भारत चीन सम्बन्धो का यथार्थवादी उपागम - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

सन्दर्भ:-

  • विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक नई किताब में कहा कि भारत की चीन नीति "भारत की संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण" होगा और ऐसा करने के लिए "पारंपरिक मान्यताओं से परे जाना होगा" तथा भारत हेतु आवश्यक है कि भारत चीन सम्बन्धो में यथार्थवादी दृष्टिकोण स्वीकारे जाएँ।

परिचय:-

  • श्री जयशंकर, जो वर्तमान में विदेशमंत्री हैं , एक पूर्व विदेश सचिव रहे जो चीन में भारत के सबसे लंबे समय तक रहने वाले राजदूत थे। इन्होंने भारत चीन सम्बन्धो में टर्निंग पॉइंट के रूप में 2009 के वैश्विक आर्थिक संकट के प्रभाव तथा 2012 में शी-जिंगपिंग का चीन की सत्ता में आना माना है।
  • इसके साथ ही भारत चीन के सीमा तनाव बढ़ने लगे तथा "अपनी बढ़त सुनिश्चित करते हुए एक अधिक शक्तिशाली पड़ोसी को प्रबंधित करने हेतु भारत को अब चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, और "ऐसा करने के लिए, हमे यह समझना चाहिए कि शक्ति संतुलन एक अनंत प्रक्रिया है।
  • यदि पिछले तीन दशकों में हुई शांति प्रगति को निरंतरता प्रदान करनी है तो हमे इस यथार्थ को समझना होगा कि सीमा और परस्पर संबंधों के भविष्य को अलग नहीं किया जा सकता है। ”

क्या है यथार्थवादी दृष्टिकोण :-

  • यथर्थवादी दृष्टिकोण के समर्थको यथा हंस मोर्गेनथो तथा अन्य विचारको के अनुसार, राजनीति शक्ति प्राप्त करने हेतु किया जाने वाले संघर्ष है। इसका अंतिम उदेश्य कुछ भी हो , इसका तात्कालिक उदेश्य शक्ति प्राप्ति ही है। यथार्थ वाद के प्रमुख सिद्धांत
  • मानव स्वाभाव का निराशावादी दृष्टिकोण
  • यह विश्वास की अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध अनिवार्यतः संघर्षपूर्ण होते हैं जिनका समाधान अंततोगत्वा युद्ध द्वारा ही होगा
  • राष्ट्रीय सुरक्षा के मूल्यों एवं राज्य अस्तित्व को विशेष ध्यान देना
  • इस विचार के प्रति मौलिक संशय की अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धो की प्रगति हो सकती है।

यथार्थवाद की प्रमुख धारणाएं

  • विश्व राजनीती की अराजकता व्यवस्था अर्थात विश्व सरकार की उपयोगिता को चुनौती
  • अंतराष्ट्रीय समबन्धो में राज्य प्रमुख अभिकर्ता
  • वैश्विक संगठन , गैर राज्य कर्ताओं का महत्व राज्य से कम
  • अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध महज शक्तिशाली देशो के मध्य प्रभुत्व संघर्ष
  • अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धो में मानवीय नैतिकता को सम्मिलित नहीं किया जा सकता।
  • राज्य का स्व-हित सर्वोपरि है।
  • राष्ट्रीय हित परिवर्तन शील हैं।

भारत को यह दृष्टिकोण क्यो स्वीकरना चाहिए ?

  • भारत तथा चीन में सीमा विवाद है , जो कि एक यथार्थ है।
  • चीन की साम्राज्यवादी नीतियों से त्रस्त दक्षिण एशियाई देश भारत को सुरक्षा प्रदाता के रूप में देख रहे हैं जो कि भारत के कद को बढ़ाएगा।
  • चीन द्वारा निरंतर भारत की प्रगति रोकने का प्रयास किया जा रहा है यथा एनएसजी में भारत की सदस्य्ता का विरोध।
  • चीन द्वारा लगातार मसूद अजहर को संरक्षण देने से कई वर्षो तक मसूद अजहर भारत विरोधी कार्यों में संलग्न रहा।
  • चीन लगातार भारत के पडोसी देशो में हस्तछेप कर उनकी नीतियों को भारतीय हितो के विपरीत करने का प्रयत्न कर रहा है। यथा चीन का नेपाल , पकिस्तान , श्रीलंका में हस्तछेप
  • भारत के कुछ हिस्सों यथा अक्साई चिन पर चीन का अतिक्रमण।
  • उपरोक्त कारणों को ध्यान में रखें तो हम यह पाते हैं भारत को अपने हितो को ध्यान में रखते हुए सदा संघर्ष हेतु तैयार रहना होगा। सीमा पर विवाद लगातार बढ़ रहे हैं इसके साथ ही साथ चीन हिन्द महासागर में अपनी पकड़ सुनिश्चित कर रहा है। ऐसी स्थिति में उदारवादी दृष्टिकोण भारत के हितो की पूर्ती में सक्षम नहीं होगा। अतः इस भारत को चीन के साथ सम्बन्ध की नीतियों में यथार्थ वादी दृष्टिकोण स्वीकारना चाहिए।

भारत को यथार्थवादी दृष्टिकोण को नहीं स्वीकरना चाहिए ?

  • दोनों ही देश परमाणु आयुध संपन्न हैं , संघर्ष के सशस्त्र होने की स्थिति में महाविनाश की स्थिति है।
  • यथार्थवाद वैश्विक संस्थान का निरादर करता है जबकि भारत की नीतियां वैश्विक संस्थाओं का आदर करती हैं।
  • भारत की सभ्यता वसुधैव कुटुंबकम तथा सर्वे भवन्तु सुखिनः को मानती है।
  • शांति तथा लोकतंत्र (वैश्विक व्यवस्था में भी ) भारत की नीति का अंग रहा है। इसके साथ ही ब्रिक्स , एससीओ , रिक (RIC ) जैसे संसथान तथा भारत तथा चीन की कूटनीतिज्ञों की बैठक लगातार तनाव को कम करने का प्रयास कर रही है। बातचीत से यदि मामले का हल निकले यह ज्यादा उचित तथा प्रगतिशील होगा।

निष्कर्ष :-

  • निसंदेह चीन तथा भारत के मध्य तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। । चीन की विस्तारवादी नीति सम्पूर्ण क्षेत्र हेतु संकट का विषय बन चुकी है। ऐसे में भारत को अपनी रणनीति को लचीला रखना होगा क्योंकि इसी यथार्थवादी दृष्टिकोण के अनुसार राष्ट्रिय हित परिवर्तन शील होते हैं।आवश्यक है कि भारत अपनी शांति की नीति पर कायम रहे परन्तु सम्प्रभुता को दांव पर लगाकर शांति नहीं स्वीकारी जा सकती

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2

  • अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • भारत तथा चीन के समबन्धो में भारत को यथार्थवादी दृष्टिकोण स्वीकरने की आवश्यकता है। क्या आप कथन से सहमत हैं ? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करें ?