लिंक्डइन अपॉर्चुनिटी इंडेक्स तथा भारतीय कार्यबल में महिलाओ की स्थिति - समसामयिकी लेख

सन्दर्भ

हाल ही में प्रकाशित हुए लिंक्डइन अपॉर्चुनिटी इंडेक्स ने भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में कार्यस्थल पर होने वाले लैंगिक विभेदन पर अपनी रिपोर्ट दी है।

परिचय

हाल ही में प्रकाशित लिंक्डइन अपॉर्चुनिटी इंडेक्स की प्राप्तियां भारत में कार्यस्थल पर ही रहे लैंगिक भेदभाव को स्पष्ट रूप से दर्शा रही हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में कोरोना काल के दौरान लगभग 85% महिलाऐं पदोन्नति प्राप्त करने में असमर्थ रहीं क्योंकि वर्क फ्रॉम होम के दौरान घरेलू तथा ओर्गनइजेशनल कार्य एक साथ आने से उनकी क्षमता प्रभावित हुई। एशिया प्रशांत क्षेत्र में यह आकड़ा औसतन 60 % है जो भारत के आकड़े से बहुत कम है।

रिपोर्ट के मुख्य विन्दु

  • लिंक्डइन अपॉर्च्युनिटी इंडेक्स 2021 के अनुसार भारत में 10 में से 9 या 89 प्रतिशत महिलाएं कोरोना वायरस महामारी से नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई हैं।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 85 प्रतिशत महिलाएं अपने लैंगिक भेदभाव के कारण वृद्धि, पदोन्नति या अन्य काम के प्रपोजल से चूक गई हैं। यह आंकड़ा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 60 % रहा है।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कई महिलाओं के पास घर से काम करने की फ्लैक्सिबिल‍िटी होने के बावजूद वो समय की कमी और परिवार की देखभाल जैसी बाधाओं का सामना कारण पड़ता है। 50 % महिलाओ ने स्वीकार किया है कि लैंगिक भेदभाव के कारण अवसर की समानता में समस्या उत्पन्न होती है।
  • 71% महिलाओं ने माना है कि कार्य तथा घरेलू जिम्मेदारियों के मध्य सामंजस्य बना पाना कठिन होता है।
  • 63 प्रतिशत महिलाओं को लगता है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए व्यक्ति का जेंडर महत्वपूर्ण है। 54 % पुरुषो ने भी लैंगिकता को प्रोन्नति के लिए अनिवार्य माना है।
  • 22% महिलाओं के अनुसार कंपनियों का वातावरण पुरुषो के अनुकूल है।
  • 66% भारतीय महिलाओ के अनुसार एक पीढ़ी पहले की तुलना में लैंगिक विभेदन अब कम हो गया है।

रिपोर्ट के विन्दुओ से हुई मुख्य प्राप्तियां

  • लिंक्डइन अपॉर्चुनिटी इंडेक्स यह स्पष्ट कर रहा है कि भारत में लैंगिक भेदभाव स्वतंत्रता के 72 वर्ष के उपरान्त भी विद्यमान है। यह निम्न चुनौतियों को को स्पष्ट कर रहा है।
  • भारत में महिलाओ के अवसर की समानता नहीं मिल रही है । यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 , 15 ,16 में महिलाओ को दिए गए अधिकारों का स्पष्ट उलंघन है।
  • भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में समान कार्य के लिए समान वेतन की अवधारणा भी प्रभावित हो रही है।
  • भारत की जनसँख्या में महिलाऐं लगभग 49% प्रतिनिधित्व करती हैं। इस प्रकार की असमानताएं कार्यस्थल पर महिलाओं की क्षमता को प्रभावित करेगी जो अंततः देश की सकल घरेलू उत्पाद तथा आर्थिक वृद्धि को भी प्रभावित करेगी।
  • यह रिपोर्ट देश के संविधान तथा समाज की कुरीतियों के विपथगमन को दर्शाता है तथा यह स्पष्ट कर रहा है कि भारत का समाज अभी भी लोकतान्त्रिक नहीं हो सका है।
  • यद्यपि एक पीढ़ी पहले की तुलना में लैंगिक विभेदन कम हुआ है परन्तु अभी भी बड़े पैमाने पर लैंगिक विभेदन हो रहा है।

भारत के श्रम बल में महिलाओं की स्थिति तथा प्रवृत्ति

  • वर्तमान भारत में महिला कार्यबल भागीदारी दर 23.7 % (ग्रामीण क्षेत्रों में 26.7 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 16.2 प्रतिशत) है।ग्रामीण क्षेत्रों में गिरावट की प्रवृत्ति विशेष रूप से मजबूत है, जहां यह 2004-05 में 49.7 प्रतिशत से घटकर 2015-16 में 26.7 प्रतिशत हो गई है।
  • भारत में औसतन 12 प्रतिशत पुरुषों की तुलना में 66 प्रतिशत महिलाओं का काम अवैतनिक है। जो केयर इकॉनमी का भाग है।
  • महिलाओं की श्रम शक्ति की भागीदारी, वेतन में लैंगिक भेदभाव , सामाजिक सुरक्षा की कमी के साथ अनौपचारिक कार्यों की उच्च दर, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को भारत में लैंगिक समानता और महिलाओं के सशक्तीकरण के लक्ष्य के लिए बाधा के रूप में आज भी उपस्थित हैं ।

भारत में कार्यकारी महिला की सशक्तिकरण के लिए किये गए प्रयास

संवैधानिक प्रावधान

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 तथा 16 में लैंगिक आधार पर विभेदन से सुरक्षा दी गई है। भारतीय संविधान के नीतिनिर्देशक तत्वों में समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था की गई है। भारत का संविधान महिला आरक्षण की भी व्यवस्था करता है।

