वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


संदर्भ

  • हाल ही में केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने ‘वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड’ परियोजना को लागू करने के लिए सलाहकारी फर्मों के प्रस्तावों को आमंत्रित किया है ताकि एक दीर्घकालिक वैश्विक इलेक्टिसिटीग्रिड का रोडमैप समावेशी तरीके से तैयार किया जा सके। ऐसी सीमापारीय ऊर्जा परियोजनाओं को दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों, मध्य पूर्व और अफ्रीकी देशों के साथ मिलकर शुरू कर भारत वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने की मंशा रखता है।
  • दुनिया भर में बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए, 'वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड' का विचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अक्टूबर 2018 में हिंद महासागर रिम एसोसिएशन की दूसरी वैश्विक री-इन्वेस्ट बैठक और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) की पहले सम्मेलन के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते दिया गया था।

वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड’(OSOWOG) परियोजना

  • OSOWOG अक्षय ऊर्जा संसाधनों को आपस में जोड़ने के लिए वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण भारत द्वारा शुरू की गयी एक पहल है। OSOWOG का ब्लू प्रिंट विश्व बैंक के तकनीकी सहायता कार्यक्रम के तहत विकसित किया जाएगा।
  • OSOWOG को तीन चरणों में पूरा करने की योजना है। इसके पहले चरण में मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया (MESASEA) को परस्पर जोड़ा जाएगा। दूसरे चरण में अफ्रीका को जोड़ा जाएगा और तीसरे चरण में पूरी परियोजना का वैश्वीकरण होगा।

One Sun One World One Grid

वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड’ परियोजना का महत्व

  • वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड परियोजना (OSOWOG) भारत की एक महत्वाकांक्षी सौर ऊर्जा परियोजना है जिसका उद्देश्य सामान्य संसाधनों का उपयोग करके बुनियादी ढांचे और सौर ऊर्जा के लाभों को साझा करने के लिए एक वैश्विक सहयोग बनाना है। इसे भारत की सम्प्रभुता को चुनौती देने वाली चीन की वन बेल्ट वन रोड पहल प्रत्युत्तर में भारत का प्रयास भी कहा जा सकता है। इसकी आवश्यकता निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझी जा सकती है:
  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) की सफलता: जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में एक अग्रणी देश के रूप में, भारत ने 2015 में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का विचार प्रस्तुत किया था। आईएसए का लक्ष्य सभी को 24*7 सस्ती कीमत पर सौर ऊर्जा उपलब्ध कराना है। लगभग 120 देशों के प्रमुखों ने आईएसए में अपनी भागीदारी की पुष्टि की है। ऐसे में OSOWOG निवेश और सहयोग को बढ़ावा देगा। सभी के लिए 24*7 बिजली: समान आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए सरकार का लक्ष्य सभी को 24*7 बिजली प्रदान करना है। OSOWOG सीमा और सामरिक क्षेत्रों जैसे उत्तर पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश, पश्चिमी हिमालयी राज्यों और बिहार और उत्तर प्रदेश मे बिजली प्रदान करने के लिए मंच प्रदान करेगा।
  • पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं की पूर्ति: भारत सरकार ने 2022 के आखिर तक 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस विजन को गति देने के लिए इस क्षेत्र में वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर बल देना भारत की तार्किक सोच को दर्शाता है। भारत, लक्षित राष्ट्रीय निर्धारित योगदान(NDC) पर संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संरचना सम्मेलन (UNFCCC) में प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन के अनुसार, 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा संसाधनों से 40 प्रतिशत संचयी विद्युत ऊर्जा क्षमता अर्जित करेगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में OSOWOG परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।
  • सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2016 में 781 मिलियन से अधिक लोगों (दुनिया की 39% आबादी) तक खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन और प्रौद्योगिकियों तक पहुंच नहीं है। एसडीजी के लक्ष्य 7 के अनुसार वर्ष 2030 तक सभी लोगो के लिए सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा की पहुंच सुनिश्चित करने में OSOWOG परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। ऊर्जा पहुंच का विस्तार करने के लिए, ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश में वृद्धि किया जाना अति महत्वपूर्ण है।
  • पड़ोसी प्रथम नीति को मजबूती प्रदान करना: नेपाल और भूटान जैसे स्थलबद्ध पड़ोसी जलविद्युत संसाधनों में समृद्ध हैं। OSOWOG उन्हें अपनी अधिशेष बिजली को बिजली की कमी वाले राष्ट्रों को निर्यात करने के लिए अपेक्षित मंच प्रदान करेगा। भारत सरकार नेपाल के सहयोग से अरुण- III जल विद्युत संयंत्र और भूटान के सहयोग से मंगदेछु जलविद्युत परियोजना जैसे निर्यात-उन्मुख जल- विद्युत परियोजनाएँ विकसित कर रही है।
  • बहुपक्षवाद और वैश्वीकरण के प्रति प्रतिबद्धता: संयुक्त राष्ट्र संघ के एक जिम्मेदार सदस्य के रूप में, भारत का उद्देश्य सौर ऊर्जा संपन्न देशों और सौर ऊर्जा दुर्लभ राष्ट्रों के बीच सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देकर दुनिया में आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को दूर करना है। OSOWOG आपदा रोधी संरचना के लिए गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure-CDRI) को भी मजबूती प्रदान करेगा।
  • चीन की आर्थिक मुखरता का मुकाबला करना: OSOWOG को चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) को भारत के प्रत्युत्तर के रूप में देखा जा रहा है। BRI मुख्य रूप से 78 भागीदार देशों के बीच संपर्क और सहयोग बढ़ाकर कर उनकी घरेलू अर्थव्यवस्था में सुधार करने की चीन की एक आर्थिक कूटनीति है।

अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन

  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन एक संधि-आधारित अंतर्राष्ट्रीय अंतर-सरकारी संगठन है।
  • वर्तमान में 122 देश इसके सदस्य हैं इसका मुख्यालय हरियाणा के गुरुग्राम में है।
  • इस गठबंधन का प्राथमिक उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर ऊर्जा की निर्भरता को खत्म कर सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना है।
  • इसके अतिरिक्त सदस्य देशों को सस्ती दरों पर सोलर टेक्नोलॉजी का प्रबंध कराना व इस क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (Research & Development) को बढ़ावा देना।
  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार परिवहन और विद्युत क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा का कम उपयोग, एक स्वच्छ ऊर्जा वाले भविष्य को अंधकारमय कर सकता है। ऐसे में भविष्य की रणनीति को तय करना बहुत जरूरी हो गया है।

OSOWOG को बढ़ावा देनी वाली पहल

  • सोलर मिनी ग्रिड कार्यक्रम: वैश्विक सलाहकार कंपनी डेलॉयट के समर्थन में आईएसए सचिवालय, मिनी-ग्रिड कार्यक्रम के लिए एक ठोस कार्यान्वयन योजना विकसित कर रहा है। आईएसए सचिवालय ने राष्ट्रीय फोकल बिंदुओं के लिए एक मॉडल मिनी-ग्रिड नीति का मसौदा भी तैयार किया।
  • वर्ल्ड सोलर बैंक: भारत द्वारा OSOWOG को धरातल पर उतारने हेतु आने वाली वित्तीय चुनौतियों के मद्देनजर इस परियोजना के लिए समुचित मात्रा में वित्त आपूर्ति हेतु वर्ल्ड सोलर बैंक’ (World Solar Bank- WSB) की स्थापना के प्रयास किए जा रहे हैं।
  • स्केलिंग सोलर रूफटॉप: आईएसए सचिवालय पेरू और घाना के अधिकारियों के साथ मिलकर काम कर रहा है ताकि रूफ-टॉप परियोजनाओं की तैयारी के लिए तकनीकी सहायता प्रदान की जा सके। आईएसए सचिवालय ने भारत में RESCO मॉडल के तहत रूफटॉप सौर पैनल के लिए दूतावासों/मिशनों को प्रस्ताव भी दिया है।
  • अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का विस्तार: पहले जहां अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का दायरा केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक था अब इसे बढ़ाकर विश्व के सभी देशों के लिए कर दिया गया है।

