भारत और खाड़ी देशों के बीच आतंकवाद-रोधी भागीदारी का विकास - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


भारत और खाड़ी देशों के बीच आतंकवाद-रोधी भागीदारी का विकास - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


सन्दर्भ:-

  • पिछले दो दशकों से भारत और खाड़ी के देशों के बीच संबंधों की यथास्थिति में बदलाव हो रहे हैं, क्योंकि दोनों ओर से सहयोग के क्षेत्रों में विविधता आई है।

भारत और खाड़ी के देशों के बीच बढ़ते संबंधों की पृष्ठभूमि

आर्थिक, राजनितिक और सांस्कृतिक

  • ऐतिहासिक रूप से, खाड़ी और भारत के संबंधों का मुख्य आधार ऊर्जा विनिमय, प्रवासी आबादी और उनके द्वारा प्रेषित विदेशी मुद्रा है। साथ ही भारत की बड़ी मुस्लिम आबादी भी इस क्षेत्र के साथ भारत के संबंध का एक महत्वपूर्ण कारक रही है।
  • 2014 में जब भारत ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने के लिए संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली (यूएनजीए) में रेजोल्यूशन ड्राफ्ट पेश किया तो संयुक्त राष्ट्र के 177 देश इस प्रस्ताव के समर्थन में आ गए, इनमें इस्लामिक देश ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया एवं सऊदी अरब ने इसे बिना किसी बहस में पड़े अपनाया और खेल का दर्जा दिया।
  • संयुक्त अरब अमीरात द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'ऑर्डर ऑफ ज़ायेद' से नवाज़ा जाना और अबू धाबी में हिन्दी भाषा अदालतों में इस्तेमाल होने वाली तीसरी आधिकारिक भाषा बनाया जाना भारत के खाड़ी देशों के साथ बढ़ते संबंधों का उदाहारण है।
  • दिवंगत विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा आईओसी के विदेश मंत्रियों की परिषद (सीएफएम) के 46वीं सत्र के उद्घाटन सत्र में 'गेस्ट ऑफ़ ऑनर' के तौर पर हिस्सा लिया जाना खाड़ी के देशों के बीच संबंधों की में निर्णायक मोड़ था क्योंकि आईओसी की सभा को संबोधित करने वाली पहली भारतीय मंत्री हैं। इस उपलब्धि को भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और पाकिस्तान को बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि 57 सदस्यों वाले OIC के मंच पर भारत पिछले करीब 50 वर्षों के इतिहास में पहली बार शामिल हुआ है।
  • वर्तमान में, भारत कच्चे तेल का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा आयातक है, और कच्चे तेल की अपनी आवश्यकताओं का 60 प्रतिशत खाड़ी देशों से ही पूरा करता है।
  • इस क्षेत्र से भारत के बड़े राजनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। इस के क्षेत्रीय संगठन यानी गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल के देश, भारत के सबसे बड़े कारोबारी साथी हैं। यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार देश है। इस इलाक़े में 75 लाख से ज़्यादा भारतीय काम करते हैं, जो हर साल क़रीब 55 अरब डॉलर की रक़म स्वदेश भेजते हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार रेमिटेन्स के रूप में आने वाली कुल विदेशी मुद्रा का 53.5% इन्ही खाड़ी देशों से ही आता है।
  • स्वच्छ उर्जा के दिशा में वैश्विक प्रयासों को देखते हुए और तेल पर अर्थवयवस्था की निर्भरता को कम करने हेतु सऊदी अरब ने भारत की जीडीपी में बढ़ती आर्थिक संभावनाओं को देखते हुए पेट्रोकेमिकल, इन्फ्रास्ट्रक्चर और माइनिंग समेत कई क्षेत्रों में निवेश की योजना बनाई है।

