भारत को एक नए ग्रामीण-केन्द्रित विकास मॉडल की आवश्यकता - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


भारत को एक नए ग्रामीण-केन्द्रित विकास मॉडल की आवश्यकता - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


परिचय

  • कोविड-19 महामारी ने प्रवासी मजदूरों के दुःख, दर्द और दुर्भाग्य को खुलकर उजागर किया है। कोरोनोवायरस महामारी ने उनकी संख्या पर प्रामाणिक आंकड़ों की कमी के साथ-साथ उनके रहने और काम करने की स्थिति और उनकी आजीविका की संभावनाओं में स्थायी अनिश्चितता को भी केंद्र पर ला दिया है।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के भरसक प्रयासों के बावजूद भी लगभग 10 मिलियन से अधिक प्रवासी मज़दूरों ने कठिन हालातों में गावों की ओर प्रवास किया। मजदूरो का यह प्रवासन आर्थिक विकास और शहरीकरण को एक नए प्रतिमान में स्थानांतरित करने की तत्काल आवश्यकता पर ज़ोर देता है। ताकि आर्थिक संकट या सुविधाओं की कमी के कारण होने वाले प्रवासन कम किया जा सके।
  • कोविड-19 को भारत की विकास प्रक्रिया को पुन: प्रयोजित करने और उसके रूपांतांतरण के लिए एक अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए। सौभाग्य से हमारे पास महात्मा गांधी, दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और सामाजिक कार्यकर्ता नानाजी देशमुख जैसे महापुरुषों के सुझाए ग्रामीण विकास के वैकल्पिक मॉडल उपलब्ध है। कोविड-19 ने निश्चित रूप से इन मॉडलों की प्रासंगिकता को बढ़ा दिया है।

भारत को ग्रामीण-केंद्रित विकास मॉडल की आवश्यकता क्यों है?

  • यद्यपि भारत का तेजी से शहरीकरण हो रहा है, लेकिन अभी भी लगभग 66% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इसलिए, इस बहुमत आबादी के लिए बुनियादी जरूरतें और आजीविका के अवसर प्रदान करना बहुत ज़रूरी है। भारत के लिए ग्रामीण केन्द्रित विकास मॉडल की आवश्यकता को निम्नलिखित प्रमुख बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है-
  • गरीबी कम करने के लिए: सुरेश तेंदुलकर समिति के अनुसार लगभग 22% आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आय बढ़ाकर गरीबी को कम करने का लक्ष्य होना चाहिए।
  • रोजगार के अवसरों में वृद्धि: शहरी प्रवासी श्रमिकों के एक सर्वेक्षण में भाग लेने वालों मे से 84% ने बताया कि उनके गांवों में आजीविका का प्राथमिक स्रोत मजदूरी था। केवल 11% लोगो का ही प्राथमिक स्रोत कृषि उनकी आय थी। यह इंगित करता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की कितनी आवश्यकता है, जो सिर्फ कृषि को बढ़ावा देने से पूरी नहीं हो सकती है।
  • प्रवासन में कमी के लिए: भारत में चीन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी प्रवासी कामगार आबादी है। प्रवासी श्रमिकों की कुल संख्या का वर्तमान अनुमान 72 मिलियन से 110 मिलियन तक है। आत्मनिर्भर गाँव अकाल, बाढ़, सूखा, जल-संकट और भुखमरी जैसे प्रवास उत्प्रेरक कारकों को कम करेंगे।
  • ग्रामीण-शहरी विषमता में कमी: लगभग 66% अधिक भारतीय आबादी गांवों में रहती है बावजूद इसके विकास के लिए शहरी क्षेत्रों ही अधिकांश निवेश किया जाता है।
  • कमजोर वर्गों का कल्याण: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों जैसे कमजोर वर्गों की अधिकांश आबादी गांवों में रहती है। आत्मनिर्भर गाँव उनके सामाजिक-आर्थिक संकेतकों जैसे मातृ मृत्यु दर, साक्षरता दर, आदि को बेहतर बनाने में मदद करेंगे।
  • कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए: खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों, कुटीर-आधारित उद्योगों और वन- आधारित उद्योगों के स्थापना और संवर्धन से कृषि में प्रच्छन्न बेरोजगारी को कम किया जा सकता है। अधिशेष को कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए कृषि आदानों के लिए निवेश किया जा सकता है।
  • जलवायु परिवर्तन का शमन और अनुकूलन: जलवायु परिवर्तन कृषि उत्पादकता में गिरावट, जल- संकट, मरुस्थलीकरण, तटीय भूमि का डूबना, लगातार बाढ़ और सूखा, आदि के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में तबाही मचाने की क्षमता रखता है। आत्मनिर्भर गांव किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल बनाने में सक्षम कर सकते हैं।

