वैश्विक चिंता का कारण बना स्वेज नहर - समसामयिकी लेख

चर्चा में क्यों?

23 मार्च 2021 को बंद हुए स्वेज नहर को फिर से संचालन के योग्य बना दिया गया है। इस घटना से भारत सहित सम्पूर्ण विश्व प्रभावित रहे हैं।

परिचय

  • ताइवान की एवरग्रीन कंपनी द्वारा संचालित एवरगिवेन जहाज जो चीन से रोटरडम (नीदरलैंड ) के लिए रवाना हुआ था , 23 मार्च 2021 को स्वेज नहर में पोर्ट टोफिक के पास फस गया जिससे इस मार्ग में सञ्चालन बंद हो गया था ।
  • इस घटना के कारण भारत सहित सम्पूर्ण विश्व को व्यापारिक हानि का सामना करना पड़ा। यह जहाज जो लगभग 400 मीटर लम्बा था , बहुत तीव्र वायु प्रवाह से प्रभावित हो कर स्वेज नहर के दोनों तटों पर फस गया। लगभग 1 हफ्ते की कड़ी मेहनत के उपरान्त जहाज को निकला जा चुका है परन्तु इस घटना ने कई प्रश्नो को जन्म दिया है।

जहाज एवर गिवेन के विषय में

  • इसका निर्माण 2018 में हुआ था।
  • यह ताइवानी कंपनी एवरग्रीन मरीन द्वारा संचालित होती है।
  • यह लगभग 400 मीटर लम्बी है।
  • इस जहाज का संचालन 25 सदस्यों का भारतीय चालक दल कर रहा है।

स्वेज नहर के विषय में

  • स्वेज नहर को 1869 में निर्मित किया गया।
  • इस नहर का मिस्र द्वारा 1956 में राष्ट्रीयकरण कर दिया गया तबसे यह मिस्र द्वारा शासित है।
  • 2015 में इस नहर के उत्तरी हिस्से में 2 लेन वाटरवे का निर्माण किया गया परन्तु दक्षिणी हिस्सा अभी भी सिंगल लेन वाटरवे से संचालित होता है।
  • यह नहर लगभग 193 किलोमीटर लम्बी है।
  • यह नहर स्वेज के इस्तमुस से होकर अफ्रीका और एशिया को विभाजित करते हुए भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ता है।

स्वेज नहर के निर्माण से वर्तमान तक की स्थिति :-

  • औद्योगिकीकरण के उपरांत ब्रिटेन तथा फ़्रांस जैसे देशो में उपनिवेशों को लेकर होड़ मची। सभी साम्राज्यवादी देश अपने -अपने उपनिवेशों को विजित करने तथा उनपर नियंत्रण स्थापित करने के प्रयासों में संलग्न हो गए।
  • एक अमेरिकी इतिहासकार अल्फ्रेड टी महन ने एक सिद्धांत दिया जिसमे उन्होंने बताया कि किसी देश की समुद्री ताकत उस देश के नियंत्रण को प्रभावी करेगी तथा उन्होंने हिन्द महासागर को सभी महासागरों की कुंजी बताया।

उस समय दक्षिण तथा दक्षिण पूर्व एशिया पर ब्रिटेन तथा फ़्रांस का उपनिवेश था। इन देशो से से दक्षिण एशिया तक आने के लिए दो मार्ग थे

  1. 1-स्थल मार्ग यहाँ ओटोमन साम्राज्य रूस तथा अफगानिस्तान का संकट था।
  2. सम्पूर्ण अफ्रीका महाद्वीप को पार कर केप ऑफ़ गुड होप से होते हुए आने का मार्ग था , परन्तु यह मार्ग समुद्री डाकुओ से संकट ग्रस्त था तथा यहाँ से आने में समय अधिक लगता था।