सुरक्षा और रणनीतिक सम्बन्ध

  • 2000 के दशक की शुरुआत से भारत ने खाड़ी देशों के साथ साझा हितों और सुरक्षा चुनौतियों से संबंधित एक रणनीतिक साझेदारी कायम करने के लिए बातचीत शुरू की। उस समय लगभग एक दशक तक अरब सागर और हिंद महासागर के साझा जल निकाय में तस्करी और अवैध व्यापार, समुद्री डकैती जैसी चुनौतियाँ अत्यधिक हावी थीं।
  • खाड़ी और भारत की नौसेनाओं के साथ-साथ वायु सेना और थल सेना के बीच रक्षा सहयोग को मजबूती प्रदान करने के लिए नियमित रूप से संयुक्त अभ्यासों के आयोजन के साथ खाड़ी देशों के रक्षा कर्मियों द्वारा प्रशिक्षण के लिए भारतीय रक्षा अकादमियों और संस्थानों का दौरा किया जाता है।
  • भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच होने वाले वायु सेनाओं के युद्धाभ्यास डेजर्ट ईगल की शुरुआत 2008 में हुई थी। भारत के लिए यूएई की भूमिका केवल तेल आपूर्ति और प्रवासी भारतीयों की आबादी तक ही सीमित नहीं है। वो हमारे यहां के संगठित अपराध, तस्करी और खास तौर पर आतंकवाद विरोधी मुहिम में भी अहम साझेदार है। इसके अलावा 2011 के एक समझौते के तहत दोनों देश आपसी सुरक्षा सहयोग के लिए काम कर रहे हैं।
  • भारतीय सेना और ओमान की शाही सेना के बीच संयुक्त सैन्याभ्यास अल-नगाह का आयोजन होता है। भारत और सऊदी अरब के बीच 2018 में पहला द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास हुआ और साथ ही सऊदी अरब से सेना के जवान भारत में तीन साल के प्रशिक्षण के लिए 2018 में नेशनल डिफेंस एकेडमी(NDA) में आए।

आतंकवाद-रोधी संबंधों का विकास

  • भारत और खाड़ी देश दोनों ही आतंकवादी समूहों या चरमपंथियों से उत्पन्न हिंसा के शिकार हैं, चाहे फिर वो चरमपंथ स्थानीय हो या किसी बाह्य राज्य द्वारा प्रायोजित। इसलिए, बढ़ते रक्षा संबंधों को स्वाभाविक रूप से आतंकवाद, कट्टरता को रोकने के लिए सहयोग को मजबूत करने की दिशा में विकसित किया जाना चाहिए।
  • पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सऊदी अरब के किंग अब्दुल्ला बिन अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद के बीच जनवरी 2006 में सऊदी अरब के राजा की नई दिल्ली की यात्रा के दौरान 'दिल्ली घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर हुये। इसके बाद 2010 में भारतीय प्रधानमंत्री की सऊदी अरब की यात्रा के दौरान 'रियाद घोषणापत्र' पर पारस्परिक हस्ताक्षर किए गए। इससे दोनों देशों के बीच साझेदारी की यथास्थिति में बदलाव आया।
  • इन घोषणाओं में आतंकवाद के खतरे को खत्म करने के लिए द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक सहयोग को तेज और समन्वित करने के लिए "आतंकवादी गतिविधियों से संबंधित सूचनाओं के आदान-प्रदान में सहयोग बढ़ाने" और "प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर करने और सजायाफ्ता मुजरिमों के स्थानांतरण के समझौतों” के क्रियान्वयन की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
  • अधिकांश खाड़ी देश, पाकिस्तान के साथ अपने पारंपरिक सौहार्दपूर्ण संबंध के बावजूद, आतंकवाद और पाकिस्तान में पनपने वाले आतंक के गैर-राज्य कारकों के खिलाफ भारत के रुख का अधिक मुखरता से समर्थन करते हैं।
  • वे स्पष्ट रूप से पाकिस्तान का नाम लिए बिना आतंक के खिलाफ भारत का समर्थन करने के लिए हमेशा आगे आते रहे हैं। उदाहरण के लिए, फरवरी 2018 में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की ओमान यात्रा के दौरान, दोनों देश ऐसी सभी संस्थाओं के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने के लिए सहमत हुए, जो आतंकवाद का समर्थन करती हैं और आतंकवाद का नीतिगत साधन के रूप में उपयोग करती हैं। फरवरी 2019 में पुलवामा हमले के 4 दिन बाद ही सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की भारत यात्रा के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि “आतंकवाद के खतरे से प्रभावी रूप से निपटने के लिए हम सहमत हैं, ऐसे देश जो किसी भी रूप में आतंक का समर्थन करते हैं उनके ऊपर दबाव बनाने की जरूरत है।”
  • भारत खाड़ी देशों से आतंकवादी गतिविधियों अथवा अन्य आरोपों में वांछित व्यक्तियों को प्रत्यर्पित करने में भी सफल रहा है, इनमे से अधिकांश प्रत्यर्पण के मामले संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से हैं।
  • सऊदी अरब और यूएई के साथ भारत के बढ़ते संबंधों ने उन्हें न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि रक्षा, सुरक्षा, संस्कृति और शिक्षा जैसे अन्य क्षेत्रों में भी सबसे विश्वसनीय भागीदार बना दिया है।
  • भारत की रक्षा सेवाओं की सभी शाखाएँ खाड़ी क्षेत्र के साथ पारस्परिक संबंघों में प्रतिभागी हैं। सभी खाड़ी राज्य भारतीय नौसेना द्वारा आयोजित हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी (IONS) के सदस्य हैं, जिसे 2008 में हिंद महासागर के नौसेना प्रमुखों के एक द्विवार्षिक फोरम के रूप में स्थापित किया गया था।
  • खाड़ी देश भी भारतीय नौसेना के बहुपक्षीय वार्षिक सैन्य अभ्यास का मिलन का हिस्सा हैं। ओमान का दुक्म बंदरगाह भी भारत के लिए भी खुला है जो हिंद महासागर के सबसे गहरे समुद्री बन्दरगाहों में से एक है।

