क्या संघवाद को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

सन्दर्भ:-

  • हाल ही में केंद्र तथा राज्यों के मध्य राजस्व बटवारे को लेकर विवाद हो गया है। जो भारतीय संघवाद को प्रभावित कर रहा है।

परिचय :-

  • संघवाद का अर्थ सत्ता की साझेदारी से है। किसी देश में यदि दो या दो से अधिक स्तर की सरकार हो तो वहां संघवादी प्रवृत्ति होती है। भारत में केंद्र स्तर , राज्य स्तर तथा पंचायत स्तर की त्रिस्तरीय सरकार है अतः यहाँ संघवाद प्रभावी है। भारतीय संघवाद में केंद्र राज्यों की अपेक्षा मजबूत स्थिति में है परन्तु सत्ता के दो शीर्ष अर्थात केंद्र तथा राज्य में लगातार अधिकारों को लेकर संघर्ष होता रहता है। अभी हाल ही में कोरोना महामारी के फलस्वरूप जीएसटी कलेक्शन में इन दोनों के मध्य संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

केंद्र राज्य सम्बन्धो को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता क्यों(मजबूत केंद्र से उत्पन्न समस्याएं ) :-

  • भारत में बहुदलीय व्यवस्था होने के कारण कई बार राजनैतिक महत्वकांछा के फलस्वरूप केंद्र द्वारा संविधान के अनुच्छेद-356 का दुरुपयोग कर राज्य विधानसभाओ को भांग किया जाता है। अंतरराज्यीय परिषद् की लगातार बैठकों में विभिन्न वर्गों से अनुच्छेद- 356 के प्रयोग को ऐसे मामलों तक सीमित करने की मांग उठती रही है, जहां देश की राष्ट्रीय एकता या धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को गंभीर खतरा पैदा हो गया हो।
  • केंद्र द्वारा राज्यों के लिए नियुक्त राज्यपाल का प्रावधान अराजकतापूर्ण रहा है, जो संघीय लोकतांत्रिक राजव्यवस्था के अनुरूप नहीं है।राजयपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है परन्तु वह केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होता है ।
  • यदि केंद्र तथा राज्य में भिन्न भिन्न दलों की सरकार है तो राज्यपाल की भूमिका कई बार संदेह के घेरे में रही है यथा मध्यप्रदेश , कर्णाटक , पश्चिमबंगाल जके हालिया मुद्दे। इस सन्दर्भ में राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपाल की मंजूरी की समय सीमा भी निश्चित होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त राज्यपाल पर राज्य सरकार से खुले तौर पर असहमति एवं मतभेद व्यक्त करने को रोकने हेतु मापदंड होना चाहिए।
  • कई बार केंद्र द्वारा राज्यों में बहुमत का अपमान किया जाता है।
  • संविधान के समय के उपरांत निरंतर केंद्र सूची तथा समवर्ती सूची के विषय बढ़ रहे हैं तथा राज्य सूची के विषय का हो रहे हैं।इसकी त्वरित समीक्षा करने की आवश्यकता है कि राज्य सूची से विधायी मामलों की संघ/समवर्ती सूची को स्थानांतरित करने के क्या प्रभाव होंगे। न केवल शिक्षा जैसे विषय को राज्य सूची से समवर्ती सूची में डालने से, अपितु तथाकथित केंद्र प्रायोजित योजनाओं में तीव्र वृद्धि द्वारा भी केंद्र सरकार ने राज्य सूची में घुसपैठ की है।
  • आयकर , निगम कर जैसे महत्वपूर्ण कर केंद्र के पास हैं तथा करो के वितरण हेतु बनने वाला वित्त आयोग भी केंद्र सरकार द्वारा बनाया जाता है ऐसे में यह मुद्दा भी विवाद का कारण बनता है।
  • कुछ समय पहले नागरिकता संसोधन के मुद्दे पर केंद्र तथा कुछ राज्य यथा केरल , पंजाब ने केंद्र के विरुद्ध अपनी विधानसभाओ से प्रस्ताव पारित किये। इसके साथ ही हालिया जीएसटी मामले में केंद्र-राज्यों को जीएसटी क्षतिपूर्ति नहीं दे रही है जो विवाद का कारण बना है।
  • इन समस्याओं के साथ साथ कोरोना वायरस के प्रसार में राज्य केंद्रित रणनीति ने भारत में राज्यों की स्थिति को मजबूत किया है ऐसे में संघवाद को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता पड़ती है

मजबूत केंद्र की आवश्यकता क्यों

  • भारत में अभी भी क्षेत्रवाद के तत्व मौजूद हैं उदाहरण 2017 में गोरखालैंड की मांग , तेलंगाना-आंध्रप्रदेश विवाद, मध्यप्रदेश द्वारा स्थनीय छात्रों को सरकारी नौकरी का अवसर इत्यादि। इन क्षेत्रवादी प्रवृत्तीय परस्पर बंधुत्व तथा देश की एकता व अखंडता हेतु अवरोधक हैं। अतः ऐसे में केंद्र की मजबूती आवश्यक है।
  • भारत में साम्प्रदायिकता , भाषा आधारित समस्या , धार्मिक उन्माद जैसी समस्याएं हैं। क्षेत्रीय दल वोटबैंक के कारण तुष्टिकरण की राजनीति करते हैं जो कई बार राष्ट्र को बड़ी विपदा प्रदान कर देती है। इन विपदाओं को रोकने हेतु मजबूत केंद्र की आवश्यकता है।
  • भारतीय संविधान में वर्णित सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक अधिकार की पूर्ती तथा व्यक्तिआधारित व्यवस्था हेतु विभिन्न विधियों का सम्पूर्ण राष्ट्र में सामान रूप से लागू होना आवश्यक है। अतः केंद्र की मजबूती आवश्यक है।
  • निरंतर बदलती भूराजनैतिक गतिविधियां तथा विदेशी मामलो पर नियंत्रण हेतु मजबूत केंद्र की आवश्यकता है

निष्कर्ष :-

  • निरंतर राज्यों के बढ़ते दायित्व ( कोरोना वायरस में , जीएसटी परिषद की बैठक में जीएसटी क्षतिपूर्ति के स्थान पर आरबीआई से ऋण लेकर अपनी आवश्यकता पूर्ती ) हेतु राज्यों को और अधिक वित्तीय स्वायत्ता देनी आवश्यक है।संविधान में केंद्र , राज्य की परस्पर शक्तियों के आधार पर महत्वपूर्ण विषयों तथा उनके संसोधन हेतु बिभिन्न प्रक्रियाओं का वर्णन है अतः संबैधानिक प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता के स्थान पर केंद्र तथा राज्य दोनों को व्यावहारिक परिवर्तन की आवश्यकता है जिससे नागरिक केंद्रित शासन का लक्ष्य पूर्ण हो सके।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2
  • राजव्यवस्था

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • भारत में निरंतर केंद्र तथा राज्यों के मध्य वैचारिक संघर्ष देखने को मिल रहा है। क्या आपके अनुसार भारतीय संघवाद को पुनर्परिभाषित करना अब आवश्यक हो गया है ? चर्चा करें ?