कट्टरता की ओर एक कदम और - समसामयिकी लेख

चर्चा में क्यों?

कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक ‘सनराइज ओवर अयोध्या’ को लेकर जनता के एक वर्ग में रोष देखने को मिल रहा है I गुस्साए लोगों ने सलमान खुर्शीद के घर में घुसकर तोड़-फोड़ और आगजनी की वारदात को अंजाम दिया है I

पृष्टभूमि

प्रगतिशील समाज न सिर्फ़ अपने बल्कि दूसरों के विपरीत विचारों को भी समुचित महत्व देता है I ऐसे समाज में नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है I बदलते दौर के मूल्यों के अनुरूप परम्पराओं के समुचित मूल्यांकन की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है I जिससे रुढियों की पहचान कर, संस्कृति को उससे मुक्त कर संस्कृति को परिष्कृत रूप दिया जाता है I जिससे नवीन संस्कृति का, नये जीवन मूल्यों का विकास होता है I

प्राचीन काल से ही भारत में वाद-संवाद की संस्कृति रही है I अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता रही है I परस्पर विरुद्ध और विपरीत विचारों को यथोचित सम्मान दिया गया है I ‘मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना’,‘नवा वाणी मुखे मुखे’ और ‘एकं सत्य बहुधा विप्रा वदन्ति’ जैसे विचारों में प्राचीन भारतीय समाज की सहिष्णुता परिलक्षित होती हैI यही कारण है भारत में वेद आधारित ब्राह्मण धर्म और उससे असहमति व्यक्त करने वाले जैन-बौद्ध जैसे धर्मो सभी का विकास हुआ I चार्वाक का भौतिकवादी दर्शन भी भारतीय समाज में लोकप्रिय हुआ I यही कारण है जहाँ अनेक संस्कृतियाँ काल के गाल में समा गई वहां भारतीय संस्कृति सहिष्णुता, उदारता और गृहणशीलता के कारण आज भी अपनी विविधता, निरन्तरता और विलक्षणता को संरक्षित किये हुए है I

पुस्तक पर प्रतिबंध

सोशल मीडिया के आने के बाद से भारत में इसके उपयोगकर्त्ताओं की संख्या में दिनोंदिन वृद्धि हो रही है I एक ओर सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नए आयाम प्रदान किये हैं वहीँ व्यक्ति की निजता, गरिमा और विचारों के सम्मान की भावना में गिरावट भी आई है I अक्सर ऐसे मामलों में लोकतंत्रिक देश में सरकारें जनता ( विशेषकर बहुमत ) की भावना के अनुरूप निर्णय लेना पसंद करती हैं I क्योंकि अधिकांश अशिक्षित जनता इन अधिकारों (व्यक्ति की निजता, गरिमापूर्ण जीवन जीने की स्वतंत्रता ) को लेकर सजग नही है I भारत के संदर्भ में लगभग ऐसा ही है I बांग्लादेश में धर्म निरपेक्षता, तर्कवाद जैसे मूल्यों को बढ़ावा देने और इस्लाम की आलोचना करने के कारण तसलीमा नसरीन को जान से मारने की धमकी दी जाने लगी Iअंततः तसलीमा नसरीन ने भारत में शरण ली I सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘द सेटेनिक वर्सेज’ के कारण विवाद होता रहा, उनके खिलाफ फतवा भी जारी किया गया I

असहिष्णुता और प्रतिबन्ध की संस्कृति

अपने विचारों के विपरीत दूसरों की राय/विचारों को खारिज करने की प्रवृत्ति असहिष्णुता कहलाती है I वैश्वीकरण ने संस्कृतियों के अंतर्संलयन के माध्यम से सांस्कृतिक संरक्षणवाद को बढ़ावा दिया जिससे अति राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार हुआ I संस्कृति संरक्षणवाद के नाम पर धार्मिक पुनरुत्थान को प्रोत्साहन मिल रहा है I मध्यकालीन विचारों को जनता पर, नागरिक समाज पर थोपा जाने लगेगा I लोकतंत्र भीड़तंत्र में परिवर्तित हो जायेगा I और बहुमत के आधार पर न्याय की उपेक्षा की जाने लगेगी I

तीसरी दुनिया के अधिकाँश देश इसीलिए तानाशाही, सैन्य शासन के मार्ग पर चले गये क्योंकि उन्होंने नागरिक स्वतंत्रता, वाद-संवाद की संस्कृति का संरक्षण नहीं किया I जिससे संवैधानिक संस्थाए कमज़ोर होती गई और अंतत: लोकतंत्र असफल हो गया I

‘स्वस्थ्य लोकतंत्र की बुनियाद –वाद और संवाद’

लोकतंत्र में सरकार के साथ ही विपक्ष की भी अहम भूमिका होती है I अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार राज्य के विरुद्ध नागरिकों को प्रदान किया गया है I प्रबुद्ध नागरिक लेखक, पत्रकार ,अध्यापक सरकार के कार्यों नीतियों की समालोचना करते रहते हैं I जिससे सरकार को अपनी नीतियों की खामियों के बारें में जानकारी मिलती है और उनमें सुधार करने का अवसर भी I

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ दो नैतिक सीमाएं भी संबद्ध हैं I

