भारत में भाषा संरक्षण के विविध आयाम - समसामयिकी लेख

सन्दर्भ

हाल ही में यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 197 भाषाएं लुप्त होने की अवस्था में हैं तथा इस दृष्टिकोण से भारत विश्व में प्रथम है।

परिचय

  • यूनेस्को की रिपोर्ट "यूनेस्को एटलस ऑफ़ वर्ल्डस लैंग्वेज इन डेंजर " के नवीनतम संस्करण के अनुसार भारत की लगभग 197 स्थानीय भाषाओ को सुभेद्य (वल्नरेबल) से एक्सटिंक्ट (लुप्त प्राय ) तक की सूची में स्थान दिया गया है। हन्दौरी,लद्दाखी , निहाली , टोडा जैसी कई भाषाएं आज संकटग्रस्त है। यदि यही अवस्था बनी रही तो "कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी" की कहावत मात्र किताबो तक सिमट कर रह जायेगी।

"यूनेस्को एटलस ऑफ़ वर्ल्डस लैंग्वेज इन डेंजर " के मुख्य विन्दु

  • इस रिपोर्ट के अनुसार भारत की 197 भाषाएं सुभेद्य(वल्नरेबल ) से लुप्तप्राय (एक्सटिंक्ट ) की श्रेणी में हैं तथा भारत उन देशो में शीर्ष पर है जहाँ सर्वाधिक भाषाएं संकट में हैं।
  • भारत के अतिरिक्त संयुक्त राज्य अमेरिका में 191 , ब्राजील में 190 भाषाएं संकट में हैं जो भारत के उपरान्त क्रमशः द्वितीय तथा तृतीय स्थान पर हैं।
  • भारत के अतिरिक्त एशिया में चीन (144 भाषाओँ के साथ चतुर्थ स्थान ) तथा इंडोनेसिया (143 भाषाओं के साथ पांचवे स्थान ) पर हैं।
  • इनके अतिरिक्त मेक्सिको (143 भाषा ) , रूस (131 भाषा )तथा ऑस्ट्रलिया (108)भाषा है जहाँ 100 से अधिक भाषाएं विलुप्त होने की स्थिति में हैं।

"यूनेस्को एटलस ऑफ़ वर्ल्डस लैंग्वेज इन डेंजर " की विभिन्न श्रेणियाँ

वल्नरेबल (सुभेद्य) - इस श्रेणी में ऐसी भाषाएं आती हैं जिन्हे मुख्य रूप बच्चो द्वारा स्पेसिफिक डोमेन (यथा घर ) में बोला जाता है।

डेफिनेटली इंडेंजर्ड (निश्चित रूप से संकटग्रस्त) - इस श्रेणी में ऐसी भाषाएं आती हैं जिन्हे बच्चे मातृभाषा के रूप में सीखना नहीं चाहते।

सेवेरली इंडेंजर्ड (गंभीर रूप से संकटग्रस्त)- इस श्रेणी में ऐसी भाषाएं आती हैं जिन्हे ग्रैंडपैरेंट्स द्वारा बोला जाता है तथा पेरेंट्स इन्हे समझते तो हैं परन्तु बोल नहीं पाते , तथा बच्चे इसे समझ नहीं जाते।

क्रिटिकली इंडेंजर्ड - इस श्रेणी में ऐसी भाषाएं आती हैं जिन्हे मात्र घर के बड़ो द्वारा कभी कभी बोला जाता है।

एक्सटिंक्ट (लुप्तप्राय)- इस श्रेणी में ऐसी भाषाएं आती हैं जिनका कोई वक्ता नहीं बचा है।

भाषा :-

  • साहित्यिक रूप से भाषा , वाणी द्वारा संचार करने प्रणाली है। तह ध्वनियों का एक संग्रह है जिससे लोगों का एक समूह एक सामान अर्थ ग्रहण करता है।
  • एक ही पूर्वजो से सम्बंधित अलग अलग भाषाओ का समूह भाषा परिवार कहलाता है।
  • बोली , भाषा का स्थानीय रूप है। एक भाषा से कई बोलियां आ सकतीं हैं।