इस स्थिति में स्वेज नहर के निर्माण की आवश्यकता हुई।

  • 1858 में, फर्डिनेंड डी लेसेप्स ने नहर के निर्माण के व्यक्त उद्देश्य के लिए स्वेज नहर कंपनी का गठन किया। इसमें फ्रांस , तुर्की ,मिस्र के शेयर थे बाद में इस कंपनी के शेयर को ब्रिटेन द्वारा खरीद लिया गया। 1859 में इस नहर का निर्माण आरम्भ हुआ तथा यह नहर 99 वर्षों के लिए स्वेज नहर कंपनी को लीज पर दे दिया गया।
  • 1869 में पहली बार यहाँ से नौवहन आरम्भ हुआ।
  • 1888 ई. में एक अंतरराष्ट्रीय उपसंधि के अनुसार यह नहर युद्ध और शांति दोनों कालों में सब राष्ट्रों के जहाजों के लिए बिना रोकटोक समान परिवहन की अनुमति दी गई । इस समझौते के अनुसार कोई भी सेना नहीं रख सकता था।
  • अंग्रेजों ने 1904 ई. में संधि का उलंघन किया तथा यहाँ सेनाएँ बैठा दीं और उन्हीं राष्ट्रों के जहाजों के आने-जाने की अनुमति दी जाने लगी जो युद्धरत नहीं थे।
  • 1947 ई. में स्वेज कैनाल कंपनी और मिस्र सरकार के बीच यह निश्चय हुआ कि कंपनी के साथ 99 वर्ष का पट्टा पूर्ण हो जाने पर 1968 में इसका स्वामित्व मिस्र सरकार के हाथ आ जाएगा।
  • 1954 ई. में ब्रिटेन तथा मिस्र के मध्य एक अन्य समझौता हुआ जिसके अनुसार ब्रिटेन की सरकार कुछ शर्तों के साथ नहर से अपनी सेना हटा लेने पर राजी हो गई।
  • 1956 में मिस्र ने इस लीज पूर्ण होने के पूर्व इस नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसे ही स्वेज संकट के नाम से जाना जाता है।
  • 1957 में ब्रिटेन -फ़्रांस -इजराइल तथा मिस्र के युद्ध के कारण यह नहर 1 वर्ष तक बंद रही।
  • 1967 में इजराइल तथा मिस्र के युद्ध के दौरान भी यह नहर 8 वर्षो के लिए बंद रही।
  • इसके उपरांत यह नहर राजनैतिक कारणों से बंद नहीं रही। 2017 में एक जापानी कंटेनर तकनीकी कारणो से यहाँ फस गया था जो की कुछ घंटो में ही संचालित हो गया था।

स्वेज नहर का महत्व

  • यहाँ से विश्व का लगभग 12% व्यापार होता है।
  • स्वेज कैनाल अथॉरिटी के अनुसार 2020 में यहां से लगभग 19000 जहाज (औसतन 52 जहाज प्रतिदिन ) गुजरे हैं।
  • विश्व के सम्पूर्ण वस्तु व्यापार का आठवा भाग यहीं से गुजरता है।
  • यह मिस्र की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है।
  • यहाँ होने वाले किसी संकट का असर एशिया ,यूरोप तथा अमेरिका के व्यापार पर पड़ता है।

इस घटना के वैश्विक प्रभाव

  • 7 दिनों में लगभग 350 जहाजों का आवागमन ठप्प हो गया था।
  • एशिया तथा यूरोप के मध्य होने वाले व्यापार के लिए स्वेज नहर के अतिरिक्त कोई अन्य प्रभावशाली मार्ग न होने के कारण भारत ,चीन ,सिंगापुर ,दक्षिण कोरिया , यूरोप तथा अमेरिका के व्यापार पर प्रभाव पड़ा है।
  • सप्लाई चेन के रुकने से फूल , फल , कृषिगत वस्तु के व्यापार को नुकसान हुआ है।
  • ब्रंट आयल के वैश्विक कीमत में 3% की कमी देखने को मिली है।
  • भारत का क्रूड आयल का आयात तथा पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात प्रभावित हुआ है।
  • भारत के कृषि तथा समुद्री वस्तुओं का व्यापार भी प्रभावित हुआ था।
  • भारत सहित सम्पूर्ण विश्व के बीमा उद्योग क्षतिपूर्ति की राशि देनी पड़ी।
  • यूरोप में तेल की कीमत कुछ समय के लिए बढ़ सकती है।
  • इस दौरान कई जहाजों ने अफ्रीका महाद्वीप पार करने का मार्ग चुना तथा उन्हें ईंधन का लगभग 26000 डॉलर प्रतिदिन का अतिरिक्त व्यय सहन करना पड़ा जो वस्तुओ की कीमत को बढ़ा देगा।

