न्यायिक अवमानना के आयाम - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

सन्दर्भ:-

  • सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया आदेश में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण अवमानना ​​का दोषी पाया गया।

परिचय:-

  • उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषन को न्यायिक व्यवस्था के परिपेक्ष्य में दो ट्वीट करने के कारण न्यायिक अवमानना का दोषी बनाया गया।जिसका संदर्भ उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वमेव लिया गया है। जिसमे एक ट्वीट में उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश की महँगी बाइक के बारे में कहा था तथा दुसरे में उन्होंने यह ट्वीट किया कि पिछले 6 वर्षों में उच्चतम न्यायालय लोकतंत्र के हनन का कारक बन रहा है।
  • परन्तु यहाँ यह प्रश्न है कि क्या ये ट्वीट न्यायिक अवमानना होंगे या न्यायिक आलोचना।

अवमानना ​​की अवधारणा :-

  • अदालत की अवमानना ​​की अवधारणा कई सदियों पुरानी है। इंग्लैंड में, यह एक सामान्य कानून सिद्धांत है जो राजा की न्यायिक शक्ति की रक्षा करने का प्रयास करता है, शुरू में स्वयं द्वारा और बाद में न्यायाधीशों के एक पैनल द्वारा राजा के नाम पर कार्यविधि होती थी ।
  • न्यायाधीशों के आदेशों का उल्लंघन स्वयं राजा के प्रति एक प्रकार का संदेह था तथा इंग्लैंड में एक धारणा है कि राजा कभी गलत नहीं होता ।
  • समय के साथ, न्यायाधीशों की किसी भी तरह की अवज्ञा, या उनके निर्देशों के कार्यान्वयन में बाधा, या टिप्पणी और कार्य जो उनके प्रति अनादर दिखाते थे,उन्हें अवमानना के अंतर्गत दोषी माना गया।

भारत में न्यायिक अवमानना तथा उसका बैधानिक आधार :-

  • भारत में अवमानना ​​के कानून स्वतंत्रता पूर्व से विद्यमान हैं । शुरुआती उच्च न्यायालयों के अलावा, कुछ रियासतों की अदालतों में भी ऐसे कानून थे।
  • जब संविधान को अपनाया गया था, उसमे प्रदत्त वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के युक्ति युक्त निर्बंधन के रूप में न्यायिक अवमानना को स्थापित किया गया ।
  • संविधान के अनुच्छेद 129 ने सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं की अवमानना ​​को दंडित करने की शक्ति प्रदान की।
  • अनुच्छेद 215 ने उच्च न्यायालयों पर एक समान शक्ति प्रदान की।
  • न्यायिक अवमानना अधिनियम 1971 अवमानना पर दण्डित करने के अधिकार को वैधानिक आधार प्रदान करता है

आपराधिक अवमानना तथा प्रशांत भूषण का मामला

  • अवमानना विषय के उद्देश्य के लिए केवल आपराधिक अवमानना ​​से संबंधित हैं, न कि उन विलफुल अवज्ञाकारी आलोचनाओं से । न्यायालयों के अधिनियम की धारा 2 (सी), 1971 किसी भी मामले के प्रकाशन या किसी अन्य अदालत के अधिकार का हनन या कम करने वाले किसी अन्य मामले के प्रकाशन के रूप में आपराधिक अवमानना ​​को परिभाषित करती है; अथवा यह तब प्रभाव में आता है जब किसी न्यायिक कार्यवाही के नियत समय के साथ पूर्वाग्रह या हस्तक्षेप या न्याय के प्रशासन में बाधा डालती है।
  • परन्तु यहाँ प्रश्न यह है कि क्या प्रशांत भूषण के ट्वीट में न्यायालय की शक्ति कम करने जैसा कुछ था ?
  • यदि ऐसा नहीं था उस परिश्थिति में क्या इसका अर्थ यह है कि कोई भी न्यायपालिका की नहीं कर सकता ।
  • परन्तु भारतीय न्यायालयों के कामकाज के संबंध में कानून में इस विशेष लेख का आधार है, अर्थात्, आलोचना और अवमानना ​​को अलग करने वाली एक पतली रेखा है।
  • संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए), अनुच्छेद 19 (2) के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए बोलने की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है। सी. दफ्फरी बनाम ओ.पी.गुप्ता (1971) वाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आपराधिक अवमानना ​​करने पर अनुच्छेद 19 1 a प्रतिबंधित है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि अवमानना ​​के डर से न्यायपालिका के विरुद्ध इच्छा व्यक्त नहीं की जा सकती है।
  • एक अवधारणा के रूप में अदालत की अवमानना, न्यायिक संस्थानों को प्रेरित हमलों और अनुचित आलोचना से बचाने की कोशिश करती है, जिससे न्यायलय की स्वायत्ता तथा स्वतंत्रता बनी रहे।

स्वयमेव सुधार करेगा न्यायालय :-

  • इस मामले में न्यायालय द्वारा स्वयं में सुधार करने का निर्णय लिया गया है। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पैनल निम्न बिन्दुओ की जांच करेगा
  • यदि किसी व्यक्ति के द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया जाता है उस स्थिति में मुद्दा उठाने का आधार क्या होगा ?
  • आधार सिद्ध होने पर इस ट्रायल की प्रक्रिया क्या होगी ?
  • यदि यह जुडिसियल तथा सब-जुडिसियल की भ्रष्टाचार की स्थिति में प्रक्रिया क्या होगी ?

आगे की राह

  • न्यायिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न संविधान के हित में नहीं होता क्योंकि उच्चतम न्यायालय ही संविधान का अभिरक्षक है। ऐसे में उच्चतम न्यायालय को लोकतंत्र तथा संविधान की अस्मिता की रक्षा हेतु पारदर्शिता स्वीकारनी आवश्यक है। निश्चित ही लोकतंत्र का वास्तविक तत्वार्थ आलोचना तथा अवमानना के स्पष्ट अंतर में है , इस दशा में उच्चतम न्यायालय का स्वयं में सुधार का कदम सराहनीय है। एक लोकतंत्रत्मक देश के सभी संगठनों में पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व आवश्यक है। उच्चतम न्यायालय इस दशा में अग्रसर है तथा इस कदम से यह स्पष्ट है कि न्यायिक आलोचना तथा न्यायिक अवमानना में अंतर है व न्यायालय उस अंतर को निर्धारित करने का पक्षधर है ।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2

  • राजव्यवस्था

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • भारतीय न्याय व्यवस्था में न्यायिक आलोचना ही न्यायिक अवमानना का आधार बन चुकी है ? आलोचनात्मक व्याख्या करें