“प्रत्यर्पण तथा आश्रय” पर अंतर्राष्ट्रीय विधि - समसामयिकी लेख

सन्दर्भ

ब्रिटेन के सर्वोच्च न्यायालय ने विजय माल्या के भारत प्रत्यर्पण को स्वीकृति दे दी है परन्तु अभी तक प्रत्यर्पण हो नहीं पाया है।

परिचय

  • किंगफ़िशर के मालिक विजय माल्या पर 17 भारतीय बैंकों का 9,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया है। इस राशि को चुकाने के स्थान पर वह 2 मार्च, 2016 को भारत छोड़कर ब्रिटेन भाग गया। चुकी इस फ्राड से सम्बंधित राशि भारतीय जनता से सम्बंधित है अतः भारतीय एजेंसियों ने ब्रिटेन से प्रत्यर्पण की मांग के सम्बन्ध में वहां के न्यायालय में प्रत्यर्पण की अपील की ।
  • एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद ब्रिटेन के न्यायालय ने माल्या के भारत प्रत्यर्पण की अपील को मान लिया है। भारत की एजेंसियां स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया के नेतृत्व में ब्रिटेन में माल्या के कानूनी प्रक्रिया में वादी की भूमिका में थीं। अभी तक विजय माल्या को ब्रिटेन ने भारत को नहीं सौंपा है।

क्या होता है प्रत्यर्पण :-

  • प्रत्यर्पण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत किसी सन्धि या उभयपक्षी व्यवहार के अन्तर्गत एक राज्य, दूसरे राज्य (राष्ट्र ) के अनरोध करने पर एक ऐसे व्यक्ति को दूसरे राज्य (राष्ट्र) को सौंपता है जिसने अनुरोध करने वाले 'राज्य के राज्यक्षेत्र के अन्तर्गत या तो कोई अपराध किया है या किसी अपराध के लिए उस राष्ट्र की विधिक प्रक्रिया के अनुसार दण्डित किया गया है तथा तथाकथित राष्ट्र उस अपराधी के अभियोजन के लिए सक्षम है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय विधि में प्रत्यर्पण मख्यतः द्विपक्षीय सन्धियों पर आधारित है। इस पर सार्वभौमिक नियम नहीं बन सका है। प्राचीन काल से ही राज्यों (राष्ट्रों ) ने सदैव विदेशियों को शरण देना अपना अधिकार समझा है। अतः प्रत्यर्पण दो राज्यों (राष्ट्रों ) के परस्पर सम्बन्ध से संचालित होता है। अतः अन्तर्राष्ट्रीय विधि का प्रथाओं सम्बन्धी कोई सार्वभौमिक (Universal) नियम नहीं है, जिसके द्वारा राज्यों पर प्रत्यर्पण का उत्तरदायित्व हो।

प्रत्यर्पण हेतु आवश्यक शर्त

  • राजनैतिक अपराधियों , सैनिक अपराध ,धार्मिक अपराध पर प्रत्यर्पण नहीं होना चाहिए। परन्तु राजनैतिक अपराध की परिभाषा में विभिन्न राज्यों में परस्पर मतभेद है।
  • प्रत्यर्पण में "विशेषता का नियम " लागू होता है इस नियम के अनुसार अपराधी का प्रत्यर्पण किसी अपराध विशेष के लिए होता है अतः वह देश अपराधी के विरुद्ध वही मुकदमा चला सकता है जिसके लिए उसका प्रत्यर्पण किया गया हो।
  • प्रत्यर्पण में "दोहरी अपराधिकता का नियम" भी लागू होता है इस नियम के अनुसार जिस अपराध के लिए प्रत्यर्पण होता है वह अपराध दोनों सम्बन्धित देशों (प्रत्यर्पण करने वाला तथा प्रत्यर्पण माँगने वाला) में अपराध घोषित होना चाहिए।
  • प्रत्यर्पण संधि में लिखित सभी शर्तों तथा नियमों का पालन अपराधी के प्रत्यर्पण के पहले तक बहुधा किया जाता है। तथा प्रत्यर्पण के लिए औपचारिक प्रार्थना आवश्यक है।
  • जब किसी व्यक्ति के ऊपर दोषारोपण होता है कि उसने किसी विदेशी देश में अपराध किया है तथा सम्बन्धित विदेशी देश उसके प्रत्यर्पण की मांग करता है तो यह आवश्यक नहीं कि अपराध के समय अभियुक्त उस विदेशी देश में उपस्थित हो।

भारत में प्रत्यर्पण

प्रत्यर्पण अधिनियम 1962 की धारा 2 (डी) भगोड़े अपराधियों के प्रत्यर्पण से संबंधित विदेशी राज्य के साथ भारत द्वारा की गई संधि, समझौते या व्यवस्था के रूप में प्रत्यर्पण संधि को परिभाषित करती है और इसमें किसी भी संधि, समझौते या व्यवस्था से संबंधित कोई संधि, समझौता या व्यवस्था शामिल है।

भारत के प्रत्यर्पण सम्बन्धी प्रसिद्द मामले

सावरकर केस -1911

  • बी.ड़ी. सावरकर एक भारतीय क्रान्तिकारी थे जिन्हें एक जलयान द्वारा भारत लाया जा रहा था उनके विरुद्ध देशद्रोह तथा अपराध को प्रोत्साहन देने के सम्बन्ध में मुकदमा ब्रिटिश भारत की न्यायालय में चलाया जाना था । सावरकर जहाज से भाग निकले परन्तु वह फ्रांस की पुलिस द्वारा पकड़े गये। फ्रांस के जलयान के कप्तान ने उन्हें ब्रिटिश जलयान के कप्तान को सुपुर्द कर दिया। इसके उपरान्त फ्रांस सरकार ने ब्रिटिश सरकार से कहा कि सावरकर को लौटा दें
  • क्योंकि इस मामले में प्रत्यर्पण-सम्बन्धी नियमों का ठीक से पालन नहीं हआ। तथा यह मामला हेग न्यायालय गया जहाँ ब्रिटेन के पक्ष में फैसला सुनाया गया। तात्कालिक विधि शास्त्रियों ने इसकी आलोचना की।

