वनाग्नि : कारण, प्रभाव तथा निवारण - समसामयिकी लेख

चर्चा में क्यों?

2021 के आरम्भ से हिमाचल प्रदेश, नगालैंड-मणिपुर सीमा, ओडिशा, मध्य प्रदेश और गुजरात में वन्यजीव अभयारण्यों में वनाग्नि की श्रृंखलाएं देखी गईं।

परिचय

  • वनाग्नि दो महत्त्वपूर्ण शब्दों के युग्म से बना है। वन और अग्नि यह दोनों ही शब्द अपने आप में पूरा वाक्य है। इन दोनों तत्वों का मानव जीवन के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
  • जब दोनों में एक तत्व दूसरे तत्व के विनाश का कारण बनता है या उसे कारण बनाया जाता है, उस स्थिति में प्रकृति तथा आश्रित जीव जंतुओं का निर्वाह दुष्कर हो जाता है। जंगलों की आग इससे जुड़े समस्त जीवों के जीवन को बुरे ढंग से प्रभावित करती है।
  • उत्तराखंड में पिछले छह महीनों में फारेस्ट फायर की 1,000 से अधिक घटनाएं हुई हैं। 2021 की शुरुआत के बाद से, हिमाचल प्रदेश, नगालैंड-मणिपुर सीमा, ओडिशा, मध्य प्रदेश और गुजरात में वन्यजीव अभयारण्यों में वनाग्नि के मामले बड़ी संख्या में हुए हैं।
  • अप्रैल-मई वह मौसम होता है जब देश के विभिन्न हिस्सों में जंगल की आग लगती है। लेकिन उत्तराखंड में वनाग्नि सामान्य से अधिक रही है तथा यह सर्दियों के दौरान भी हुई है; स्थानीय स्तर पर कमजोर मानसून के कारण सूखी मिट्टी को एक कारण के रूप में देखा जा रहा है।

वनाग्नि की घटनाएं

  • जनवरी में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश (कुल्लू घाटी) और नागालैंड-मणिपुर सीमा (दजुकौ घाटी) लम्बे समय से वनाग्नि से प्रभावित रही है। ।
  • ओडिशा के सिमलीपाल नेशनल पार्क में फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत के बीच एक बड़ी आग लग गई।
  • मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ फॉरेस्ट रिज़र्व और गुजरात में एशियाई शेर और ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के लिए अभयारण्य वनाग्नि की घटनाएं शामिल हैं।

वनाग्नि के प्रति भारतीय वनो की सुभेद्यता

  • फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI), देहरादून द्वारा जारी इंडिया स्टेट ऑफ़ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2019 (ISFR) के अनुसार, 2019 तक, देश के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 21.67% (7,12,249 वर्ग किमी) भाग वन क्षेत्र के अंतर्गत था।
  • एफएसआई ने कहा है कि पूर्व की आग की घटनाओं और दर्ज की गई घटनाओं के आधार पर, पूर्वोत्तर और मध्य भारत के जंगलों में जंगल की आग सबसे कमजोर क्षेत्र है।
  • असम, मिजोरम और त्रिपुरा के जंगलों की पहचान वनाग्नि के अत्यंत उच्च प्रवण ’श्रेणी के रूप में की गई है। अत्यंत उच्च प्रवण ’श्रेणी के अंतर्गत बड़े वन क्षेत्रों वाले राज्यों में आंध्र प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश शामिल हैं।
  • MoEFCC के अनुसार महाराष्ट्र, दक्षिणी छत्तीसगढ़ और तेलंगाना और आंध्र प्रदेश , मध्य ओडिशा के क्षेत्र अत्यंत प्रवण ’वन फायर हॉटस्पॉट में बदल रहे हैं।
  • 'अत्यधिक प्रवण’ और 'मध्यम प्रवण’ श्रेणियों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र कुल वन आवरण का लगभग 26.2% - 1,72,374 वर्ग किमी है।

वनाग्नि के कारण

  • वनाग्नि के कई प्राकृतिक कारणों से हो सकती है, अध्ययन के अनुसार भारत में कई प्रमुख आग मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों से शुरू होती हैं। वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व, विशेष रूप से ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया में ,में वनाग्नि की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं जिसके लिए जलवायु परिवर्तन को उत्तरदायी समझा जा सकता है।
  • भारत में, वनाग्नि सबसे अधिक मार्च और अप्रैल के दौरान दर्ज की जाती है, जब जमीन में बड़ी मात्रा में सूखी लकड़ी, लॉग, मृत पत्ते, स्टंप, सूखी घास और खरपतवार होते हैं। प्राकृतिक परिस्थितियों में, अत्यधिक गर्मी और सूखापन, एक दूसरे के साथ शाखाओं की रगड़ से बनाया गया घर्षण भी आग शुरू करने के लिए जाना जाता है।
  • उत्तराखंड में, मिट्टी की नमी की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में देखी जा रही है। लगातार दो मॉनसून सीज़न (2019 और 2020) में, क्रमशः 18% और 20% मौसमी औसत से वर्षा की कमी रही है।
  • वन अधिकारियों के अनुसार भारत में अधिकतम आग मानव निर्मित हैं। यहां तक कि एक सिगरेट की बट से एक छोटी सी चिंगारी, या एक लापरवाही से जलाया हुआ माचिस की तीली की आग भी भयानक वनाग्नि में परिवर्तित हो सकती है।

