भारत की घटती क्रेडिट रेटिंग - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


भारत की घटती क्रेडिट रेटिंग - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चर्चा का कारण

  • कोविड 19 महामारी के दौरान लॉक डाउन से आर्थिक गतिविधियाँ ठप्प हो जाने का प्रतिकूल प्रभाव GDP, रोजगार समेत भारत की क्रेडिट रेटिंग पर भी पड़ा है। एक के बाद एक करके सभी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की जीडीपी में संभावित वृद्धि दर को कम करते हुए भारत की क्रेडिट रेटिंग को भी कम कर दिया है।
  • वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर ने लगातार 13वें साल में भारत की संप्रभु रेटिंग को 'बीबीबी-' के सबसे निचले निवेश ग्रेड में बरकरार रखा। एसएंडपी ने भारतीय अर्थव्यवस्था और राजकोषीय स्थिति को 2021 से पटरी पर आ जाएगी। एसएंडपी ने भारत का आउटलुक 'स्थिर' रखा है लकिन इसके साथ चेतावनी भी दी है की लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए जोखिम बढ़ रहा है।
  • इसके पहले अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी, मूडीज इन्वेस्टर सर्विसेज ने 1 जून, 2020 को भारत की संप्रभु रेटिंग को सबसे कम निवेश ग्रेड में बदल दिया। रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग को ' Baa2' से घटाकर ‘Baa3’ कर दिया है और आउटलुक नकारात्मक ही दिखाया गया है। रेटिंग एजेंसी के अनुसार, यह निर्णय भारतीय अर्थव्यवस्था की क्षमता और ऋण सामर्थ्य की तुलना में अर्थव्यवस्था की धीमी वृद्धि प्रेरित है। 'बीएए 3' सबसे कम निवेश ग्रेड है और नकारात्मक आउटलुक भविष्य में और अधिक गिरावट की संभावना को दर्शाता है।

क्या होती है सॉवरेन/संप्रभु रेटिंग

  • अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां विभिन्न देशों की सरकारों की उनके उधार चुकाने की क्षमता के आधार पर सॉवरेन रेटिंग का निर्धारण करती हैं। इसके लिए वह अर्थव्यवस्था, बाजार और राजनीतिक जोखिम को आधार मानती हैं। किसी देश की सॉवरेन रेटिंग यह बताती है कि वह देश भविष्य में अपनी देनदारियों को चुका सकेगा या नहीं? देश की यह रेटिंग टॉप इन्वेस्टमेंट ग्रेड से लेकर जंक ग्रेड तक होती हैं। जंक ग्रेड वाली रेटिंग को डिफॉल्ट श्रेणी में माना जाता है।

क्रेडिट घटाने के कारण

मूडीज ने भारत की संप्रभु रेटिंग को घटाने का यह फैसला लेने के चार मुख्य कारण बताए हैं-

  1. 2017 से आर्थिक सुधारों का कमजोर कार्यान्वयन
  2. पिछले कई वर्षों में लगातार अपेक्षाकृत कम आर्थिक विकास
  3. सरकारों (केंद्र और राज्य) की राजकोषीय स्थिति में भारी गिरावट
  4. भारत के वित्तीय क्षेत्र में बढ़ता तनाव
  • पिछले साल नवंबर में ही मूडीज ने भारत की Baa2 रेटिंग के आउटलुक को "स्थिर" से "नकारात्मक" में बदल दिया था क्योंकि जोखिम बढ़ रहे थे।

क्या होती है क्रेडिट रेटिंग?

