राष्ट्रीय सुरक्षा और इंटरनेट की स्वतंत्रता के बीच घूमती संतुलन की सूई - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

चर्चा का कारण

  • हाल ही में 59 चीनी ऐप्स को ब्लॉक करने के फैसले ने एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर इंटरनेट की स्वतंत्रता की भेद्यता को सुर्खियों में ला दिया है। भारत द्वारा चीनी ऐप्स पर लगाए गए प्रतिबंध को चीन के गलवान घाटी में उठाये गये भारत विरोधी गतिविधियों के विरुद्ध भारत के डिजिटल स्ट्राइक के रूप में देखा जा रहा है।

परिचय

  • भारत सरकार द्वारा चीनी ऐप्स को अवरुद्ध करने के आदेश को एक प्रेस सूचना ब्यूरो के अधिसूचना के माध्यम से संप्रेषित किया गया, जिसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 69 ए के तहत लागू किया जाएगा।
  • यह आदेश ब्लॉकिंग रूल्स की आपातकालीन शक्तियों के तहत लिया गया है, जो सरकार को 48 घंटे की अवधि के भीतर किसी भी नोटिस या सुनवाई की आवश्यकताओं को पूरा करने की अनुमति देता है। इस 48 घंटे की अवधि के दौरान सरकार को निर्णय लेने के लिए एक समिति बुलानी होती है।
  • 48 घंटे की अवधि समाप्त होने के बाद, आईटी सचिव को अंतरिम किये गए उपाय और अनब्लॉक एक्सेस को रद्द करते हुए अंतिम आदेश पारित करना होता है, या अवरुद्ध आदेश को अंतिम रूप देना होता है।
  • चीनी ऐप्स को पीआईबी द्वारा जारी एक अधिसूचना में ‘दुर्भावनापूर्ण (malicious) के रूप में बताया गया है। अधिसूचना में यह कारण दिया गया है कि ये ऐप्स उन गतिविधियों में लगे हुए हैं जो उपयोगकर्ता की गोपनीयता और भारत की संप्रभुता के लिए हानिकारक हैं।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रलय के बयान में कहा गया है कि उन्हें विभिन्न स्रोतों से शिकायतें प्राप्त हुई हैं, जिनमें से कुछ मोबाइल ऐप्स के दुरुपयोग के बारे में कई रिपोर्ट शामिल हैं, जो चोरी करने और उपयोगकर्ताओं के डेटा को अनाधिकृत तरीके से भारत से बाहर सर्वर पर प्रसारित करने के लिए उपयोग की जा रही है।
  • हालाँकि अभी भी ये ऐप्स मौजूदा उपयोगकर्ताओं के फोन पर उपलब्ध हैं, लेकिन नए उपयोगकर्ता इसे एक्सेस नहीं कर पा रहे हैं।

अधिकारों का संतुलन

  • यद्यपि जब हम अधिकारों के बारे में बात करते हैं, तो निश्चित रूप से चीनी कंपनियों के अधिकार प्रभावित हुए हैं, परन्तु यदि यह भारतीय नागरिकों के संदर्भ में हो, जो अपने व्यवसाय को चलाने के लिए या सिर्फ लोकप्रिय होने के लिए टिकटॉक जैसे प्लेटफार्मों का उपयोग करते थे,तो हम कह सकते है कि किसी के भी अधिकार उल्लंघन नहीं हुआ है। कुछ विशेषज्ञों की राय में केवल एक मंच पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, गतिविधि पर नहीं। इस तरह की गतिविधियों को अन्य प्लेटफार्मों पर भी स्थानांतरित किया जा सकता है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 ए, सरकार को मिला कोई नया अधिकार नहीं है जिसका उपयोग सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा आपातकाल के समय में आदेश देने में किया जा रहा है।
  • हालाँकि इसमें नए रूप में एक वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा जोिखम का कारण ज्ञात होना चाहिए और सरकार द्वारा ऐप को ब्लॉक करने की आवश्यकता को बहुत व्यापक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
  • भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र (जो नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय करार के साथ-साथ मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के लिए भी एक हस्ताक्षरकर्ता देश है), में सरकारों द्वारा इंटरनेट या इंटरनेट-आधारित सेवाओं का विनियमन करते समय बुनियादी मानवाधिकार मानकों का भी यथोचित सम्मान करना आवश्यक है।
  • सरकार को किसी भी सेवा को अवरुद्ध करने या सामग्री तक किसी की पहुंच को रोकने या अन्य कठोर कदम उठाने के लिए, सर्वप्रथम लोगों के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता पर ध्यान देना चाहिए। किसी भी सेवा या सामग्री को ब्लाक करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून में तीन प्रकार के परीक्षण किए जाते हैं-
  • हस्तक्षेप की क्षमता
  • आनुपातिकता परीक्षण
  • आवश्यकता का मानक
  • सर्वाेच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि हमारी स्वतंत्र अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार, ऑनलाइन सामग्री पर भी लागू होता है।