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निरपेक्ष नहीं है बल्कि राज्य इस पर युक्तियुक्त प्रतिबन्ध ( आंतरिक सुरक्षा,संप्रभुता, विदेशी संबंध के आधार पर ) भी लगा सकता है I
  • अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ ही हमें दूसरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान भी करना चाहिए I विरोधी विचारों के प्रति सहिष्णुता रखनी चाहिए I दूसरों की गरिमा और निजता के अधिकार का सम्मान भी करना चाहिएI

अभिव्यक्ति का अनुचित प्रयोग राज्य को शक्ति प्रदान करेगा कि वो नागरिकों की अभिव्यक्ति को सीमित करें I उस स्थिति का लाभ उठाकर राज्य (सरकार) विपक्ष और अपने आलोचकों का दमन कर सकती है I जिससे अंतत: देश में लोकतंत्र कमज़ोर हो जाएगा I

उत्कृष्ट समाज के निर्माण में सहिष्णुता की भूमिका

आज आधुनिक कहे जाने वाले यूरोप में मध्यकाल में असहिष्णुता के कारण कई महान दार्शनिकों अरस्तु, कॉपरनिकस और गैलीलियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया या मृत्युदंड दिया गया I

क्योंकि समाज इन दार्शनिकों के तार्किक विचारों को अपनी धार्मिक मान्यता के विरुद्ध मानकर इनका विरोध करता था I खगोल वैज्ञानिक गैलीलियों ने प्रायोगिक परीक्षणों में पाया कि सूर्य स्थिर है जबकि पृथ्वी समेत सभी अन्य गृह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं I जबकि उस समय सर्वमान्य (धार्मिक मान्यता ) विचार था कि ब्रह्माण्ड के केंद्र में पृथ्वी स्थित है तथा सूर्य और चन्द्रमा सहित अन्य गृह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं I चर्च द्वारा गैलीलियों के विचारों का विरोध किया गया, उन्हें प्रताड़ित कर कारावास में डाल दिया गया I

यूरोपीयों ने पुनर्जागरण के बाद अपनी संस्कृति का परिष्कार करते हुए ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म निरपेक्षता, सहिष्णुता जैसे मूल्यों को आत्मसात कर वैज्ञानिक चिन्तन और तर्कवाद को बढ़ावा दिया I आज यूरोप शान्ति,समृद्धि और खुशहाली में अन्य महाद्वीपों से कई अधिक आगे है I

दार्शनिकों के नजरिये से घटना का परीक्षण

अरस्तु का प्रसिद्द कथन है कि किसी विचार को स्वीकार किये बिना भी सहज लेना शिक्षित दिमाग की निशानी है I अर्थात दूसरों के विचारों का सम्मान करने वाला व्यक्ति ही विद्वान है I अरस्तु का यह विचार उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता जैसे मूल्यों के प्रति आस्था का सूचक है I अरस्तु को स्वयं अपने तार्किक विचारों के चर्च का विरोध झेलना पड़ा और अंतत: उन्हें मृत्युदण्ड दिया गया I

घटना के दीर्घकालिक प्रभाव

यदि किसी एक लेखक या विचारक के विचारों को लेकर विरोध प्रदर्शन होता है I तो इसका प्रभाव अन्य लेखकों/चिंतकों विचारकों पर पड़ता है समाज में प्रतिक्रिया वादी शक्तियों का दबदबा बढ़ता है I ऐसी घटनाओं से ऊर्जा प्राप्त कर वो प्रतिबंधों/फतवा की संस्कृति को प्रचारित करने लगते हैं जो अल्पसंख्यकों/कमज़ोर/ शोषित वर्ग के अधिकारों का दमन करता है I साथ ही समाज परम्परागत, पूर्वाग्रह से ग्रस्त मध्यकालीन मानसिकता से युक्त पिछड़ा बना रहता हैI

आगे की राह – आज के वैश्वीकृत दौर में विभिन्न संस्कृतियों के मध्य समन्वय हो रहा है I विभिन्न धर्म जाति प्रजाति भाषा संस्कृति के लोग जितना इस समय घुले मिले हैं उतना इतिहास के किसी कालखंड में कभी नहीं रहा I संचार माध्यमों (टेलीविजन, इंटरनेट, सोशल मीडिया ) के अत्याधुनिकीकरण ने दुनिया को छोटा कर ‘वैश्विक गाँव’ (ग्लोबल विलेज) बना दिया है I ऐसे में समाज के सहअस्तित्व को बनाये रखने के लिए सहयोग में वृद्धि करनी पड़ेगी, जिसके लिए सहिष्णुता, समन्वय, बंधुत्व जैसी भावना को विकसित करना होगा I ऐसी घटनाएँ ‘विधि के शासन’, राज्य के अस्तित्व पर प्रश्नचिंह लगाती हैंI सरकार, विधायिका, न्यायपालिका समेत सभी संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है वो ऐसी हिंसक घटनाओं के विरुद्ध सख्त कदम उठाये I नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए,नागरिकों को अधिकारों के प्रति जागरूक करें I ताकि नागरिक अपने अधिकारों का समुचित प्रयोग करते हुए, दूसरों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील रहे I

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1
  • भारतीय समाज