पितृसत्तात्मकता और कोविड-19: लैंगिक संवेदनशीलता की माँग - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

चर्चा का कारण

  • कोरोना वायरस महामारी के कारण घोषित किए गए लॉकडाउन के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग ने देश में घरेलू हिंसा के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। घरेलू हिंसा में वृद्धि यह दर्शाती है की भारतीय समाज में पितृसत्तात्मकता अभी भी विद्यमान है और कोरोना वायरस की महामारी ने इसके स्वरूप को उजागर करने का कार्य किया है।

क्या है पितृसत्ता

  • पितृसत्ता अंग्रेजी शब्द पैट्रियार्की का हिंदी अनुवाद है। अंग्रेजी में यह शब्द दो यूनानी शब्दों पैटर और आर्के को मिलाकर बना है। पैटर का मतलब है पिता और आर्के का मतलब है शासन यानी कि ‘पिता का शासन। पितृसत्ता को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाएं पूरी तरह शक्तिहीन हैं या पूरी तरह अधिकारों, प्रभाव और संसाधनों से वंचित हैं। इस व्यवस्था की खास बात इसकी विचारधारा है जिसके तहत यह विचार प्रभावी रहता है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए। इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है।

कोरोना महामारी के दौरान कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी

  • भारतीय समाज में पुरुषों को परिवार के लिए कमाने वाला मानने की धारणा कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी को कम करती है और उन्हें घरेलू कार्यों में ही सीमित करती है। जबकि दूसरी ओर, पुरुष यह सोचना शुरू कर देते हैं कि वे पैसे कमाकर कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और वे अंततः महिलाओं द्वारा किए गए घरेलू काम को महत्वहीन समझने लगते हैं। इससे पुरुषों में श्रेष्ठता की भावना पैदा होती है और उन्हें लगता है कि उन्हें महिलाओं का अपमान करने और उनका शोषण करने का अधिकार है।
  • कोरोना महामारी पहले से मौजूद असमानताओं को और गहरा कर रही है। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रणालियों में इसने महिलाओं के संदर्भ में कमजोरियों को पूरी तरह से उजागर किया है।
  • जाहिर तौर पर कोविड महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियों के संकुचन से लोगों के रोजगार सीमित हुये हैं। इसका महिलाओं पर व्यापक असर हुआ है। वैश्विक स्तर पर 75 प्रतिशत महिलाएं और लड़कियां परिवार की देखभाल एवं अन्य घरेलू काम करती हैं,जो अवैतनिक होता है। हालांकि दो दशक से अधिक पुराने (1998-99) राष्ट्रीय-स्तर किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि भारत में लगभग 91 प्रतिशत अवैतनिक देखभाल और घरेलू रखरखाव जैसे कार्य महिलाओं द्वारा किए गए। इसके अलावा पुरुषों द्वारा प्रति सप्ताह लगभग दो घंटे के विपरीत महिलाओं ने औसतन 25 घंटे प्रति सप्ताह देखभाल कार्य में बिताए। कोरोना काल में यह भेद और बढ़ गया।
  • 2004-05 में भारत में अवैतनिक देखभाल कार्य और घरेलू रखरखाव में पुरुषों द्वारा प्रति दिन 45 मिनट के मुकाबले महिलाओं ने प्रति दिन पांच घंटे से अधिक समय बिताया। इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि वर्तमान समय में कोविड 19 के कारण महिलाएं घरेलू कार्यों में इतनी व्यस्त हो गईं हैं कि उन्हें अपने स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी नजर नहीं आ पातीं।
  • पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आर्थिक स्थिति खराब होने की एक और वजह ये है कि पुरुषों के मुकाबले उन्हें वेतन कम मिलता है। समान पद पर समान काम करने वाली महिला को दुनिया भर में पुरुष कर्मचारियों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता है। कोरोना काल में यह भेदभाव और व्यापक हो गया।

कोविड 19 के कारण घरेलू कार्यों में महिलाओं पर बढ़ती निर्भरता

  • कोविड 19 के कारण घरेलू कार्यों में महिलाओं पर बढ़ती निर्भरता उनके आर्थिक सशक्तिकरण और घर से बाहर निकलने के लिए उनके दशकों के अविश्वसनीय संघर्ष को धूमिल करती जा रही है।
  • भारत एवं विश्व में कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जो बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार देते हैं- जैसे पर्यटन, आतिथ्य और खुदरा (retail यह लगभग तय है कि ये सेक्टर जल्द ही किसी भी समय पूर्ण पैमाने पर अपने परिचालन को फिर से शुरू नहीं करने वाले हैं। इसका तात्पर्य है कि महिला श्रमिकों का पर्याप्त स्तर पर नियंत्रण और महिलाओं के आय के स्वतंत्र स्रोत के अवसरों का संकुचन होगा।
  • कोरोना महामारी के प्रभावों को कम करने के लिए किए गए उपायों ने महिलाओं की दिनचर्या को बेहद कठिन बना दिया है, उदाहरण के लिए- ऑनलाइन शिक्षा मांग करती है कि माताओं को बच्चों को ऑनलाइन कक्षाओं, असाइनमेंट और आकलन करने में मदद करने के लिए लंबे समय तक निर्बाध रूप से उपलब्ध होना चाहिए। इसके अलावा, बच्चों और बुजुर्गों को संभावित कोरोनोवायरस संक्रमणों से बचाने और घर से बाहर रहने वाले सदस्यों की देखभाल करने का महिलाओं पर भारी असर पड़ता है। यदि घर के पुरुष सदस्यों को घर से काम करने का विकल्प प्रदान किया जाता है, तो देखभाल कार्य की तीव्रता काफी बढ़ जाती है। कोविड महामारी के ये प्रभाव एक महिलाओं की स्थिति को कमजोर कर रहे हैं तो दूसरी ओर परिवार के पुरुषों में उनकी निर्भरता को भी बढ़ा रहे हैं, जिसका अंतिम परिणाम भारतीय समाज में पहले से विद्यमान पितृसत्ता को और भी मजबूत कर रहा है।