  • क्रेडिट रेटिंग वित्तीय साधन या वित्तीय इकाई से जुड़े क्रेडिट जोखिमों का विश्लेषण है। व्यापार, वित्तीय जोखिम, प्रबंधन गुणवत्ता और ऋण की क्षमता के व्यापक विश्लेषण के बाद क्रेडिट रेटिंग एजेंसी द्वारा किसी देश, संस्था या व्यक्ति को एक रेटिंग दी जाती है।
  • क्रेडिट रेटिंग यह निर्णय लेने में सहायक होती है कि कोई उधारकर्ता ऋण प्राप्त कर सकता है या नहीं। जिन व्यक्तियों, कंपनियों और सरकारों की क्रेडिट रेटिंग उच्च होती है उनको वित्तीय संस्थानों या सार्वजनिक ऋण बाजारों से उधार प्राप्त करने में आसानी होती है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां परोक्ष रूप से यह बताती हैं कि देश, संस्था या व्यक्ति आर्थिक रूप से कितना मजबूत है और उसको कितना ऋण देना खतरनाक है या नहीं अर्थात वह कितना ऋण चुकाने की क्षमता रखता है।
  • उपभोक्ता स्तर पर, बैंक आमतौर पर क्रेडिट रेटिंग या क्रेडिट स्कोर को ऋण की शर्तों का आधार बनाते हैं; आमतौर पर इसका अर्थ है कि क्रेडिट रेटिंग जितनी बेहतर होगी, ऋण की शर्तें उतनी ही शिथिल होंगी। दूसरी ओर, यदि आपकी क्रेडिट रेटिंग खराब है, तो बैंक आपके ऋण के अनुरोध की शर्तों को बहुत कठोर या अस्वीकार भी कर सकता है।

प्रमुख क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां

भारत की प्रमुख क्रेडिट रेटिंग एजेंसी

भारत में मुख्यतः चार क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ काम कर रही हैं, जो निम्नलिखित हैं-

  • क्रिसिल (CRISIL): यह भारत की पहली क्रेडिट रेटिंग एजेंसी है, जिसने अपना परिचालन 1988 में शुरू किया।
  • इक्रा (ICRA): इस एजेंसी की स्थापना 1991 में एक स्वतंत्र और व्यावसायिक निवेश सूचना एवं क्रेडिट रेटिंग एजेंसी के रूप में अग्रणी वित्तीय संस्थानों, वाणिज्यिक बैंकों और वित्तीय कंपनियों द्वारा की गई।
  • केयर (CARE): इस रेटिंग एजेंसी ने अपना परिचालन 1993 में शुरू किया।
  • डीसीआर (DCR): इस क्रेडिट रेटिंग एजेंसी को 1996 में स्थापित किया गया।
  • सिबिल (CIBIL): यह 2000 में स्थापित भारत का पहला क्रेडिट सूचना ब्यूरो है जो कि उपभोक्ताआें और उधारकर्त्ताओं को क्रेडिट संबंधी सूचना प्रदान करता है।

विश्व की मुख्य क्रेडिट रेटिंग एजेंसी

  • फिच रेटिंग एजेंसीः इसकी स्थापना 1913 में जॉन नोल्सफिच ने की थी। फिच रेटिंग एजेंसी की प्रणाली को पूरे विश्व में मानक के तौर पर अपनाया गया है। यह यूनाइटेड किंगडम की रेटिंग एजेंसी है।
  • एस एण्ड पीः एस एण्ड पी अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग एजेंसी है।
  • मूडीजः जॉन मूडी ने 1909 में वित्तीय होल्डिंग कंपनी मूडीज कॉर्पोरेशन की स्थापना की। इसका क्रेडिट रेटिंग एजेंसी के रूप में परिचालन 1914 के बाद से हुआ।

