघलाकर पहाड़ों पर बर्फ के आवरण को कम किया है। इससे समुद्र के जल स्तर में वृद्धि और जल सुरक्षा जैसी चुनौतियां सामने आई हैं। आँकड़े दर्शाते हैं कि पिछली सदी से अब तक समुद्र के जल स्तर में भी लगभग 8 इंच की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
  • उच्च तापमान का कृषि उत्पादन पर भी असर पड़ा है। जलवायु परिवर्तन के कारण फसल की पैदावार कम होने से खाद्य न्न समस्या उत्पन्न हो सकती है, साथ ही उर्वर भूमि निम्नीकरण जैसी समस्याएँ भी सामने आ सकती हैं।
  • तापमान में वृद्धि के कारण वनस्पति पैटर्न में बदलाव ने कुछ पक्षी प्रजातियों को विलुप्त होने के लिये मजबूर कर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, पृथ्वी की एक-चौथाई प्रजातियाँ वर्ष 2050 तक विलुप्त हो सकती हैं। वर्ष 2008 में ध्रुवीय भालू को उन जानवरों की सूची में जोड़ा गया था जो समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण विलुप्त हो सकते थे।
  • जलवायु परिवर्तन में न केवल तापमान में बदलाव, बल्कि मौसम के हर अन्य घटक जैसे वर्षा, आर्द्रता और हवा की गति शामिल है जिनके कारण विश्व स्तर पर कई चरम मौसमी घटनाएं हुई हैं, जैसे कि तूफान, हीट वेव या सूखा। उदाहरणस्वरूप 2003 में यूरोप में हीट वेव के कारण 70,000 से अधिक लोगों की जान चली गयी थी।
  • वर्ष 2015-19 विश्व स्तर पर रिकॉर्ड सबसे गर्म वर्ष रहे हैं। उच्च तापमान ने 2019 में अमेजॅन की आग 2019-20 में ही ऑस्ट्रेलिया में लगी आग में योगदान दिया, जिससे भारी तबाही हुई।
  • यदि वैश्विक CO2 उत्सर्जन वर्तमान दर से बढ़ना जारी रहा, तो भारत के अधिकांश राज्यों में गर्मी का औसत तापमान 4˚C बढ़ जाएगा।

वित्तीय पोषण

  • जलवायु परिवर्तन संरक्षण पर अधिकांश देशों का सबसे सामान्य तर्क यह है कि अर्थव्यवस्था की कीमत पर हम जीएचजी उत्सर्जन पर अंकुश नहीं लगा सकते हैं।
  • हालाँकि 2009 में संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन में विकसित देशों ने जलवायु परिवर्तन के अल्पीकरण और अनुकूलन के लिए विकासशील गरीब देशों को 2020 तक प्रत्येक वर्ष 100 अरब डॉलर की सहायता प्रदान करने का संकल्प लिया था। इसे 'क्लाइमेट जस्टिस' की परिकल्पना नाम दिया गया है जिसके अनुसार धनी राष्ट्र (जिन्होंने अधिकांश जीएचजी के कारण ग्लोबल वार्मिंग पैदा की है), को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अन्य देशों को भुगतान करने की आवश्यकता है।
  • 2017 में केवल 71 बिलियन डॉलर की राशि प्रदान की गई थी, जिसमें से 20% से भी कम धन का जलवायु अनुकूलन में प्रयोग किया गया था।
  • इन स्थितियों को देखते हुए यह भी संभावना नहीं लगती कि विकसित देश 2020के दौरान महामारी के कारण जलवायु वित्तपोषण में 100बिलियन डॉलर भी वितरित करेंगे।

जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु वैश्विक प्रयास

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC)

  • जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) जलवायु परिवर्तन से संबंधित वैज्ञानिक आकलन करने हेतु संयुक्त राष्ट्र का एक निकाय है। जिसमें 195 सदस्य देश हैं।
  • इसे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा 1988 में स्थापित किया गया था।
  • इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन, इसके प्रभाव और भविष्य के संभावित जोिखमों के साथ-साथ अनुकूलन तथा जलवायु परिवर्तन को कम करने हेतु नीति निर्माताओं को रणनीति बनाने के लिये नियमित वैज्ञानिक आकलन प्रदान करना है।
  • IPCC आकलन जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (UNFCCC)

  • यह एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जिसका उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना है।
  • यह समझौता जून, 1992 के पृथ्वी सम्मेलन के दौरान किया गया था। विभिन्न देशों द्वारा इस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद 21 मार्च, 1994 को इसे लागू किया गया।
  • वर्ष 1995 से लगातार UNFCCC की वार्षिक बैठकों का आयोजन किया जाता है। इसके तहत ही वर्ष 1997 में बहुचर्चित क्योटो समझौता हुआ और विकसित देशों (एनेक्स-1 में शामिल देश) द्वारा ग्रीनहाउस गैसों को नियंत्रित करने के लिये लक्ष्य तय किया गया। क्योटो प्रोटोकॉल के तहत 40 औद्योगिक देशों को अलग सूची एनेक्स-1 में रखा गया है।
  • UNFCCC की वार्षिक बैठक को कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज (COP) के नाम से जाना जाता है।

