बुनियादी ढांचा में वित्तीय अंतराल - समसामयिकी लेख

प्रासंगिकता / पाठ्यक्रम से सम्बद्धता की वर्ड्स :- बुनियादी ढांचा परियोजना, सार्वजनिक भागीदारी मॉडल, सरकारी वित्तपोषण, पूंजी निवेश

चर्चा में क्यों?

बुनियादी ढांचे पर आधारित अधिकांश रिपोर्ट में भारत निम्न वैश्विक रैंकिग पर है। भविष्य में आर्थिक विकास और रोजगार सृजन की निरंतरता में ख़राब बुनियादी संरचना सबसे बड़ी बाधाओं में एक है।

भारत में बुनियादी ढांचा क्षेत्र:

  • वर्तमान में भारत सरकार के लिए बुनियादी संरचना एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत ने देश के सतत विकास के लिए 2019-23 के दौरान बुनियादी ढांचे के लिए लगभग 1.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर व्यय करने की योजना बनाई है। सरकार ने 2018-30 से रेलवे के बुनियादी ढांचे के लिए 5,000,000 करोड़ (US$750 बिलियन) रुपये के निवेश का लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • भारत की सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण में व्याप्त अंतराल है जिसे सकल घरेलू उत्पाद के 5 प्रतिशत से अधिक होने का अनुमान लगाया गया है।

भारत में अवसंरचना परियोजना में वित्तपोषण की कमी के कारण:

  • पहला कारण, बुनियादी संरचना परियोजनाएं प्रायः जटिल होती हैं। इन परियोजनाओं में बड़ी संख्या में हितधारक सम्मिलित होते हैं। बुनियादी संरचना परियोजनाओं यथा -राजमार्ग, जलापूर्ति इत्यादि में प्रायः एकाधिकार होता है, इस एकाधिकार के दुरूपयोग को रोकने के लिए सरकार सख्त नियंत्रण करती है। इन परियोजनाओं में सम्मिलित सभी हितधारकों के लाभ, जोखिम-साझाकरण इत्यादि के सन्दर्भ में विभिन्न कानून उपस्थित हैं जो प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना देते हैं।
  • दूसरा कारण, ये परियोजनाएं दीर्घ अवधि की होती हैं। अतः कई बार इन परियोजनाओं को नीतिगत परिवर्तन, अनुमोदन में विलम्ब जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। किसी कारणवश परियोजना में विलम्ब का परिणाम लागत तथा समय की वृद्धि के रूप में सामने आता है। इससे परियोजना की तकनीकी-आर्थिक व्यवहार्यता पर या अंतिम उत्पाद के मूल्य को भी संशोधित करने की आवश्यकता पड़ती है। कई बुनियादी संरचना परियोजनाएं लोक कल्याणकारी होती हैं जिससे इन परियोजनाओं में एक सीमा से अधिक शुल्क का निर्धारण नहीं किया जा सकता ।
  • तीसरा कारण, भारतीय बैंकिंग प्रणाली में ऋण वित्तपोषण व्यापक रूप से प्रचलन में है इस स्थिति में परिसंपत्ति-देयता के अनुपात में अंतर एक मूलभूत समस्या को जन्म देता है। भारत में, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का प्रभुत्व आंशिक रूप से इस समस्या को सरकारी समर्थन के साथ निस्तारित कर सकता है।