चुनौतियाँ

  • ये इलाक़ा बहुत उठा-पटक वाला यानि राजनीतिक रूप से अस्थिर है। इस क्षेत्र से भारत के बड़े राजनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। इस के क्षेत्रीय संगठन यानी गल्फ़ को- ऑपरेशन काउंसिल (GCC) के देश भारत के बड़े कारोबारी साझेदारों में से हैं। इसलिए भारत को खाड़ी देशों के साथ ऐसा कूटिनीतिक संबंध बनाना चाहिए जिससे भारत के आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक हित को सुनिश्चित किया जा सके।
  • खाड़ी क्षेत्र राजनीतिक और सैन्य अस्थिरता से भरा हुआ है, और भारत को हमेशा इस विषम परिस्थितियों के लिए तैयार रहना होगा।
  • सऊदी अरब और ईरान के बीच शक्ति-संतुलन को लेकर बढ़ती तनातनी और गल्फ को- ऑपरेशन काउंसिल से क़तर के बहिष्कार ने, भारत को कूटनीतिक रूप से सभी पक्षों के साथ कूटनीतिक संबंधों को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है, भारत स्वयं के हित सुरक्षित रख सके।
  • आतंक का वित्तपोषण: प्रवासियों द्वारा भारत भेजी जाने वाली कुल विदेशी मुद्रा का का आधा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। भारत को हस्तांतरित धन की एक महत्वपूर्ण राशि को अनौपचारिक हवाला प्रणाली के माध्यम से भेजा जाता है। आतंकवादी समूह इंडियन मुजाहिदीन के मुख्य वित्त अधिकारी, अब्दुल वाहिद सिदीबप्पा द्वारा हवाला प्रणाली का इस्तेमाल करके यूएई से भारत में धन स्थानांतरित किया गया। इसी तरह, लश्कर-ए- तैयबा ने 26/11 के मुंबई हमले को अंजाम देने के लिए खाड़ी देशों से हवाला के माध्यम से धन प्राप्त किया था।
  • यात्रा मार्ग: खाड़ी देशों का उपयोग सीरिया, इराक और अफगानिस्तान जैसे संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों की यात्रा करने वाले व्यक्तियों के लिए पारगमन बिंदु के रूप में भी किया जाता रहा है। 2016 में 21 केरलवासियों (आठ नाबालिगों सहित) ने आईएस में शामिल होने के लिए अफगानिस्तान की यात्रा की थी, जो संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन और ओमान के शहरों से होकर गुजरे थे।
  • वांछित अपराधियों की शरण-स्थली: भारत के लिए यह भी एक चिंता का विषय है कि खाड़ी देशों का उपयोग देश के विभिन्न आपराधिक व्यक्तियों द्वारा के द्वारा शरण- स्थली के रूप में किया जाता है। इन व्यक्तियों में दाऊद इब्राहिम प्रमुख है, जो 1993 के मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड था और 26/11 के हमले में भी इसकी संलिप्तता थी।
  • हाल ही में तिरुवनंतपुरम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक राजनयिक के नाम वाले सामान से सीमा शुल्क अधिकारियों ने 30 किलोग्राम सोना बरामद किया था। ये राजनयिक बैग संयुक्त अरब अमीरात के वाणिज्य दूतावास के पते पर जाने वाला था। यह घटना संगठित अपराध में नॉन स्टेट एक्टर की भूमिका को पुनः केंद्र बिंदु में ला दिया है जिसमे राजनयिक चैनल का इस्तेमाल काफी चिंताजनक है।

