संसदीय विशेषाधिकार (Parliamentary Privilege) - समसामयिकी लेख

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 संसद तथा उसके सदस्यों के विशेषाधिकार संबंधित हैं।

संविधान ने संसदीय अधिकार उन व्यक्तियों को भी दिये हैं जो संसद के दोनों सदनों या इसकी किसी भी समिति में बोलते तथा हिस्सा लेते हैं। इनमें भारत के महान्यायवादी तथा केंद्रीय मंत्री शामिल है।

सदस्यों के व्यक्तिगत अधिकारों से संबंधित विशेषाधिकार निम्न हैं-

  1. संसद सदस्यों को संसद के अधिवेशन के दौरान या अधिवेशन के 40 दिन पूर्ण या पश्चात् किसी सिविल मामले में गिरफ्तार नहीं किया जायेगा। यह छूट अपराधिक मामलों में प्राप्त नहीं है। यदि कोई सदस्य गिरफ्तार किया जाता है तो उसकी पूर्वसूचना अध्यक्ष को देनी आवश्यक है।
  2. संसद के अधिवेशन के दौरान सभापति की अनुमति के बिना किसी न्यायालय के समक्ष साक्षी के रूप में उपस्थित होने के लिए विवश नहीं किया जायेगा।
  3. संसद सदस्यों को संबंधित समितियों में बोलने की पूर्ण स्वतंत्रता है और इसके लिये उनके विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।
  4. संसद या उसके सदस्यों के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को दषित करने का अधिकार है।

किंतु उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के विरूद्ध कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है। सिवाय जबकि उनके विरूद्ध महाभियोग प्रस्ताव पर विचार विमर्श हो रहा हो।

धन विधेयकः

संविधान के अनुच्छेद 110 के तहत धन विधेयक को परिभाषित किया गया है। किसी विधेयक को धन विधेयक कहा जायेगा यदि उसमें निम्नलिखित विषयों से संबंधित प्रावधान हो-

  1. किसी कर को लगाना, समाप्त करना, परिवर्तन या नियमित करने संबंधी प्रावधान।
  2. भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने से संबंधित विधि का संशोधन या विनियमन।
  3. भारत की संचित निधि या आकस्मिक निधि में धन जमा करना, उसमें से धन निकालना या धन की अभिरक्षा से संबंधित प्रावधान करना।
  4. किसी व्यय को भारत की संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना।
  5. भारत को संचित विधि या भारत के लोकलेखा से कोई धन प्राप्त करना या संघ अथवा सरकारों के लेखों की जांच से जुड़े विषय।

अनुच्छेद 110(2)- में स्पष्ट किया गया है कि कोई विधेयक केवल इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जायेगा कि-

  1. उसका संबंध जुर्माने या अन्य आर्थिक दण्डों के साथ है।
  2. उसका संबंध किन्हीं सेवाओं या लाइसेंसों की फीस के साथ है।

विशेषतायें:

  1. धन विधेयक को पारित करने के लिये अनुच्छेद 109 के तहत विशेष प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है।
  2. धन विधेयक राज्य सभा में पेश नहीं किये जा सकते हैं, इसे केवल लोकसभा में पेश किया जाता है।
  3.  धन विधेयक को लोकसभा में प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की सहमति आवश्यक है।
  4. लोकसभा अध्यक्ष प्रमाण पत्र संलग्न करती है कि यह धनविधेयक है।
  5. धन विधेयक के संबंध में राज्य सभा का अधिकार अत्यंत सीमित हैं।

यह धन विधेयक में कोई संशोधन नहीं कर सकती है, इसके संबंध में सिर्फ अपनी सिफारिश दे सकती है। राज्य सभा को विधेयक 14 दिन के अंदर सिफारिश सहित या रहित लोकसभा को लौटाना होता है। लोक सभा इन सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।

यदि राज्य सभा 14 दिनों के अंदर धन विधेयक को लोक सभा में वापस नहीं करती है तो उक्त अवधि की समाप्ति कर विधेयक को दोनों सदनों में पास मान लिया जायेगा।

6. राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिये वापस नहीं कर सकता क्योंकि उसे उसकी पूर्वानुमति से ही लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है।