भारत में भाषाओ का वर्गीकरण

भारत में भाषाओ को निम्न रूपों में वर्गीकृत किया गया है

  • भारतीय आर्य समूह
  • द्रविड़ समूह
  • चीनी-तिब्बत समूह
  • नीग्रो समूह
  • आस्ट्रिक समूह
  • अन्य

भारत में भाषाओ का सबसे बड़ा समूह भारतीय आर्य समूह है। लगभग 74% भारतीय इसी समूह से सम्बंधित भाषाएं बोलते हैं।

भारत में भाषाओ पर संकट के कारण

ऐतिहासिक रूप से लगातार भारत पर होने वाले आक्रमणों, सांस्कृतिक साम्राज्य्वाद के प्रयासों ने भी भारतीय देशज भाषाओ को संकटग्रस्त किया है।

  • भारत में लम्बे समय तक औपनिवेशिक शासन के कारण अंग्रेजी एक विशिष्ट वर्ग की स्थिति को संदर्भित करती है। भारत में अंग्रेजी के शासन ,प्रशासन , कानून , पाठ्यक्रमों में बढ़ते प्रभाव के कारण अन्य भारतीय भाषाओ की स्वीकृति कम हो जाती है। जो इन भाषाओँ के संकटग्रस्त होने का कारण बनती है।
  • वैश्वीकरण के कारण विश्व के कई देशो से व्यापार तथा अन्य गतिविधियों के फलस्वररूप भारतीय लगातार नई भाषाएं (जर्मन ,फ्रेंच )सीख रहे हैं जिससे स्ताहनीय भाषाओ के प्रति उनका रुझान काम हो रहा है।
  • भारतीय सरकार के अनुसार केवल उन्ही बोलियों को भाषा माना जाएगा जिनकी लिपि भी होगी इस स्थिति में मात्र बोली जाने वाली कई भाषाएं संकटग्रस्त हैं।
  • भारत में आधिकारिक रूप से 122 भाषाएं हैं, जो भाषाई सर्वेक्षण में गणना की गयी 780 से काफी कम हैं। इस विरोधाभास का मुख्य कारण यह है कि सरकार ऐसी भाषा को मान्यता नहीं देती, जिसे बोलनेवाले 10,000 से कम हों। इस कारण कई भाषाओ के संरक्षण में फंडिंग भी प्राप्त नहीं हो पाती।
  • वर्ष 2013 की भारत की भाषाई सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक बीते 50 सालों में 220 से अधिक भाषाएं खत्म हो गयीं, जबकि 197 भाषाएं खात्मे के कगार पर हैं., परन्तु सरकारी उदासीनता तथा जन सामान्य में अंग्रेजी को महत्व दिए जाने के कारण ये इन भाषाओ के संरक्षण का प्रयास नहीं किया जा रहा है।
  • भारत में मात्र 22 भाषाओ को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है जो भाषाई सर्वेक्षण की संख्या से अत्यंत कम हैं।
  • अंग्रेजो द्वारा कई जनजातियों को अपराधी जनजाति का दर्जा दिया गया था ,जिसके कारण ये जनजातीय अपनी भाषा , बोली को छुपाती थीं। स्वतंत्रता के इतने वर्षो के उपरांत भी इन जनजातियों के संरक्षण में प्रयास नही किये गए जिन्होंने इनकी भाषाओ को लुप्तप्राय कर दिया।
  • अधिकतम लुप्तप्राय भाषाए मुख्य रूप से ऐसे जनजातियों में हैं जो समाज की मुख्यधारा से संपर्क नहीं रखते जिससे इनकी भाषा का प्रसार नहीं हो रहा है।
  • लोकतंत्र में बहुमत के महत्व के कारण उन मुद्दों को ही महत्व दिया जाता है जिनसे बहुसंख्यक वर्ग का हित हो। अतः विलुप्त होने वाली भाषा के संरक्षण के राजनैतिक महत्वाकांक्षा में भी प्रायः कमी दिखती है।
  • इन्ही कारणों से 1961 की जनगणना में 1,652 भाषाएं थीं तथा 2013 के सर्वेक्षण ने मात्र 780 भाषाएं पायी हैं।