क्रेडिट रेटिंग का महत्व

  • गौरतलब है कि 1980 के दशक के बाद से देश में वित्तीय प्रणाली अधिक नियंत्रण- मुक्त हो गई और भारतीय कंपनियां वैश्विक ऋण बाज़ारों से अधिकाधिक ऋण लेने लगी। यही वज़ह थी कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की राय या अनुमान अधिकाधिक प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण होते गए। क्रेडिट रेटिंग का महत्व निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है-
  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसिया निवेश से संबन्धित जोखिमों उजागर करके निवेशकों और उधार प्राप्त करता इकाइयों के बीच के सम्बन्धों का निर्धारण करती है।
  • निवेश को प्रोत्साहित करने में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती हैं। इन एजेंसियों द्वारा किसी देश की रेटिंग को कम करके बता ने से देश में विदेशी निवेश का वातावरण प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है। जबकि क्रेडिट रेटिंग में सुधार होने से देश के अंदर अधिक से अधिक पूंजी निवेश को आकर्षित किया जा सकता है।
  • संस्थागत निवेशक केवल उन्हीं प्रतिभूति बाज़ारों में निवेश करना बेहतर मानते है जिनकी क्रेडिट रेटिंग उच्च होती है।
  • बेहतर क्रेडिट रेटिंग देश में राजनैतिक स्थायित्व को भी बढ़ावा देती है क्योंकि सरकार का आर्थिक मोर्चे पर प्रदर्शन बेहतर होता है और विकास की संभावनाओं को बल मिलता है।

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से जुड़े विचारणीय मुद्दे

  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ किसी भी देश के वित्त एवं पूंजी बाजार की महत्वपूर्ण समीक्षक हैं, परंतु विकसित एवं विकासशील देशों में इनकी विफलताओं के कारण इन पर निवेश कों का भरोसा कम हुआ है।
  • विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्नः क्रेडिट रेटिंग एजेंसी द्वारा अच्छी रेटिंग दिये जाने के बावजूद कंपनियाँ बैंक बैंकरप्सी सूची में शामिल हो रही हैं जो उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठता है।
  • पारदर्शिता का अभावः ऐसा देखा गया है कि कंपनियाँ अपनी रेटिंग सुधारने के लिये क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को भुगतान करती हैं। इससे कंपनी को कागजी रूप से जोखिम सहन करने हेतु तो सक्षम पाया जाता है, परन्तु वास्तविक रूप से वे बाजार के जोखिम को उठाने में सक्षम नहीं होती हैं।
  • सटीक रेटिंग में समस्याः रेटिंग एजेन्सी द्वारा दी गई रेटिंग हमेशा सटीक हो, यह भी चिंता का विषय है क्योंकि कंपनियों के बारे में प्राप्त सूचना की प्रमाणिकता का कोई मानक निर्धारित नहीं है।
  • सॉवरन रेटिंग का संबंधः एक बात यह भी है कि विदेश से उधार जुटाने वाली कंपनी की रेटिंग उस कंपनी के देश की सॉवरन रेटिंग से जुड़ी होती है, लिहाजा अगर भारत में किसी कंपनी की रेटिंग एएए (AAA) हो तो भी भारत की सॉवरन रेटिंग Baa2 होने के कारण इंटरनेशनल लेवल पर उसकी रेटिंग कम हो जाएगी। यही हाल विदेशी कंपनियों के साथ भी है।
  • हितों के टकरावः आम राय यह है कि रेटिंग एजेंसियों के बिजनेस मॉडल से जुड़े हितों के टकराव के कारण रेटिंग मैकनिज्म की साख कम हुई है। रेटिंग एजेंसियों को वही कंपनियाँ पैसा देती हैं, जो उधार ले रही होती हैं। इसके चलते ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें कंपनी के प्रमोटर अनुकूल रेटिंग की जुगत भिड़ाते हैं। ए रेटिंग लायक कंपनियों को एए या इससे ऊंची रेटिंग दे दी जाती है। इसके अलावा रेटिंग एजेंसियां अपने रेवेन्यू मॉडल से भी प्रभावित होती हैं।
  • गारंटी नहीं: निवेशकों को यह समझना चाहिए कि क्रेडिट रेटिंग कोई गारंटी नहीं है, बल्कि रेटिंग एजेंसी की राय भर है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि निवेशकों को क्रेडिट रेटिंग को पवित्र नहीं मान लेना चाहिए।
  • रेटिंग का पेंचः भारत में एएए रेटिंग वाली ज्यादातर कंपनियां सरकारी क्षेत्र की हैं, जिनको उनमें सरकार की हिस्सेदारी के चलते अर्द्ध-सरकारी दर्जा हासिल है। दूसरे देशों में एएए रेटिंग वाली कंपनियां मुख्य रूप से प्राइवेट सेक्टर की हैं। इसके अलावा भारतीय रेटिंग एजेंसियां जिस पैमाने का इस्तेमाल करती हैं, वह रुपये में उधारी से जुड़ा है, जबकि इंटरनेशनल रेटिंग्स डॉलर या दूसरी विदेशी मुद्राओं में उधार से जुड़ी होती हैं। इन्हीं देसी कंपनियों को अगर वैश्विक मानक पर कसा जाए तो इनकी रेटिंग कम रहेगी। लिहाजा एएए रेटिंग वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज की रेटिंग इंटरनेशनल स्केल पर घटकर Baa2 रह जाती है।
  • मानकों में एकरूपता की कमीः भारत की सभी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी द्वारा रेटिंग के अलग-अलग मानक हैं जिससे निवेशक को निर्णय लेने में काफी समस्या होती है।
  • जवाबदेही की कमीः क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को पर्याप्त स्वतंत्रता एवं प्रशासनिक मजबूती नहीं दी गई है। बाहरी विशेषज्ञों द्वारा आन्तरिक विशेषज्ञों को अकसर हटा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ चूंकि किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं अतएव विश्वसनीयता की कमी इनके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा देती है।
  • निष्पक्षता का अभावः अभी भी इस तरह का कोई कानून नहीं बनाया गया है जिससे क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को सरकार अथवा दबाव समूह से मुक्त किया जा सके।