धन विधेयक-वित्त विधेयक में संबंधः

प्रत्येक धन विधेयक, वित्त विधेयक होता है परन्तु प्रत्येक वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होता है।

वित्त विधेयक की विशेषतायें-

  1. वित्त विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया अनुच्छेद 117 में दी गई है।
  2. वित्त विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाता है।
  3. वित्त विधेयक के संबंध में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है (जबकि धन विधेयक के मामले में नहीं)
  4. वित्त विधेयक को राष्ट्रपति पुनर्विचार के लिये लौटा सकता है।

अध्यादेशः

अध्यादेश की कल्पना मूल रूप से आपातकालीन प्रावधान के रूप में भारत शासन अधिनियम 1935 में वायसराय को प्राप्त विशेषाधिकार के रूप में की गई थी।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति तथा अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल (राज्य सूची के विषय पर) विशेष परिस्थितियों में अध्यादेश जारी कर सकते हैं।

विशेष परिस्थितियाँ- जब संसद के दोनों सप्तों में से कोई एक या दोनों सदन सत्र में न हो और राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हो कि तत्काल कार्यवाही करना आवश्यक है। तो ऐसे में राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी किया जा सकता है।

समय सीमा- संसद की कार्यवाही पुनः शुरू होने पर दोनों सदनों द्वारा छः सप्ताह की समय सीमा में संबंधित अध्यादेश को पारित करना आवश्यक है अन्यथा अध्यादेश का प्रभाव समाप्त हो जायेगा।

अध्यादेश की अधिकतम समय सीमा - छः माह+छः सप्ताह (दो सत्रें के मध्य का अधिकतम समय)

1. राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश की शक्ति के प्रयोग में निम्नलिखित चार सीमायें हैं-

  • राष्ट्रपति के द्वारा अध्यादेश जारी करने की शक्ति विधायिका के समानांतर शक्ति नहीं है। यह आपातकालीन अस्थायी प्रावधान है।

2. सभी मामलों में अध्यादेश जारी करने की शक्ति केवल समयावधि को छोड़कर, संसद की कानून बनाने की शक्तियों के समान है। इसकी दो सीमायें है-

  • अध्यादेश केवल उन्हीं विषयों पर जारी किया जा सकता है जिन पर संसद कानून बना सकती है अर्थात संघ सूची या समवर्ती सूची के विषयों पर।
  • अध्यादेश की वहीं संवैधानिक सीमायें होती हैं, जो संसद द्वारा बनाये गये किसी कानून की होती हैं। अतः एक अध्यादेश किसी भी मौलिक अधिकार का लघुकरण नहीं कर सकता।

3. राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी करने के निर्णय को न्यायपालिका में चुनौती दी जा सकती है अर्थात अध्यादेश की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

4. संसद सत्रावसान की अवधि में जारी किया गया। प्रत्येक अध्यादेश संसद की पुनः बैठक होने पर दोनों सदनों के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिये।

  • यदि दोनों सदन उस अध्यादेश को पारित कर देते हैं तो वह कानून का रूप धारण कर लेता है।
  • यदि दूसरी बैठक के छः हफ्ते पश्चात तक अध्यादेश पारित नहीं किया गया तो यह निष्प्रभावी हो जाता है।

अध्यादेश पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णयः

  1. आरसी कपूर केस 1970: एससी ने कहा राष्ट्रपति के अध्यादेश जारी करने के फैसले को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि तत्काल कार्यवाही की आवश्यकता नहीं थी एवं अध्यादेश मुख्य रूप से सदन में बहस एवं चर्चा से बचने के लिए जारी किया गया था।
  2. डीसी वाधवा केस, 1987: 1967 से 1981 के बीच 256 अध्यादेशों की घोषणा, जिनमें से 11 ऐसे अध्यादेश शामिल थे जिन्हें 10 से अधिक वर्षों तक प्रयोग में लाया जाता रहा- बिहार ‘अध्यादेश राज’ के नाम से प्रसिद्ध सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कार्यपालिका द्वारा अध्यादेश जारी करने की शक्ति का प्रयोग असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिये न कि विधायिका की विधि बनाने की शक्ति के विकल्प के रूप में।
  3. कृष्ण कुमार सिंह केस, 2017: अध्यादेशों को जारी करने का अधिकार पूर्ण नहीं है, यह सशर्त है। यदि मौजूदा परिस्थितियों में प्रकृति में तत्काल कार्यवाही करना आवश्यक है तभी इसका प्रयोग किया जाना चाहिये। ‘अध्यादेशों का लगातार प्रयोग संविधान पर आस्था के प्रति धोखा है एवं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अनुचित प्रयोग है।’

