समान नागरिक सहिंता के आयाम - समसामयिकी लेख

सन्दर्भ

हाल के वर्षो मे समान मे नागरिक सहिता सामाजिक व राजनैतिक चर्चा का विषय रहा है।

परिचय

  • समस्त नागारिको हेतु समान कानून होता है। विवाह , तलाक , उत्तराधिकार व सम्पत्ति के मामलो मे लागू होता है । सामान्य रूप से भारत में यह व्यवस्था थी कि आपराधिक मामले राज्य की विधि द्वारा संचालित होते थे जबकि सिविल मामले विभिन्न धर्मो के पर्सनल लॉ द्वारा संचालित होते थे।
  • परन्तु समय के साथ साथ कई सिविल कानूनों को सहिंताबद्ध कर दिया गया। वर्तमान समय में हिन्दू कानून ( जिसमे हिन्दू, बौद्ध ,जैन तथा सिख ) सहिंताबद्ध हो चुके हैं परन्तु मुस्लिम समुदाय,पारसी समुदाय तथा ईसाई समुदाय में अभी भी कई नियम पर्सनल लॉ के अनुसार संचालित होते हैं। इसके लिए कई बार समान नागरिक सहिंता लागू करने की मांग उठती है।

समान नागरिक सहिता की सवैघानिक स्थिति :-

भारतीय सविधान के भाग -4 राज्य के नीति निर्देशक निदेशक तत्व के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत इसका वर्णन है! अनुच्छेद 44 के अनुसार " राज्य भारत के समस्त राज्य क्षेत्र मे नागरिको के लिए एकसमान नागरिक सहिता प्रदत्त करने का प्रयास करेगा"।

समान नागरिक सहिंता लागू करने के पक्ष में तर्क

समानता के अधिकार हेतु

भारतीय संविधान के मुल अधिकार मे समानता का अधिकार वाणित है ।

  • अनुच्छेद - 14- राज्य किसी ब्यक्ति को विधि के सम्मुख समता व विधियों के समान संरक्षण से वंचित नही करेगा ।
  • अनुच्छेद -15- राज्य सर्वजनिक स्थल पर धर्म मूल लिंग , निवास व जन्म स्थान पर विभेदन नही करेगा

परन्तु समान नागरिक सहिंता के न लागू होने से इन अधिकारों का उलंघन होता है।

सामाजिक न्याय हेतु

  • अनुच्छेद-21 के अंतर्गत गरिमामय व स्वतन्त्र जीवन का सिद्धांत परन्तु महिलाओं के लिए लगातार इसका हनन होता रहा। तीन तलाक मन्दिर प्रवेश इत्यादि कई ऐसे मामले जहाँ पितृसत्तात्मकता उभर कर सामने आई जो धर्म द्वारा संचालित हो रही हैं । उत्तराधिकार मामले है जहाँ विभिन्न पर्सनल लॉ अन्तर स्पष्ट दिखाता है । ऐसे मे महिलाओ के अधिकार रक्षा हेतु समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है।

अर्थात समान नगरिक संहिता एक धार्मिक नही वरन सामाजिक विषय है

विधिक स्पष्टता हेतु

  • सामान्य तौर पर धार्मिक कानूनों में विभेदन तथा अस्पस्टता विद्यमान रहती है। समान नागरिक सहिंता लागू होने से सम्पूर्ण देश में एक ही नियम से विभिन्न विषयो में विधिक स्पस्टता आएगी।

राज्य का नीति निर्देशक तत्व

  • समान नागरिक सहिंता राज्य का नीति निर्देशक तत्व है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार राज्य को विधि का निर्माण करते समय इन निर्देशक तत्वों को ध्यान रखना चाहिए।

समान नागरिक संहिता के विपक्ष मे तर्क -

  • समान नागरिक सहिता से धार्मिक अधिकारो से सम्बन्धित अनुच्छेद 25 के उल्लंघन की बात है जिसके अनुसार सभी नागरिको को धर्म को मानने प्रचार व आचरण हेतु स्वतन्त्रता प्रदान की गई है । अतः समान नागरिक संहिता धार्मिक आस्था पर प्रशन उठायेगी ।
  • भारत का राजनैतिक व्यवस्था लोकतान्त्रिक है परन्तु अभी देश का समाज पूर्ण रूप से लोकतान्त्रिक नहीं हो सका है। इस स्थिति में समान नागरिक सहिंता लागू होने पर समाज में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
  • भारतीय समाज में धर्म अभी भी एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है सामान नागरिक सहिंता को धर्म पर आघात समझा जा सकता है।
  • राज्य के नीति निर्देशक तत्व विधि द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं।

समान नागरिक सहिंता पर विधि आयोग

  • विधि आयोग की 2018 की रिपोर्ट में विधि आयोग ने समान नागरिक सहिंता की आवश्यकता को ख़ारिज कर दिया था। विधि आयोग ने पर्सनल लॉ को सहिंताबद्ध करने की अनुशंसा की है।

समान नागरिक सहिंता पर न्यायालय का रूख

  • सर्वोच्च न्यायालय समान नागरिक सहिंता का पक्षधर है। शाहबानो वाद के उपरान्त इस मामले में कदम न उठाये जाने के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को फटकार लगाई थी। जिसकी आवश्यकता तीन तलाक के मुद्दे पर भी जाहिर की गई थी।

आगे की राह

यह सत्य है कि लैंगिक विभेदन को समाप्त करने के लिए तथा धर्मनिरपेक्षता व लोकतंत्र की पूर्ण प्राप्ति हेतु समान नागरिक सहिंता आवश्यक है परन्तु सरकार द्वारा इसे थोपा नहीं जाना चाहिए। पर्सनल लॉ में सुधार करते करते समान नागरिक सहिंता की तरफ अग्रसर होना आवश्यक है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 तथा 2
  • भारतीय समाज तथा भारतीय राजव्यवस्था
  • भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ, भारत की विविधता।
  • सामाजिक सशक्तीकरण, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद और धर्मनिरपेक्षता।
  • भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • क्या आप सहमत हैं कि भारत का समाज "समान नागरिक सहिंता" को स्वीकार सकता है ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करें?