धर्म तेजा केस 1972-

  • धर्म तेजा एक शिपिंग कंपनी के डायरेक्टर थे जिसने करोङो रूपये का गबन कर आईबरी कोस्ट में शरण ली थी। भारत तथा आईबारी कोस्ट की प्रत्यर्पण संधि न होने के कारण आइवरी कोस्ट ने धर्म तेजा को वापस करने से इंकार कर दिया।
  • बाद में धर्म तेजा लन्दन गया तथा वहां से 1972 में भारत लाया गया जहाँ उसे सजा सुनाई गई।

भारत -ब्रिटेन प्रत्यर्पण संधि

  • भारत तथा ब्रिटेन के मध्य 1993 में प्रत्यर्पण संधि हुई है।
  • भारत के लगभग 131 वांछनीय लोगों की सूची ब्रिटेन के पास है।
  • ब्रिटेन ने 1993 से अब तक एक भी अपराधी को भारत नहीं भेजा है।

आश्रय की परिभाषा

  • आश्रय से अर्थ है -शरण या सक्रिय सुरक्षा। यह आश्रय राजनैतिक शरणार्थियों को दिया जाता है। अंतराष्ट्रीय व्यवस्था में सभी राज्य राजनैतिक शरणार्थी को आश्रय देने तथा उसके प्रत्यर्पण न करने पर सहमत हैं परन्तु राजनैतिक अपराध की परिभाषाओ में व्यापक भिन्नता है।
  • मानवीय अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 14 के अनुसार प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को दूसरे देश में आश्रय मांगने का अधिकार है।

आश्रय के प्रकार :-

सामान्यतया आश्रय दो प्रकार के होते हैं।

  1. प्रादेशिक आश्रय - प्रादेशिक आश्रय में शरणार्थी ,शरण देने वाले राज्य की भौगोलिक सीमा में होता है यथा भारत द्वारा दलाईलामा को दिया गया आश्रय
  2. बाह्य प्रादेशिक आश्रय - बाह्य प्रादेशिक आश्रय में शरणार्थी ,शरण देने वाले राज्य की राजनैतिक सीमा यथा विदेशी दूतवास , व्यापारिक जहाज ,अंतर्राष्ट्रीय संस्था में होता है।

आश्रय प्राप्त करने के अधिकार

  • मानवीय अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 14 में प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को दूसरे देशों में आश्रय माँगने का अधिकार है (परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि जब कोई व्यक्ति आश्रय माँगे तो उसे आश्रय मिले ही)
  • प्रादेशिक या क्षेत्रीय आश्रय पर एक संयुक्त राष्ट्र घोषणा, 1967 को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। इसके अनुसार राज्यों को ऐसे उत्पीड़ित व्यक्तियों को जो सीमा पर आश्रय की माँग करते हैं उन्हें आश्रय अस्वीकार करने आदि कार्यवाहियों से प्रतिविरत रहना चाहिए। परन्तु इस घोषणा को बाध्यकारी नहीं कहा जा सकता।
  • परन्तु संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 14 दिसम्बर, 1967 को प्रस्ताव में कहा कि आश्रय के सन्दर्भ में राज्यों को निम्न विन्दुओ का ध्यान रखना चाहिए -
  • कोई व्यक्ति जब आश्रय माँगे तो उसे अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए या जब कोई व्यक्ति आश्रय माँगने वाले राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाय तो उसे निकाला नहीं जाना चाहिए ( परन्तु राष्ट्रीय सुरक्षा एवं जनता की सुरक्षा के आधार पर उसे निकाला जा सकता है)
  • यदि कोई राज्य आश्रय देने में असहज है तो व्यक्तिगत राज्य या संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से अन्तर्राष्ट्रीय एकता के भाव से उचित उपाय पर विचार करना चाहिए।
  • यदि कोई राज्य किसी पीड़ित को आश्रय देता है तो अन्य राज्यों को उसका सम्मान करना चाहिए।

निष्कर्ष

  • राजनैतिक अपराधी को शरण देना किसी राज्य का सम्प्रभू अधिकार है तथा यह विभिन्न संधियों तथा व्यवहारो के माध्यम से लागू होता है। अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धो के अनुरूप राजनैतिक शरणार्थी को शरण देना आवश्यक है परन्तु आर्थिक भगोड़ो के सम्बन्ध में एक सार्वभौमिक प्रत्यर्पण संधि को स्वीकारा जाना आवश्यक है जिससे आर्थिक सम्प्रभुता सुनिश्चित हो सके।
  • ब्रिटेन की न्यायालय ने विजय माल्या को भारत भेजने सम्बन्धी निर्णय लेकर एक सकारात्मक शुरुआत की है अब आवश्यक है कि जल्द ही इस निर्णय को लागू कर अन्य आर्थिक सम्प्रभुता के रक्षण के लिए देशो के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया जाए।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2
  • अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध
  • द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • प्रत्यर्पण तथा आश्रय से आप क्या समझते हैं ? इनसे सम्बंधित प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय विधियों पर चर्चा करें?