अध्यादेश से संबंधित मुद्दे-

  • विधायी शक्ति का प्रयोग विधायिका द्वारा, विशेष परिस्थितियों में तत्काल आवश्यकताओं के लिये कार्यपालिका द्वारा अध्यादेश- अध्यादेश को पुनः आगे बढ़ाना अनैतिक
  • शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत का उल्लंघनः 1973 में केश्वानंद भारती केस में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की ‘आधारभूत संरचना’ के रूप में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को सूचीबद्ध किया।

‘‘अध्यादेश को संसद के सत्र में होने पर तत्कालिक कार्यवाही के लिये बनाया गया है, यह विधायिका का विकल्प नहीं है।’’

अध्यादेशों का पुनंर्सयोजन शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है क्योंकि यह कार्यपालिका को विधायिका से विचार-विमर्श या अनुमोदन के बिना स्थाई रूप से विधि बनाने की अनुमति देता है। जैसे- भूमि अधिग्रहण अधिनियम में संशोधन करने का अध्यादेश दिसंबर 2014 में जारी किया गया एवं दो बार अप्रैल और मई 2015 में पुनः प्रस्थापित किया गया।

कार्यपालिका को आत्मसंयम दिखाना चाहिये और अध्यादेश जारी करने की शक्ति का उपयोग केवल अप्रत्याशित मामलों में ही करना चाहिये।

तारांकित एवं अतारांकित प्रश्नः

भारत में संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है जिसमें कार्यपालिका विधायिका के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। विधायिका के सदस्य (सांसद) किसी मामले में जानकारी के लिये संबंधित मंत्री से प्रश्न पूछते है और सामान्यतः मंत्री उत्तर देते हैं। तारांकित और आतारंकित प्रश्न भी कार्यपालिका की विधायिका के समक्ष जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है। उसकी निरंकुशता पर अंकुश आरोपित करती है।

तारांकित प्रश्नः जब प्रश्न पूछने वाला (विधायिका का सदस्य) सदन में तत्काल उत्तर चाहता है तब वह प्रश्न के शीर्ष पर तारा (स्थिर) लगा देता है। इसे तारांकित प्रश्न कहा जाता है।

तारांकित प्रश्न का उत्तर मौखिक रूप से दिया जाता है तथा इसके संबंध में पूरक प्रश्न भी पूछा जा सकता है।

अतारांकित प्रश्नः संसद में जिन प्रश्नों का उत्तर सदस्य लिखित में चाहता है, उन्हें अतारांकित प्रश्न कहा जाता है। जिसमें पूरक प्रश्न नहीं पूछा जाता है।

इसमें संबंधित मंत्री, प्रश्न का लिखित उत्तर सदन के पटल पर रख देता है।

प्रत्यायोजित विधान (Subordinate Legislation):

प्रत्यायोजित विधान उन कानूनों को कहते हैं जो कार्यपालिका द्वारा बनाये जाते हैं। इन्हें द्वितीयक विधायन भी कहते हैं। इसके विपरीत विधायिका द्वारा बनाये गये विधानों को प्राथमिक विधान कहते हैं।

प्राथमिक विधान एक विस्तृत रूपरेखा पेश करते हैं और कार्यपालिका को अधिकार देते है कि वह अपनी आवश्यकतानुसार नियम बना सके। इसी के आधार पर कार्यपालिका अपने लिये आयुक्त विधान बनाती है जिन्हें प्रत्यायोजित विधान कहते हैं। जैसे- नागरिकता संशोधन अधिनियम अधिनियम 2019 पारित कर संसद ने कार्यपालिका को प्रत्यायोजित विधान के तहत सीमा संबंधी प्रावधान बनाने का अधिकार दे दिया।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2
  • राजव्यवस्था