बहुपक्षवाद की घटती प्रासंगिकता : नवीन शीत युद्ध की आशंका - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


बहुपक्षवाद की घटती प्रासंगिकता : नवीन शीत युद्ध की आशंका - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


संदर्भ

  • हाल ही में हुए विश्व स्वास्थ्य सभा सम्मेलन के दौरान चीन और अमेरिका के बीच हुए टकराव को पिछले 70 वर्षों के बहुपक्षवाद के अंत का प्रतीक माना जा रहा है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए कई विशेषज्ञों ने यूएस और यूएसएसआर के बीच हुए शीत युद्ध के समान एक नए शीत युद्ध की आशंका भी जताई है।
  • विभिन्न आकड़ों और रिपोर्ट के अनुसार, चीन जल्द ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगा। चीन में यह विकास प्रौद्योगिकी, नवोन्मेष और व्यापार पर आधारित होगी,जिससे अमेरिकी श्रेष्ठता को संतुलित करने और दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा देने की मांग भी प्रबलित होगी।

पृष्ठभूमि

  • 2017 में, अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के तहत चीन को एक संशोधनवादी शत्तिफ़ के रूप में बताया गया था, जो अमेरिकी सुरक्षा और समृद्धि को नष्ट करने और अमेरिकी मूल्यों और हितों को प्रभावित करने के लिए विश्व-विरोधी स्वरूप तैयार करने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा भी चीन ने कई मोर्चों पर अमेरिकी आधिपत्य को कम करने में सक्रिय भूमिका निभाई है। चीन और संयुत्तफ़ राज्य अमेरिका के बीच यह नया शीत युद्ध, 21वीं सदी का एक प्रमुख भू-राजनीतिक संकट के रूप में सामने उभर कर आ रहा है।
  • साथ ही वर्तमान परिदृश्य में COVID-19 महामारी ने दोनों देशों के बीच संबंधों को और भी निचले स्तर पर ला कर खड़ा कर दिया है। परिणामस्वरूप चीन और संयुत्तफ़ राज्य अमेरिका अपने परस्पर संबंधों में प्रभावशीलता और गतिशीलता खो रहे हैं।

शीत युद्ध के संकेत

  • कई दशकों तक, डेंग जियाओपिंग (चीन के राजनेता एवं सुधारक थे जो माओजेडाँग की मृत्यु के बाद चीन को बाजारवादी अर्थव्यस्वथा की तरफ ले गये।) और उनके उत्तराधिकारियों के अपेक्षाकृत प्रबुद्ध अधिनायकवाद के तहत चीन का विकास संयुत्तफ़ राज्य अमेरिका द्वारा भी सकारात्मक रूप से देखा जाता था। परंतु, शी जिनपिंग के शासन काल में चीन एक नरम से एक कठोर अधिनायकवाद के रूप में विकसित हुआ है।
  • चीन की एशिया में आक्रामक नीति के फलस्वरूप अमेरिका ने चीन की मुखरता को नियंत्रित करने के लिए, चतुष्कोणीय इंडो-पेसिफिक नामक नई पहल शुरू की। हाल ही में, अमेरिका ने G-7 में चीन को शामिल किए बिना G-11 तक विस्तारित करने का प्रस्ताव दिया। इसी संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति ने संयुक्त राज्य अमेरिका में आयोजित होने वाले अगले G-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत के प्रधान मंत्री को भी निमंत्रण दिया।
  • इसके अलावा दक्षिण चीन सागर में पहले चीन की आक्रामक रणनीति, फिर भूमि अधिग्रहण और फिर अतिरिक्त-क्षेत्रीय दावे का विस्तार करने के लिए कृत्रिम द्वीपों का निर्माण करने पर अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा तीखी आलोचना की गयी। हालाँकि यह बिल्कुल वैसे ही है, जैसे कैरेबियन द्वीप पर प्रभुत्व ने संयुक्त राज्य अमेरिका को रणनीतिक रूप से अटलांटिक महासागर को नियंत्रित करने में सक्षम बनाया और शीत युद्ध में शक्ति के संतुलन को प्रभावित भी किया था।
  • संक्षेप में कहा जाये तो व्यापार युद्ध से लेकर 5-जी दूरसंचार तक और फिर करेंसी वॉर तक, अमेरिका-चीन का टकराव कई आर्थिक मोर्चों पर है और अब तो अमेरिका और विकासशील देशों के बीच दाता-प्राप्तकर्ता संबंध भी कमजोर होते नजर आ रहे हैं। जब से चीन ने COVID-19 महामारी के दौरान 2 बिलियन डॉलर दान देने का संकल्प लिया है, तब से दान कूटनीति (डोनेशन डिप्लोमेसी) का एक नया चरण शुरू हो रहा है।
  • इसके अलावा, चीन अमेरिका ताइवान के समर्थन को अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेक के रूप में भी मानता है।