आत्मनिर्भर ग्रामीण मॉडल

  • गांधीजी का ग्राम स्वराज मॉडल: ग्राम स्वराज, या ग्राम स्व-शासन, गांधी जी के विचारों में एक महत्वपूर्ण अवधारणा थी। यह भारत में आर्थिक विकास के उनके दृष्टिकोण का केंद्र बिंदु था। गांधीजी का ग्राम स्वराज एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था वाले गाँवों की नई स्वतंत्र इकाइयों का गठन था, न कि गावों का पुरातन तरीके से पुनर्निर्माण। बुनियादी जरूरतों में आत्मनिर्भरता गांधीवादी गाँव के पुनर्निर्माण की मूलभूत विशेषताओं में से एक थी। गांधी जी अनुसार गाँव में ही भोजन, कपड़े, शिक्षा और अन्य बुनियादी आवश्यकताओं का उत्पादन किया जाना चाहिए, जिससे लगभग हर सक्षम व्यक्ति को पूर्ण रोजगार मिलेगा। इससे रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में ग्रामीण-शहरी प्रवास को भी रोका जा सकेगा।
  • ए.पी.जे अब्दुल कलाम का Provision of Urban Amenities to Rural Areas (PURA) मॉडल: सन 2003 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर कलाम जी ने राष्‍ट्र को संबोधित करते हुए ग्रामीण इलाकों को विकसित करने लिए ‘पूरा (PURA) मॉडल’ का कॉन्‍सेप्‍ट दिया था। कलाम जी का विजन था कि ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों जैसे बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। जिसके द्वारा न केवल ग्रामीण इलाकों की आबादी के जीवन स्‍तर में सुधार आये, बल्कि शहरों की तरफ लगातार बढ़ते पलायन पर भी नियंत्रण पाया जा सके। उनकी विचार था कि ग्रामीण भारत को एक क्लस्टर विकास प्रणाली के माध्यम से विकसित किया जाना चाहिए। जहां 50-100 गांव को सामान्य दक्षताओं और पारस्परिक बाजारों के साथ क्षैतिज या लंबवत रूप से PURA परिसरों के रूप में एकीकृत किया जा सके। इन गांवों मे 4 प्रकार की ग्रामीण-शहरी कनेक्टिविटी- फिजिकल, इलेक्ट्रॉनिक, नॉलेज तथा इकोनॉमिक कनेक्टिविटी से जोड़ा जाना चाहिए। पुरा परिसर के अंदर सभी को आय और गुणवत्तापूर्ण जीवन के अवसरों को प्रदान करने का लक्ष्य होना चाहिए। जहां ग्रामीण-ग्रामीण प्रवास तो स्वीकार्य हो लेकिन ग्रामीण से शहरी प्रवास कम से कम हो। उन्होंने सार्वजनिक-निजी भागीदारी के जरिए प्रति यूनिट 130 करोड़ रुपये की लागत से 7,000 PURA परिसरों की कल्पना भी की थी।
  • नानाजी देशमुख का सामाजिक कल्याण मॉडल: नानाजी देशमुख का आत्मनिर्भर गाँवों का मॉडल एकात्म मानववाद के मॉडल पर आधारित था जहाँ सद्भाव भी एक महत्वपूर्ण कारक होता है। इन्होने सामूहिक भलाई को बढ़ावा देने वाली सामूहिक-सामाजिक चेतना को अगली पीढ़ी के ग्रामीण विकास के लिए एक आधारशिला माना। उन्होंने एक योजना की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य था ‘हर हाथ को काम और हर खेत में पानी’। चित्रकूट परियोजना के अंतर्गत उन्होंने उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के पांच सौ से अधिक गांवों का पुनर्निर्माण कर एक अमिट छाप छोड़ी और इन्हें आत्मनिर्भर बनाया। चित्रकूट में उनके मॉडल कि सफलता केवल शून्य बेरोजगारी या गरीबी कम करने तक ही नहीं रही बल्कि उन गांवों में शून्य आंतरिक कानूनी विवाद और विधवाओं को पुनर्विवाह की आजादी भी मिली।
  • श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन (SPMRM): ग्रामीण क्षेत्रों में एकीकृत परियोजना आधारित बुनियादी ढाँचा देने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) द्वारा 2016 में SPMRM का शुभारंभ किया गया था, जिसमें आर्थिक गतिविधियों के विकास के साथ-साथ कौशल विकास भी शामिल किया गया है। यह मॉडल गांवों में सामाजिक, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक बुनियादी ढांचे को तैयार करने के लिए क्लस्टर विकास डिजाइन का अनुसरण करता है। एसपीएमआरएम के प्रयोजनों के लिए, रूर्बन क्षेत्र में 15-20 गांवों का एक समूह होगा। ये क्लस्टर भौगोलिक रूप से सन्निहित ग्राम पंचायत होंगे, मैदानी और तटीय क्षेत्रों में जिनकी आबादी लगभग 25000 से 50000 और रेगिस्तान, पहाड़ी या जनजातीय क्षेत्रों में आबादी 5000 से 15000 होगी।

गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के उपाय

  • प्रौद्योगिकी का उपयोग: स्थायी कृषि की सुविधा के लिए इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का लाभ उठाया जा सकता है। इसके अलावा खेती के तरीकों से एकत्र किए गए बड़े पैमाने पर और वास्तविक समय के आंकड़े का वैश्विक मूल्य और उत्पादन श्रंखला से मिलाकर किसानों को अधिक लाभदायक विकल्प प्रदान करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।
  • उद्योगों को प्रोत्साहन: रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए खाद्य-प्रसंस्करण उद्योग, कुटीर- आधारित उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी: सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच सक्रिय सहयोग से ग्रामीण ज्ञान मंच बनाया जा सकता है। निजी क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश और प्रौद्योगिकी को लाने में सहायक हो सकता है।
  • आत्मनिर्भर ग्राम बॉन्ड: विकास मॉडल के इस महत्वाकांक्षी रि-इंजीनियरिंग के वित्त-पोषण के लिए, आत्मानिर्भर ग्राम बॉन्डों से संसाधन जुटाने जा सकते हैं। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा अनिवार्य प्राथमिकता वाले क्षेत्र को उधार देने के लिए भी इन बॉन्डों प्रयोग किया जा सकता है।
  • ग्राम पंचायतों को सुदृढ़ बनाना: विधानसभाओं द्वारा ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने लिए उन्हे धन, कार्य करने की शक्ति और अधिकारियों से आत्मनिर्भर बनाना चाहिए। बॉटम-अप विकास प्रक्रिया से भारत की विकास प्रक्रिया में समावेशिता और विविधता लायी जा सकती है।
  • मानव क्षमता विकास: लौटने वाले प्रवासी मजदूरों के कौशल मानचित्रण से वैश्विक मानकों के अनुसार उनकी क्षमता को विकसित करने में मदद मिलेगी।

निष्कर्ष

  • गांवों को आत्मनिर्भर बनाने कि राह में अनेक चुनौतियां हैं जैसे धन की कमी, अप्रभावी बहु-स्तरीय योजना, निजी क्षेत्र में विश्वास की कमी, कमजोर वित्तीय क्षेत्र, पंचायतों की खराब स्थिति, आदि। लेकिन, इन चुनौतियों अजेय नहीं हैं इन्हे पार किया जा सकता है।
  • भारत को सही मायने में आत्मनिर्भर बनाने में गांवों का आत्मनिर्भर बनना अहम भूमिका रखता है।
  • इसलिए, राज्य सरकारों को ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर बढ़ाने और सामाजिक पूंजी विकसित करने के लिए स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार इन मॉडलों को शामिल करना चाहिए।