भारत की गिरती क्रेडिट का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

  • मूडीज़ दुनिया की तीसरी बड़ी रेटिेंग एजेंसी है जिसने भारत की रेटिंग को गिराया है। दो अन्य एजेंसियाँ फ़िच और स्टैंडर्ड एंड पूअर पहले ही ये रेटिंग गिरा चुकी थीं। इससे पहले 1998 में भारत की रेटिंग इस स्तर पर गिराई गई थी, जब भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाये थे। हालाँकि सामान्य तौर पर भारत सरकार विदेशी बाजारों से कर्ज नहीं लेती है इसलिए सन्दर्भ सरकार के क्रेडिट रेटिंग का ज्यादा महत्व नहीं है। लेकिन इसका दुष्प्रभाव अर्थव्यवस्था के अन्य घटकों पर पड़ता है।
  • रेटिंग कम होने से अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित नकारात्मक प्रभाव हो सकते है-
  • क्रेडिट रेटिंग गिरने का अर्थ यह है कि भारत सरकार विदेशी बाज़ारों या घरेलू बाज़ारों में ऋण लेने के लिए जारी की जाने वाली प्रतिभूतियों को कम भरोसेमंद माना जाएगा जिसके फलस्वरूप भारत में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • रेटिंग Baa3 कर दी है जिसे निवेश ग्रेड का सबसे निचला पायदान कहा जा सकता है। इसका अर्थ ये है कि भारत सरकार की तरफ से जारी होने वाले लंबी अवधि के बॉन्डो को जोखिम भरा मानकर उनमे निवेश नहीं किया जाएगा।
  • देश की क्रेडिट रेटिेंग गिरने के साथ ही देश की सभी कंपनियों की रेटिंग की अधिकतम सीमा भी वही हो जाती है। किसी भी रेटिंग एजेंसी के हिसाब में किसी भी निजी या सरकारी कंपनी की रेटिंग उस देश की संप्रभु रेटिंग से ऊपर नहीं हो सकती।
  • अगर रेटिंग इससे भी नीचे गिरती है तो भारत को ऋण मिलना बहुत कठिन हो जाएगा, यदि ऋण मिलता भी है तो यह सूदखोरों से मिलने वाले ऋण के समान होगा जिसमे ऋण पर ब्याज दर काफी उच्च होती है एवं इससे देश ऋण के जाल में फँसता चला जाएगा।
  • हालाँकि कम रेटिंग को ध्यान में रखते हुये यदि सरकार ने खर्च को रोकना शुरू कर दिया तो फिर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना बहुत मुश्किल होता जाएगा।
  • रेटिंग कम होने पर निवेश पर प्रभाव पड़ता है जोकि अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को प्रभावित करता है।