भाषा के संरक्षण का प्रयास

भाषा , किसी भी व्यक्ति की पहचान को सुनिश्चित करता है। भाषा पर संकट पहचान पर संकट माना जाता है। स्वतंत्रता उपरान्त से ही भाषा के आधार पर राज्यों की बढ़ती मांग स्वयं में भाषा के महत्व को स्थापित करती है। भाषा की विविधता भारत की संस्कृति का अभिन्न अंग है। अतः भाषा के संरक्षण के लिए कई प्रयास किये भी गए हैं

  • भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओ को संवैधानिक संरक्षण दिया गया है। इस अनुसूची में कश्मीरी भाषा, सिन्धी भाषा,पंजाबी भाषा,हिन्दी भाषा , बंगाली भाषा, असमी भाषा,उडिया भाषा, गुजराती भाषा, मराठी भाषा,कन्नड़ भाषा,तेलगु भाषा,तमिल भाषा,मलयालम भाषा,उर्दू भाषा,संस्कृत भाषा,नेपाली भाषा,मढिपूडी भाषा,कोंकणी भाषा,बोडो भाषा,डोंगरी भाषा,मैथिली भाषा, संथाली भाषा को सम्मिलित किया गया है।
  • भारत के सरकार ने तमिल , तेलगू, संस्कृत , मलयालम ,ओड़िया तथा कन्नड़ को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया है।
  • भारतीय भाषा संस्थान (सरकार द्वारा 1969 में मैसूर में स्थापित) ने भारतीय भाषाओं पर शोध करने और उनका रिकॉर्ड तैयार करने के साथ ही कई शानदार काम किये हैं।
  • भारतवाणी पोर्टल 121 भाषाओं में सामग्री का प्रकाशन करता है तथा यह ऑनलाइन कोर्स को भी संचालित कर रहा है।

संरक्षण के इन प्रयासों के उपरान्त भी भाषाओ का विलुप्तीकरण जारी है अतः भाषाओ को विलुप्त होने से रोकने के लिए कुछ अन्य प्रयासो की आवश्यकता है

भाषाओ के संरक्षण के लिए क्या किया जा सकता है ?

  • सर्वप्रथम आवश्यक है कि सरकार भाषा के मानदंडों में परिवर्तन करें तथा उन बोलियों को भी संरक्षित करे जिनकी लिपि नहीं है तथा जो 10000 से कम जनसंख्या द्वारा प्रयोग किया जाता है।
  • भाषाओं को बचाने के लिए एक सफल तरीका है- उस भाषा में पढ़ानेवाले स्कूलों को बढ़ावा देना। इस स्थिति में प्रोजेक्ट टाइगर की तरह ही भाषाओ का इनसीटू संरक्षण किया जा सकेगा।
  • सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के तहत खर्च राशि के कुछ भाग को को भाषाओं और दस्तकारी को बचाने, डाक्यूमेंटेशन और एक्सेसिबिटी टूल्स के निर्माण के लिए खर्च किये जाने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • विशिष्ट भाषाओं का इस्तेमाल करनेवाले युवाओं को संवाद, आदान-प्रदान, एप्स और पॉडकास्ट का इस्तेमाल करते हुए भाषा का संरक्षण और विकास करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
  • सिविल सोसाइटी को इस क्षेत्र में कार्यरत होना होगा।

निष्कर्ष

भारत में एनजीओ , सरकार तथा अन्य क्षेत्रको के प्रयास से बीते दो दशक में भील जैसी भाषा को बोलनेवालों की संख्या में 85 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। भारत सरकार को जनजतियों तथा अन्य भाषायी अल्पसंख्यक समूह के भाषाओ को वैधानिक संरक्षण देना चाहिए जिससे विश्वास घाटे ने कमी हो सके। भारत विश्व के सर्वाधिक भाषायी विविधता वाले देशो में एक है (पपुवा न्यू गिनी 1100 भाषाएं , इंडोनेशिया 800 भाषा , भारत 780 भाषा ) अतः भारत को इस दिशा में प्रयत्न करना चाहिए।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1
  • भारतीय कला तथा संस्कृति
  • भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • भाषा, पहचान का एक माध्यम है तथा भारत में लगातार भाषाओ पर संकट आ रहा है। क्या आपके अनुसार भारत के लोग अब अपनी स्थानीय पहचान खो रहे हैं?