वन और जन के रिश्तों में बिखराव की परिणति बन रहा है दावानल:-

  • वन पर आधारित समाजों के वन अधिकारों को समाप्त करने के बाद में कोई भी ऐसी सामाजिक व्यवस्था नहीं बन पाई है, जो वनों को आग से और अन्य नुकसानों से बचाने की जिम्मेदारी उठा सके। वनो के संरक्षण के प्रति जन सामान्य तथा समुदाय की रुचि में आई कमी ने वनो को अधिक सुभेद्य बना दिया है।
  • वनों और इसके उत्पादों के अब बाजारीकरण का दृष्टिकोण रहा है। औपनिवेशिक काल के समय जब यूरोप सहित पूरी दुनिया में विकास के मानदण्ड बदल रहे थे, तब वनों और प्राकृतिक संसाधनों पर ही सर्वाधिक दबाव पड़ा। समुदाय द्वारा वनो से अधिकार का दावा तो निरंतर किया गया परन्तु कभी भी वनो के प्रति कर्तव्य को प्रेरित न हो सके।
  • वन विभाग सिर्फ वनों की देखभाल और व्यावसायिक प्रबन्धन कर सकता है। वनों के संरक्षण और सुरक्षा का भार उठाने के लिये वन विभाग सक्षम नहीं है। समुदाय की भागीदारी और रुचि के बिना जंगलों की सुरक्षा भी संभव नहीं है।

वनाग्नि के प्रभाव

  • वनाग्नि के कारण वनों की जैव विविधता और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुआ है। जंगल में पेड़ पौधों के साथ ही छोटी-छोटी घास व झाड़ियाँ भी नष्ट होती हैं। जिसकी वजह से भू-क्षरण, भू-स्खलन और त्वरित बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हो रही है।
  • वनाग्नि के इमारती लकड़ियां भी जल जाती हैं जो आर्थिक नुक्सान का कारक बनती हैं।
  • जनजातीय वर्ग के परिवार तथा समुदाय वनो पर निर्भर रहते हैं तथा वनाग्नि से उनकी सामाजिक तथा आर्थिक दशा प्रभावित होती है। भारत में, लगभग 1.70 लाख गांवों के , लोगों की आजीविका ईंधन, बांस, चारा और छोटी लकड़ी पर निर्भर है।
  • जंगल की आग से उठने वाला धुआँ और विभिन्न प्रकार की जहरीली गैसें मानव और सभी प्राणियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस आग से निकलने वाली गैसें, जिनका प्रभाव वायुमंडल में 3 साल तक रहता है के कारण कैंसर जैसी घातक बीमारियाँ हो सकती हैं। इस प्रकार यह पर्यावरणीय प्रदूषण का कारण बनती है।
  • जलवायु परिवर्तन में शमन और अनुकूलन में वन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे एक सिंक, जलाशय और कार्बन के स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। एक स्वस्थ वन भंडार और किसी भी अन्य स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र की तुलना में अधिक कार्बन का संचय करता है।
  • वन की आग वन आवरण, मृदा, वृक्ष वृद्धि, वनस्पति और समग्र वनस्पतियों और जीवों पर कई प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। आग से कई हेक्टेयर जंगल में राख के कारण यह स्थान किसी वनस्पति विकास के लिए अयोग्य हो जाता है।

वनाग्नि रोकने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयत्न

  • 2004 के बाद से, एफएसआई ने वास्तविक समय में जंगल की आग की निगरानी के लिए फॉरेस्ट फायर अलर्ट सिस्टम विकसित किया। जनवरी 2019 में लॉन्च किए गए अपने उन्नत संस्करण में, सिस्टम अब नासा और इसरो से एकत्रित उपग्रह जानकारी का उपयोग करता है।
  • लगभग 21 राज्यों द्वारा केंद्र के समक्ष वनाग्नि निवारण की कार्ययोजना दी गई है । इनमें से महाराष्ट्र, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश एवं हिमाचल प्रदेश द्वारा प्रस्तुत कार्य-योजना को केंद्र द्वारा सहमति प्रदान की जा चुकी है।
  • 1992 में रियो में हुए पृथ्वी सम्मेलन के 21वें मसौदे के पैरा 11.2 में में जंगल में फैलने वाली आग से उत्पन्न होने वाली विभिन्न समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की गई थी।

निष्कर्ष

वनाग्नि के तीव्रता में वृद्धि का कारण प्राकृतिक तथा मानवीय दोनों है तथा यह भी सत्य है कि आज यह एक बड़ी आपदा का रूप ले चुका है। भारत तथा विश्व में लगातार वनाग्नि के बढ़ने से सामाजिक ,आर्थिक तथा पर्यावरणीय असंतुलन आ जाता है। इस असंतुलन को संतुलित करने हेतु वनो में समुदाय की भागीदारी को और अधिक बढ़ाकर इस समस्या के लिए सार्थक कदम उठाने चाहिए।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3
  • पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी
  • संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • भारत तथा विश्व में लगातार वनाग्नि के बढ़ने से सामाजिक ,आर्थिक तथा पर्यावरणीय असंतुलन आ जाता है। क्या आप सहमत हैं कि वनो के प्रति जन उदासीनता इस समस्या हेतु सर्वाधिक उत्तरदायी है?