रेटिंग में सुधार के लिए अपनाए जा सकने वाले महत्वपूर्ण कदम

  • भारत को रेटिंग में होने वाली कमी को रोकने के बजाए उसमे सुधार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जाने की जरूरत है, इसके लिए उन प्रमुख चिंताओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिनको आधार बनाकर मूडीज ने रेटिंग को कम किया है।
  • कई अर्थशास्त्रियों और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का भी अनुमान है कि वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की अर्थव्यवस्था सिकुड़ जाएगी। केंद्र और राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा जीडीपी के 12% तक रहने की उम्मीद है। मूडीज के अनुसार 2020-21 में भारत के सार्वजनिक ऋण जीडीपी अनुपात 72% से बढ़कर 84% हो जाएगा।
  • इन परिस्थितियों को बदलने के लिए सरकार को सार्वजनिक ऋण को बढ़ाए बिना विवेकाधीन राजकोषीय प्रोत्साहन को बढ़ाने की आवश्यकता है, इसके लिए सरकार घाटे का मुद्रीकरण कर सकती है।
  • घाटे के मुद्रीकरण के लिए केंद्रीय बैंक आमतौर पर ट्रेजरी बिल खरीदकर सरकार को धन देता है। लेकिन केंद्रीय बैंक केवल इलेक्ट्रॉनिक अकाउंटिंग प्रविष्टि के माध्यम से भी ट्रेजरी के खाते धन हस्तांतरित कर सकता है। इस प्रकार विकास की चिंताओं को दूर करते हुए ऋण जीडीपी अनुपात को नियंत्रण में रखा जा सकता है।
  • सरकार को आर्थिक सुधारों के साथ GST में सुधारों की ओर बढ़ना चाहिये
  • सरकार को विनिवेश के लक्ष्यों को पूरा करना चाहिये जो सरकार को अल्पकालीन लाभ देगी

आगे की राह

  • निःसन्देह क्रेडिट रेटिंग के घटने से अर्थव्यवस्था में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, लेकिन यह अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला एकमात्र कारण नहीं है। राजनीतिक अस्थायित्व, नीतिगत विफलताएं और महामारी जैसी परिस्थितियाँ भी अर्थव्यवस्था में मकारात्मक प्रभाव डालती है। हालांकि भारत के लिए सुखद खबर है जिसके तहत फिच और एसएंडपी ने अगले दो साल में यानी 2022 तक भारत की विकास दर 8.5% से 9.5% तक होने की भविष्यवाणी की हैं। एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स के अनुसार लंबे समय की रेटिंग पर भारत का परिदृश्य स्थिर है जो यह उम्मीद देती है कि कोविड-19 महामारी पर लगाम लगने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था सुधरेगी और देश अपनी मजबूत स्थिति को बरकरार रखेगा। इसलिए सरकार को क्रेडिट रेटिंग घटने से परेशान होने के बजाय आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन को बेहतर करना चाहिए। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घोषित किया गया 20 लाख करोड़ के आर्थिक प्रोत्साहन का बेहतर इस्तेमाल भारत की संप्रभु रेटिंग मे सुधार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

सामान्य अध्ययन पेपर-3

  • अर्थव्यवस्था