जहाज को निकालने में किये गए प्रयत्न

  • वहां से मड तथा सैंड को हटाया गया।
  • 14 टगबोट्स की सहायता से जहाज को खींचा गया।
  • इसी समय इस क्षेत्र में आये एक उच्च ज्वार ने जहाज को उत्प्लावित करने में सहायता दी।
  • अब इस जहाज को ग्रेट बिटर लेक पर रोक कर निरिक्षण किया जायेगा।

भारत द्वारा इस संकट के प्रभावों से निदान के लिए किये गए प्रयास

भारत सरकार के बाणिज्य विभाग के लॉजिस्टिक क्षेत्रक के सचिव की अध्यक्षता में एडीजी (शिपिंग ), पोर्ट तथा जलमार्ग मंत्रालय , एफआईईओ( भारतीय निर्यात संगठन संघ) ,सीएसएलए की संयुक्त बैठक में 4 सूत्रीय कार्यक्रम को लागू किया गया। जिसके मुख्य विन्दु निम्नलिखित थे -

  1. माल -भाड़ो की दर को स्थिर करने का प्रयास
  2. एफआईईओ , एमपीईडीए (समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) तथा एपीईडीए (कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ) एक साथ ख़राब होने तथा न ख़राब होने वाले वस्तुओ को पृथक करेंगे।
  3. रूकावट ख़त्म होने के उपरान्त कई बंदरगाहों (मुंद्रा , हजीरा ) ,जहाँ दबाव बढ़ने की आशंका है, उन बंदरगाहों का क्षमता विकास किया जायेगा।
  4. नए मार्गो की खोज की जाएगी।

निष्कर्ष

यद्यपि यह संकट 1 सप्ताह में समाप्त हो गया तथा इस संकट के प्रभाव भी कुछ दिनों में संतुलित हो जायेंगे परन्तु इस संकट ने कई मूल भूत प्रश्नो को जन्म दिया है जिसपर सम्पूर्ण विश्व को ध्यान देना आवश्यक है। कहीं न कहीं क्षमता बढ़ने के कारण जहाजों की आकृति में लगातार हो रही वृद्धि ने स्वेज नहर की क्षमता वृद्धि की आवश्यकता को दिखाया है। जिसप्रकार 2015 में स्वेज के उत्तरी हिस्से में टू लेन वॉटरवे का निर्माण किया गया है उसी प्रकार दक्षिणी भाग को भी विकसित करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही साथ अन्य व्यापारिक मार्गो की खोज करना भी आवश्यक हो गया है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1, 2 तथा 3
  • विश्व का इतिहास, भूगोल, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, अर्थव्यवस्था
  • विश्व के इतिहास में 18वीं सदी तथा बाद की घटनाएँ यथा औद्योगिक क्रांति, विश्व युद्ध, राष्ट्रीय सीमाओं का पुनःसीमांकन, उपनिवेशवाद, उपनिवेशवाद की समाप्ति,
  • भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान- अति महत्त्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं (जल-स्रोत और हिमावरण सहित) और वनस्पति एवं प्राणिजगत में परिवर्तन और इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रभाव।
  • द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।
  • कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन, संबंधित विषय और बाधाएँ;

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • बढ़ते हुए वैश्विक व्यापार में लाभोन्मुख प्रवृत्ति से स्वेज नहर का उसकी भौगलिक क्षमता से अधिक दोहन हो रहा है। क्या अब स्वेज नहर के विकल्प के लिए में सम्पूर्ण विश्व को उद्दत होना होगा ? विश्लेषणात्मक समीक्षा करें ?