पिछले शीत युद्ध से विभिन्नता

  • यूएस और सोवियत संघ के बीच हुए पिछले शीत युद्ध और अमेरिका और चीन के बीच हो रहे इस नये शीत युद्ध में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं।
  • अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध, दो विरोधी विचारधाराओं फ्पूंजीवाद बनाम साम्यवादय् के बीच की लड़ाई थी, जबकि अमेरिका और चीन के बीच ऐसा वैचारिक संघर्ष नहीं है।
  • अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हुआ शीत युद्ध परोक्ष रूप से संघर्षों से भरा था जैसे कि क्यूबा मिसाइल संकट 1962, सोवियत अफगान युद्ध 1979-89, आदि। हालांकि, अब तक, अमेरिका और चीन के बीच कोई प्रॉक्सी (परोक्ष रूप से) युद्ध नहीं हुआ है।
  • अमेरिका और सोवियत संघ के विपरीत वर्तमान वैश्वीकृत दुनिया में निवेश और बाजारों के माध्यम से, अमेरिका और चीन ने अर्थव्यवस्थाओं को बारीकी से एकीकृत किया गया है। रूस, भारत और जापान जैसे देश स्विंग राज्यों के रूप में कार्य करते हैं, क्योंकि उनके पास यह विकल्प है कि वे अमेरिका या चीन के साथ गठबंधन करें या न करें।

भारत की भूमिका

  • भारत एक बढ़ती वैश्विक शक्ति है और इसके महत्व को समझते हुए, अमेरिका और चीन दोनों ने भारत को अपने तरफ आकर्षित करने की पूरी कोशिश की है। अमेरिका के विदेश नीति विशेषज्ञों का तर्क है कि शीत युद्ध में भारत का एक प्राकृतिक सहयोगी अमेरिकी है। दूसरी ओर भारत में चीन के राजदूत ने फ्मानव जाति के लिए साझा भविष्यय् लक्ष्य के साथ एक नये प्रकरण को शुरू करने का सुझाव दिया है। ऐसे में भारत निम्नलििखत प्रक्रियाओं से अपनी भूमिका को अंकित कर सकता हैः
  • भारत वसुधैव कुटुम्बकम् के तत्वावधान में नए बहुपक्षवाद को बढ़ावा दे सकता है, जो कि न्यायसंगत सतत विकास के लिए आर्थिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार दोनों के पुनर्गठन पर निर्भर करता है।
  • भारत को वैश्विक शक्तियों के साथ शीघ्र परन्तु गहन कूटनीति करनी चाहिए, ताकि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और वैश्विक हित कायम किया जा सके।
  • इसके अलावा, भारत को यह स्वीकार करना चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), साइबर और अंतरिक्ष में तकनीकी श्रेष्ठता पर निर्भर करती है, न कि महंगे पूंजीगत उपकरणों पर और इस तथ्य को ध्यान में रखकर, भारत को महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना चाहिए ताकि किसी अन्य देश पर निर्भरता ना रहें।

भारत के लिए अवसर

  • विश्व स्वास्थ्य सभा के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में भारत बहुपक्षवाद के संदर्भ में वैश्विक जिम्मेदारी निर्धारित कर सकता है। भारत को अवसर के रूप में बदली हुई परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करना चाहिए।
  • भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (गैर-स्थायी सीट) में शामिल होगा और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करेगा और 2022 में, भारत जी-20 की मेजबानी करेगा। भारत को इस अवसर का उपयोग कर अपने प्राचीन संस्कृति सभ्यता को आधुनिकता से जोड़ते हुए, वैश्विक नेतृत्व कर्ता के विचार को पुनः प्राप्त करने के बारे में सोचना चाहिए।
  • हालाँकि हाल ही में हुए गुटनिरपेक्ष आंदोलन के ऑनलाइन शिखर सम्मेलन में, प्रधान मंत्री मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के लिए नए सिद्धांतों का आ“वान किया। मानवता, निष्पक्षता और समानता पर आधारित उनके नए वैश्वीकरण मॉडल को वैश्विक स्तर पर एक समान और व्यापक समर्थन मिला है क्योंकि 1950 के बाद पहली बार, हर कोई एक ही (वायरस) खतरे का सामना कर रहा है।
  • ध्यातव्य है कि विश्व इस समय एक गंभीर विक्षोभ से गुजर रहा है ऐसी परिस्थिति में वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था, वैज्ञानिक अनुसंधान और समाज सभी को फिर से एक साथ लाकर शुरुआत करने की आवश्यकता है। भारत को इस अवसर का उपयोग अपने वैश्विक संतुलन को पुनः प्राप्त करने के लिए करना चाहिए और यह भारत को मानवता, निष्पक्षता और समानता पर आधारित नए बहुपक्षवाद को आकार देने का अवसर भी प्रदान करेगा।

निष्कर्ष

  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब अमेरिकी संस्थानों द्वारा व्यापार, पूंजी और प्रौद्योगिकी निर्भरता को बढ़ावा दिया गया, तो सामाजिक-आर्थिक विकास की अनदेखी करते हुए नए स्वतंत्र राज्यों से परामर्श नहीं किया गया। परन्तु वर्तमान परिदृश्य में सामाजिक और आर्थिक अधिकार, राजनीतिक और प्रक्रियात्मक अधिकारों के समान महत्वपूर्ण हो चुके है।
  • हालाँकि उस समय औपनिवेशिक एशियाई देशों ने औद्योगिक क्रांति को आकार देने में कोई भूमिका भी नहीं निभाई। परन्तु अब भविष्य की डिजिटल क्रांति को विभिन्न मूल्यों द्वारा आकार दिया जाएगा, जिसमें समानता एक प्रमुख पहलू होगा।

सामान्य अध्ययन पेपर-2

  • द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले समझौते।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • बहुपक्षवाद से क्या समझते हैं? वर्तमान समय में घटते बहुपक्षवाद के कारणों को बताएं।