इंटरनेट पर प्रतिबंध संबंधी पूर्व में किये गये प्रयास

  • केरल राज्य में फहीमा शिरिन बनाम केरल राज्य ने मान्यता दी कि, किसी की इंटरनेट तक पहुंच के साथ दखल देना निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
  • जस्टिस पुट्टðस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ के साथ-साथ मॉडर्न डेंटल कॉलेज से संबंधित निर्णय के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने पुष्टि की, कि अधिकारों को अलग रूप में नहीं देखा जा सकता है। उन्हें एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि वे एक दूसरे के पूरक हैं।
  • हालाँकि इस तरह के प्रतिबंध लगाने का आधार अनुच्छेद 19 (2) (यानी सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, आदि) के तहत उल्लििखत स्थितियों में से एक है। एक ही समय में, संवैधानिक स्वतंत्रता की परस्पर प्रकृति के कारण, यह भी अनुच्छेद 14 के तहत उचित और न्यायसंगत हो जायेगा, इसका मतलब यह है कि जिस तरह से चीन के ऐप्स पर बैन लगाया गया है, वह मनमाना नहीं है।
  • अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ और ओआरएस में, भारतीय सर्वाेच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि धारा 69 ए को सूचना प्रौद्योगिकी (प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों को सार्वजनिक रूप से सूचना तक पहुँच को अवरुद्ध करने के लिए) नियम, 2009 के साथ पढ़ा जाना चाहिए, हालाँकि इस संदर्भ में भारत सरकार ने संकीर्ण रूप से सिलसिलेवार प्रतिबंध लगाए। बाद में श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ और ओआरएस में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 69 ए की संवैधानिकता को स्वीकार किया था।
  • हालाँकि, आईटी अधिनियम की धारा 69 ए के तहत एक आदेश के संदर्भ में आपातकाल का अर्थ स्पष्ट नहीं है।
  • पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ में, टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा 5 की संवैधानिकता को चुनौती के संदर्भ में,SC ने स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) में, सार्वजनिक आपातकाल की सीमाएं बताए गए आधारों से भी अधिक है।
  • न्यायालय ने सार्वजनिक आपात को परिभाषित किया जिसके अनुसार फ्सार्वजनिक आपात तत्काल कार्रवाई के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को प्रभावित करने वाली आकस्मिक उत्पन्न स्थितिय् है।

निष्कर्ष

  • मौजूदा समय में सुरक्षा चुनौतियों की पर्याप्तता यह समझने में मदद कर सकती है कि चीन के ऐप्स पर लगाये गये बैन से नागरिक स्वतंत्रता पर अत्यधिक अंकुश लगाया गया है अथवा नहीं।
  • इंटरनेट पर पहुंच को प्रतिबंधित करने के िखलाफ सामान्य प्रक्रियात्मक सुरक्षा (general procedural safeguard) संबंधित आदेशों को अदालत के आदेश की प्रमाणित प्रति (certified copy) द्वारा समर्थित होना चाहिए क्योंकि न्यायिक जांच द्वारा यह सुनिश्चित होता है कि यह निर्णय ठीक है या नहीं।
  • ब्लॉकिंग रूल्स 2009 के नियम 9 के तहत सरकार को एक ऑनलाइन मध्यस्थ (यानी एक ऑनलाइन सेवा प्रदान करने वाली इकाई, जैसे कि एक चीनी ऐप) को सुनने का एक पूर्व अवसर प्रदान किए बिना उस पर बैन (जैसे इस मामले में) लगाने का अधिकार है।

आगे की राह

  • अनुराधा भसीन फैसले में इंटरनेट शटडाउन के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा कि लोगों की स्वतंत्रता के अधिकारों के संदर्भ में विशेष रूप से इंटरनेट के संबंध में प्रतिबंधित करने वाले किसी भी आदेश को प्रकाशित करने की आवश्यकता है।
  • वास्तविक रूप से देखा जाये तो मौजूदा प्रतिबंध से भारत डब्ल्यूटीओ के लिए असुरक्षित हो गया है। इसके अलावा भारत में डेटा सुरक्षा और गोपनीयता कानूनों की कमी और महत्वपूर्ण साइबर सुरक्षा संरचना की कमी के लिए भी सवाल उठाए गए हैं।
  • सरकार को इंटरनेट संबंधी कोई भी प्रतिबंध लगाने से पहले मौलिक अधिकारों एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना चाहिए।

सामान्य अध्ययन पेपर-2

  • शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पक्ष, ई-गवर्नेंस-अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएं, सीमाएं और संभावनाएं, नागरिक घोषणा-पत्र, पारदर्शिता एवं जवाबदेही और संस्थागत तथा अन्य उपाय।

सामान्य अध्ययन पेपर-3

  • संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • प्र- भारत को चार देशों के समूह (क्वॉड) और इंडो-पैसिफिक को अलग-अलग देऽना चाहिए या सहजीवी के तौर पर? चर्चा कीजिये
  • प्र- हाल ही में भारत सरकार द्वारा चीन के विभिन्न ऐप्स पर लगाए गए प्रतिबंधों से इंटरनेट की स्वतंत्रता कहां तक प्रभावित हुई है? विश्लेषण करें।