बुनियादी ढांचे के वित्तीय अंतराल को कम करने के उपाय

  • बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वित्तीय अंतराल को कम करने के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी, नियामकीय व्यवस्था की विश्वसनीयता में सुधार तथा वित्त पोषण के नए स्रोतों का उपयोग किया जा सकता है ।
  • वर्तमान में वैश्विक निवेशको ने भारत को बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए उपयुक्त मानकर एक प्रमुख निवेश स्थल के रूप में देखना आरंभ किया है। भारत अपने युवा शक्ति, मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति में विस्तार तथा घरेलू बाजार के कारण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के रेट ऑफ रिटर्न में सक्षम है। वर्तमान में यह आवश्यक है कि भारत वैश्विक निवेशकों द्वारा आरंभ की गई परियोजनाओं विशेष रुप से कंस्ट्रक्शन मैटेरियल, स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन के विकल्प, डिजिटल तकनीकी से संबंधित परियोजनाओं का लाभ उठाएं।
  • भारत को अपने बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण के स्रोतों में विविधता लाने की आवश्यकता है। अन्य उभरते हुए बाजारों के विपरीत भारत में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में मुख्य निवेश सरकार द्वारा किया जाता है जिनमे लगभग 70% बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का वित्तपोषण सरकारी बजट से होता है। बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वित्तपोषण में निजी क्षेत्र के योगदान को बढ़ाने की आवश्यकता है। यह अनुपात लगभग 50- 50% तक होना चाहिए।
  • निजी निवेश : सार्वजनिक निजी भागीदारी के माध्यम से बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निजी निवेश को आकर्षित किया जाना चाहिए। यह न सिर्फ परियोजना के लिए वित्त उपलब्ध कराएगा बल्कि बेहतर तकनीकी तथा कार्य व्यवहार को भी लाएगा। भारत में पीपीपी की दिशा में काफी प्रगति हुई है। विद्युत तथा सड़क में पीपीपी मॉडल सफल सिद्ध हुई है। इसे बंदरगाह, रेलवे, जल तथा स्वच्छता सहित अन्य क्षेत्रों में बढ़ाया जा सकता है।
  • निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए एक विश्वसनीय नियामक तथा संस्थागत व्यवस्था आवश्यक है जो अनुबंध प्रबंधन ,बाजार मूल्यांकन ,सामाजिक आर्थिक प्रभाव, सामर्थ्य, परियोजनाओं की बैंक योग्यता तथा फ्यूचर प्रोस्पेक्ट्स पर कुशलता से कार्य कर परियोजना के अनुमोदन में लगने वाले समय को कम करें।
  • बेहतर संस्थागत क्षमता से पीपीपी मॉडल द्वारा संचालित और योजनाओं में सरकार तथा निजी क्षेत्र के अंतर्निहित संबंधों में सुधार होगा। इसके साथ ही साथ तीव्र गति से निर्णय लेकर परियोजना को जल्द से जल्द सफल किया जाएगा।
  • पीपीपी मॉडल के द्वारा बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की वित्तीय स्थिरता का मूल्यांकन दो साधनों के द्वारा किया जाता है। यह साधन पीपीपी का वित्तीय प्रबंधन तथा विकास प्राथमिकताओं के साथ पीपीपी की निरंतरता हैं । भारत को पीपीपी परियोजनाओं के जोखिम प्रबंधन की दिशा में अभी बहुत कार्य करने की आवश्यकता है।
  • वित्तीय सुधारों से आकस्मिक देनदारियों में कमी आएगी तथा बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण के अंतराल को कम किया जा सकेगा। नीति निर्माताओं को ऐसी परियोजनाओं के लिए विदेशी मुद्रा का ऋण नहीं लेना पड़ेगा जो बड़े पैमाने पर स्थानीय मुद्रा में राजस्व उत्पन्न करती हैं। बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए घरेलू पूंजी बाजार (विशेष रुप से हरित बॉन्ड) एक महत्वपूर्ण तथा दीर्घकालिक स्रोत के रूप में परिणत हो सकते हैं।

राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन:

कुल लागत: USD1.4 ट्रिलियन

अवधि: 2020-25

नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (एनआईपी) को पूरे भारत में विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचा प्रदान करने और सभी नागरिकों के लिए जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए अगस्त 2020 में लॉन्च किया गया है। यह अपनी तरह की पहली तथा पूर्ण रूप से सरकारी परियोजना है। इसका उद्देश्य भारत के बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में निवेश के अवसरों का निर्माण करना , बुनियादी ढांचा परियोजना में सुधार करना तथा भारत में निवेश को आकर्षित करना है।

एनआईपी का प्रमुख उद्देश्य समस्त आर्थिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे के उप-क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रमुख ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड परियोजनाओं के सर्वोत्तम आधार का निर्माण करना है।

एनआईपी को वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) के सचिव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स द्वारा तैयार किया गया है। इस टास्क फोर्स की अंतिम रिपोर्ट 29 अप्रैल 2020 को श्रीमती निर्मला सीतारमण केंद्रीय वित्त और कॉर्पोरेट मंत्री, द्वारा जारी की गयी।


राष्ट्रीय मास्टर प्लान (गतिशक्ति)

  • गति शक्ति मास्टर प्लान में रेलवे, सड़क और राजमार्ग, पेट्रोलियम और गैस, बिजली, दूरसंचार, शिपिंग और विमानन सहित 16 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों द्वारा नियोजित तथा आरम्भित बुनियादी परियोजनाओं को एकीकृत करने के लिए केंद्रीकृत पोर्टल का निर्माण किया गया है।
  • गति शक्ति में भारतमाला, सागरमाला, अंतर्देशीय जलमार्ग, शुष्क/भूमि बंदरगाहों, उड़ान आदि जैसे विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों की बुनियादी ढांचा योजनाएं सम्मिलित होंगी। इस प्लान में आर्थिक क्षेत्र जैसे कपड़ा क्लस्टर, फार्मास्युटिकल क्लस्टर, रक्षा गलियारे, इलेक्ट्रॉनिक पार्क,भारतीय कृषि क्षेत्रक जैसे उद्यमों को सम्मिलित किया जायेगा। इसमें औद्योगिक गलियारे के निर्माण तथा कनेक्टिविटी में सुधार करके भारतीय व्यवसायों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने का प्रयास किया जायेगा।
  • इस प्लान में BiSAG-N (भास्कराचार्य नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस एप्लिकेशन एंड जियोइनफॉरमैटिक्स) तथा इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन)द्वारा विकसित इमेजरी के साथ स्थानिक नियोजन उपकरण की सहायता लेकर इसे टेक्नोलॉजी प्रोन बनाया जाएगा।

आगे की राह :-

अर्थशास्त्रियों के मध्य एक आम मत है कि बुनियादी ढांचा में निवेश आर्थिक विकास का प्रमुख चालक है तथा यह समावेशी विकास में भी सहायक होता है। बुनियादी ढांचे के निवेश ने उद्यमिता, आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने का एक व्यापक उदाहरण भारत के स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग परियोजना में निवेश है।

स्रोत: The Hindu

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3
  • भारतीय अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचा: ऊर्जा, बंदरगाह, सड़कें, हवाई अड्डे और रेलवे आदि।