विधिक प्रावधान

  • सरकार ने मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 के तहत प्रदत्त मातृत्व अवकाश की अवधि 12 सप्ताह के बजाय 26 सप्ताह तक बढ़ा दी है। इसमें अन्य प्रावधान भी हैं जिनसे महिलाओं के लिए काम करना आसान हो सकता है।
  • श्रम मंत्रालय द्वारा कारखाना अधिनियम 1948 के तहत विशेषकर यात्रा के लिए महिलाओं की सुरक्षा के संबंध में पहल किया। इस प्रावधान के अनुसार राज्य देर से काम करने वाली महिलाओं के लिए पिक और ड्रॉप सुविधा प्रदान करेगा जिससे कामकाजी महिलाओं के लिए सक्षम वातावरण बनाने के लिए एक मजबूत बुनियादी ढांचा बनाने सहायता प्राप्त हो सकेगी।
  • समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1948 भी बिना किसी भेद-भाव के पुरुषों एवं महिलाओं पर समान रूप से लागू होता है।
  • कार्य स्थल पर महिला उत्पीडन (रोकथाम, प्रतिषेध एवं निवारण) अधिनियम द्वारा उत्पीडन शिकायत प्राप्त करने के लिए आंतरिक शिकायत समिति प्रत्येक जिले में स्थानीय शिकायत समिति (LCC) की स्थापना, की गई है। इस अधिनियम में कार्यस्थल पर महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कई प्रावधान हैं।

अन्य महत्वपूर्ण पहल

  • सरकार ने लैंगिक समानता और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए कुछ महत्वपूर्ण पहल की हैं। इनमें बेटी बचाओ, बेटी पढाओ अभियान, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, पोषन अभियान और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना शामिल हैं।
  • महिला शक्ति केन्द्र योजना के अंतर्गत सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने का प्रयास किया जाता है।
  • स्थापना प्रत्येक जिले में वन स्टॉप सेंटर की व्यवस्था की गई है।
  • देश में महिला कामगारों के लिए रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों, राष्ट्रीय व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों एवं प्रादेशिक व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों में आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान किया।

क्या किया जाना चाहिए

भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए विभिन्न प्रयास किये गए हैं इन प्रयासों के कारण ही 66% महिलाऐं यह मान रहीं हैं हैं कि एक पीढ़ी पूर्व की तुलना में लैंगिक विभेद कम हुआ है। परन्तु यह भी कटु सत्य है कि भारत को इस दिशा में बहुत अधिक प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

  • पुरुषो की तुलना में महिलाओं की सामाजिक स्थिति भिन्न है। कार्यस्थल पर महिलाऐं भिन्न -भिन्न चरणों (यथा एकल महिलाएं, विवाहित महिलाएं, युवा माताएं और वैधब्य महिलाएं) एक ब्रेक के बाद कार्यबल में फिर से प्रवेश करती हैं। जहाँ कार्य की क्षमता के साथ भावनात्मक अंतर भी होता है। इस स्थिति में लैंगिक रूप से संवेदनशील सोच को स्वीकारने की आवश्यकता है।
  • कानून के साथ साथ समाज को भी लोकतान्त्रिक होना अनिवार्य है। समाज तथा कानून के सिद्धांतो का विपथगमन एक बड़ी समस्या लेकर आता है। इस समयस से निजात के लिए महिला सशक्तिकरण को जनांदोलन के रूप में विकसित करना आवश्यक है।
  • कुछ आधारो पर विधिक समस्या को भी सुधारने की आवश्यकता है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए निर्मित विधान लैंगिक-संवेदनशील प्रावधानों जैसे कि गोपनीयता, न्यूनतम मजदूरी, मातृत्व लाभ, अवकाश और शिकायत निवारण तक एक विधिक ढांचे को सुनिश्चित करने से महिला सशक्तिकरण की दिशा में लाभ मिल सकता है।

निष्कर्ष

  • विश्व विकास रिपोर्ट (विश्व बैंक, 2011) के अनुसार, वैश्वीकरण के युग में, यदि किसी देश की आधी जनसंख्या (अर्थात् महिलाएं) गैर-पारिश्रमिक एवं कम उत्पादक आर्थिक गतिविधियों में संलग्न रहें तो वह देश अपनी पूर्ण संभावनाओं की प्राप्ति नहीं कर सकता है।
  • महिलाओ की स्थिति सुधरने से आर्थिक , सामाजिक लाभ के साथ परिवार नामक संस्था की स्थिति भी मजबूत होती है। यद्यपि भारत ने स्वतंत्रता उपरान्त महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रयत्न किया है परन्तु पितृसत्ता , यौन उत्पीड़न , लैंगिक भेदभाव ने महिला सशक्तिकरण के मार्ग को बड़ी बाधा भी पहुंचाई है।
  • आवश्यक है कि समाज , कानून ,सरकार , न्यायालय सहित सभी हितधारक इस दिशा में जन आंदोलन स्थापित कर देश तथा समाज को प्रगतिशील बनाने में सहयोग करें।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 तथा 2
  • भारतीय समाज तथा सामाजिक न्याय
  • महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन
  • केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन;
  • इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • वैश्वीकरण के युग में, यदि किसी देश की आधी जनसंख्या (अर्थात् महिलाएं) गैर-पारिश्रमिक एवं कम उत्पादक आर्थिक गतिविधियों में संलग्न रहें तो वह देश अपनी पूर्ण संभावनाओं की प्राप्ति नहीं कर सकता है। हाल ही में प्रकाशित हुई लिंक्डइन अपॉर्चुनिटी इंडेक्स तथा भारत में कार्यकारी महिलाओ की स्थिति के आलोक में कथन का विश्लेषण करें ?