OSOWOG परियोजना से जुड़े मुद्दे

  • ‘वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड’ परियोजना से जुसे प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित है:
  • भू-राजनीति: यह परियोजना को विश्व का नेतृत्व करने के भारतीय प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन COVID-19 के कारण उत्पन्न अनिश्चितताओं में, OSOWOG जैसी परियोजनाओं के भू-राजनीतिक निहितार्थों को समझना मुश्किल है। परियोजना के भागीदार देशों की सामाजिक-आर्थिक प्राथमिकताओं को देखते हुए एक निश्चित लागत-साझाकरण तंत्र विकसित करना चुनौतीपूर्ण होगा। इसके अलावा कोई भी द्विपक्षीय/बहुपक्षीय मुद्दा महाद्वीपों और देशों के बीच महत्वपूर्ण सेवाओं को प्रभावित कर सकता है। इसलिए संभव है कि कई देश इसमें भाग लेने के लिए तैयार ही न हो।
  • वैश्वीकरण बनाम वि-वैश्वीकरण: कोरोनोवायरस महामारी ने वैश्वीकरण की अवधारणा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं और इसका प्रभाव परिवर्तनकारी होंगे। संरक्षणवाद, व्यापार-युद्ध और बहुपक्षीय समझौतों का द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौतों में बदलाव के इस युग में, OSOWOG का विचार बहुत ही धूमिल नजर आ रहा है। विभिन्न सरकारों और बाजार की शक्तियों से निपटना अक्षय ऊर्जा उत्पादकों के लिए एक कठिन अनुभव होगा। भारत में अक्षय ऊर्जा उत्पादकों के लिए प्रमुख मुद्दा विभिन्न राज्य सरकारों अर्थात विभिन्न कानूनों और नियमों से निपटना है।
  • आर्थिक लाभ: इस एकीकृत ग्रिड के माध्यम से ऊर्जा की आपूर्ति के लिए बिजली के प्रसारण के हजारों किलोमीटर लंबी ट्रांसमिशन लाइनों की आवश्यकता होगी। ऐसे में अकेले विद्युत ट्रांसमिशन लागत भूमि और सौर विकिरण के लाभों पर भरी पड़ सकती सकती है।
  • तकनीक: इसके कार्यान्वयन में तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती है उदाहरण के लिए सौर पैनलों के निर्माण के बजाय सौर नीति का उद्देश्य सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना पर अधिक रहा है, जिसके कारण भारत में सौर पैनल निर्माण को सुनिश्चित करने के लिए कोई वास्तविक योजना नहीं है।
  • वित्त: इस परियोजना के कार्यालय में सबसे बड़ी चुनौती वित्त को लेकर है क्योंकि अफ्रीका एवं एशिया इत्यादि के कई सारी देश के पास सौर ऊर्जा से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए वित्त का अभाव है। जब तक एक विशेषकृत एजेंसी द्वारा इसकी व्यवस्था नहीं की जाएगी यह योजना फलीभूत नहीं हो पाएगा।
  • पर्यावरण मुद्दें: एनर्जी कंसल्टेंसी फर्म ब्रिज टू इंडिया (BTI) लिमिटेड द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार भारत के फोटोवोल्टिक अपशिष्ट की मात्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अध्ययन के अनुसार फोटोवोल्टिक अपशिष्ट की मात्र 2030 तक 2 लाख टन और 2050 तक लगभग 18 लाख टन बढ़ने का अनुमान है। सौर ई-अपशिष्ट से पर्यावरण चुनौतिया के कारण इसका पुनर्चक्रण एक प्रमुख समस्या है।

आगे की राह

  • विश्व बैंक कि समीक्षाओं से पता चलता है कि इस तरह के क्रॉस बॉर्डर ट्रांसमिशन लाइनों के आर्थिक लाभों को सही मायने में अधिकतम किया जाता है जब उनका निर्माण सामान्य उद्देश्यों वाले राजनीतिक संघ के अंतर्गत किया जाता है जैसे यूरोपीय संघ या स्कैंडेनेवियन देश।
  • भारत को चीन के साथ सहयोग करना चाहिए क्योंकि उसे अल्ट्रा-हाई वोल्टेज नेटवर्क निर्माण में विशेषज्ञता हासिल है। चीन ने पहले ही ग्लोबल एनर्जी इंटरकनेक्शन डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन के तत्वावधान में एक ग्लोबल ट्रांसमिशन ग्रिड प्रोजेक्ट लॉन्च कर चुका है, जो दुनिया भर में ऊर्जा के सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है।

लेख को पीडीएफ में डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें


© www.dhyeyaias.com

<< मुख्य पृष्ठ पर वापस जाने के लिये यहां क्लिक करें