लैंगिक असमानता का समापन आवश्यक

  • बेहतर लैंगिक समानता को प्राप्त करने के लिए निम्नलििखत प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताओं पर जोर दिया जाना चाहिएः
  • कोविड-19 से संबन्धित योजनाओं और निर्णयों में महिलाओं को समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए। आर्थिक नियोजन और आपातकालीन प्रतिक्रिया सहित सभी क्षेत्रें में निर्विवाद रूप से यह देखा गया है कि जिन नीतियां अथवा निर्णय लेने में महिलाओं से परामर्श नहीं लिया गया या उन्हें शामिल नहीं किया गया, वे कम प्रभावी रही हैं। व्यक्तिगत महिलाओं के साथ महिलाओं के संगठन जो अक्सर समुदायों में प्रतिक्रिया की अग्रिम पंक्ति में होते हैं, उनका भी प्रतिनिधित्व और समर्थन किया जाना चाहिए।
  • वैतनिक और अवैतनिक देखभाल अर्थव्यवस्था को संबोधित करके समानता के लिए परिवर्तनकारी बदलाव लाया जा सकता है।
  • महिलाएँ दुनिया की कुल आबादी का करीब-करीब आधा हिस्सा हैं, और इसी कारण से लैंगिक विभेद के व्यापक और दूरगामी असर होते हैं, जिनका समाज के हर स्तंभ पर असर दिखता है। बीजिंग घोषणापत्र एवं प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन का मुख्य उद्देश्य जीवन के सभी क्षेत्रें में लैंगिक समानता को बढ़ाने के साथ सिविल सोसायटी व महिलाओं एवं युवाओं को साथ लाना है। इसलिए कामकाजी महिलाओं की कार्यदशाओं को सुधारने एवं आर्थिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु भारत में जेंडर बजटिंग के प्रावधानों को जमीनी हकीकत पर उतारने की आवश्यकता है।

आगे की राह

  • कोरोना महामारी के अस्तित्व के पहले से महिलाओं के प्रति हिंसा हमारे समाज की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक है। लेकिन जब लॉकडाउन के अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं बचा था तब भी भुगतने वाली महिलाएं ही थीं या हैं। एक समाज के रूप में हम किसान, मजदूर, गरीब, पिछड़ों के लिए तो फिर भी आगे आ कर सहायता कर रहे हैं, लेकिन महिलाओं की सहायता ऐसी परिस्थितियों में सबसे आवश्यक काम है।
  • लैंगिक असमानता को दूर करने के लिये कानूनी प्रावधानों के अलावा सामाजिक जागरूकता बेहद आवश्यक है, कोरोना महामारी से उपजी परिस्थितियों में आर्थिक मापदंड पर महिलाओं की आत्मनिर्भरता पुरुषों पर बनी हुई है अर्थात् महिलाओं द्वारा परिवार के खेतों और उद्यमों पर कार्य करने को तथा घरों के भीतर किये गए अवैतनिक कार्यों को सकल घरेलू उत्पाद में नहीं जोड़ा जाता है। पितृसत्ता का प्रभाव सिर्फ देश के ज्यादातर नागरिकों पर ही नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका जैसे संस्थान भी इसके असर से बचे हुए नहीं हैं, जिन पर इन और दूसरे कानूनों को लागू कराने का दायित्व है।
  • कोविड-19 के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को संबोधित करने के सभी प्रयासों में महिलाओं और लड़कियों को शामिल किया जाना चाहिए साथ ही राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेजों और सामाजिक सहायता कार्यक्रमों को तैयार करते समय लैंगिक दृष्टिकोण को निश्चित रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए। ताकि महिलाओं और लड़कियों को अधिक समानता, अवसर और सामाजिक सुरक्षा प्राप्त हो सके। मौजूदा महामारी के संकट में महिलाओं और लड़कियों के लिए विशेष प्रावधान किया जाना अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

सामान्य अध्ययन पेपर-2
  • केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन, इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिए गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।
  • स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/ सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • क्या कोरोना महामारी पितृसत्ता को मजबूत कर रही है? आलोचनात्मक टिप्पणी करें।