पेरिस समझौता

  • वर्ष 2015 में 30 नवंबर से लेकर 11 दिसंबर तक 195 देशों की सरकारों के प्रतिनिधियों ने पेरिस में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये संभावित नए वैश्विक समझौते पर चर्चा की।
  • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य के साथ संपन्न पेरिस समझौते को ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिये एक ऐतिहासिक समझौते के रूप में मान्यता प्राप्त है।

जलवायु परिवर्तन और भारत

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC)

  • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना का शुभारंभ वर्ष 2008 में किया गया था।
  • इसका उद्देश्य जनता के प्रतिनिधियों, सरकार की विभिन्न एजेंसियों, वैज्ञानिकों, उद्योग और समुदायों को जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरे और इससे मुकाबला करने के उपायों के बारे में जागरूक करना है।

इस कार्य योजना में मुख्यतः 8 मिशन शामिल हैंः

  • राष्ट्रीय सौर मिशन
  • विकसित ऊर्जा दक्षता के लिये राष्ट्रीय मिशन
  • सुस्थिर निवास पर राष्ट्रीय मिशन
  • राष्ट्रीय जल मिशन
  • सुस्थिर हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र हेतु राष्ट्रीय मिशन
  • हरित भारत हेतु राष्ट्रीय मिशन
  • सुस्थिर कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन
  • जलवायु परिवर्तन हेतु रणनीतिक ज्ञान पर राष्ट्रीय मिशन

चुनौतियाँ

  • गौरतलब है कि वर्ष 2015 तक, वैश्विक औसत तापमान सौ साल पहले की तुलना में 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया।
  • वर्तमान अनुमानों से पता चलता है, कि दुनिया पेरिस समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने से अभी बहुत पीछे है, जिसके अनुसार औसत वैश्विक तापमान में पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस से कम वृद्धि करनी है,क्योंकि 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वृद्धि भयावह पर्यावरणीय दुष्चक्र का उद्दभव कर सकती है।

आगे की राह

  • बढ़ती जलवायु संकट से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तपोषण की आवश्यकता होगी। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल का अनुमान है कि पूर्व-औद्योगिक स्तरों के सापेक्ष 1.5˚C से नीचे तापमान को बनाए रखने के लिए 2035 तक अधिक कुशल ऊर्जा प्रणालियों में 2.4 ट्रिलियन डॉलर का निरंतर वार्षिक निवेश आवश्यक है और यह वैश्विक जीडीपी का लगभग 2.5% होगा।
  • हालाँकि COVID-19 ने जलवायु परिवर्तन से मानवता को एक संक्षिप्त राहत दी है। लॉकडाउन के दौरान जीवाश्म ईंधन से कार्बन उत्सर्जन निश्चित रूप से कम हो गया है। परन्तु महामारी फैलने के बाद अब समाज की संरचना और कामकाज में बदलाव की जरूरत है।
  • प्रौद्योगिकीविदों, अर्थशास्त्रियों और सामाजिक वैज्ञानिकों को इक्विटी और जलवायु न्याय (क्लाइमेटजस्टिस) के सिद्धांतों के आधार पर एक स्थायी व्यवस्था हेतु योजना बनानी चाहिए।
  • विभिन्न देशों के नेताओं को जलवायु संकट पर उसी सतर्कता के साथ काम करना चाहिए जिस सतर्कता के साथ कोविड-19 पर किया है।
  • जलवायु परिवर्तन परिदृश्य से निपटने के लिए निम्नलििखत तकनीकी हस्तक्षेपों का सुझाव दिया जा रहा हैः
  • वायुमंडल से बड़ी मात्र में CO2 को निकालकर सुरक्षित रूप से भंडारण करना। (Geo-sequestering)
  • भू-इंजीनियरिंग प्रौद्योगिकियों द्वारा सौर विकिरण का विनियमन। (वायुमंडल में एरोसोल का उपयोग करना या विशाल परावर्तक को अंतरिक्ष में रखना।)
  • दुनिया भर की सरकारें अपनी अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करने के लिए विशाल प्रोत्साहन पैकेज लॉन्च कर रही हैं। यह हमारी अर्थव्यवस्थाओं को बनाए रखने का एक सुनहरा अवसर है।

सामान्य अध्ययन पेपर-3

  • संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के कारण उत्पन्न समस्याओं एवं उनके समाधान के लिए किये गये उपायों पर विस्तार से चर्चा करें।