आतंकवाद-रोधी संबंधों को सुदृढ़ करने के महत्वपूर्ण उपाय

  • ऐसे कई अन्य रास्ते हैं जिनके माध्यम से भारत और खाड़ी राष्ट्र अपने आतंकवाद विरोधी सहयोग का विस्तार कर सकते हैं-
  • भारत को आतंकवादी हमलों को बाधित करने के लिए अपनी साइबर सुरक्षा क्षमताओं को और अधिक बढ़ाना चाहिए। हालांकि भारत ने चरमपंथ और कट्टरता को रोकने के लिए इन साइबर क्षमताओं का पहले भी बेहतर उपयोग किया है। 2014 में ऑपरेशन चक्रव्यूह के तहत, भारतीय खुफिया विभाग ने इस्लामिक स्टेट के ऑनलाइन भर्तीकर्ताओं की भूमिका कि पहचान करके लगभग 3,000 युवाओं को चरमपंथी गतिविधियों में भाग लेने से रोका था। इसीप्रकार 2017 में ऑपरेशन पिजन होल के तहत स्थानीय समुदायों और मौलवियों के सहयोग से 800 से अधिक युवाओं को कट्टरपंथी होने से बचाया गया, जो अतिसंवेदनशील विषय-वस्तु के ऑनलाइन प्रचार से प्रभावित हो रहे थे।
  • इस तरह के ऑपरेशनों की सफलता के लिए भारत को खाड़ी देशों के साथ अपनी विशेषज्ञता साझा करनी चाहिए और वहाँ के स्थानीय सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण के लिए के लिए अपने साइबर विशेषज्ञों को भेजना चाहिए। संयुक्त साइबर प्रशिक्षण अभ्यास साथ- साथ आतंक-रोधी कार्यशालाओं के आयोजन से भारत और खाड़ी देशों के संबंधों को उत्कृष्टता प्रदान की जा सकती है।
  • भारत द्वारा खाड़ी सहयोग परिषद के सभी सदस्यों के साथ संयुक्त आतंकवाद विरोधी सम्मेलन को आयोजित करना भी खाड़ी देशों के आतंक-रोधी सम्बन्धों के विकास की दिशा में एक प्रशंसनीय कदम होगा।
  • आतंकवाद प्रतिक्रिया गतिविधियों को समन्वित करने का एक महत्वपूर्ण तरीका संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों को आयोजित किया जाना भी है। भारत को खाड़ी देशों के साथ द्विपक्षीय सैन्य अभ्यासों के साथ-साथ बहुपक्षीय सैन्य अभ्यास भी करना चाहिए।
  • शहरी आतंकवाद की मौजूदा प्रवृत्ति और सुरक्षा बलों की इसे रोकने में असमर्थता के कारण शहरी-आतंक से निपटने के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता है। चूंकि भारत और खड़ी देश दोनों ही शहरी आतंकवाद की इस समस्या से ग्रस्त हैं, अतः इसे भी सहयोग के क्षेत्र में शामिल किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • भारत और खाड़ी देशों ने आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए साझा प्रयास किए हैं। लेकिन IS की हार और अल-कायदा की क्षमताओं में गिरावट के बावजूद, इस सहयोग को बढ़ाने को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है, क्योंकि निकट भविष्य में आतंकवाद का खतरा बहुत कम होने की संभावना नहीं है। जिस तरह के आपसी विश्वास और मजबूत आर्थिक संबंध भारत और इसके खाड़ी सहयोगियों ने वर्षों से बनाए हैं उसे देखते हुए इस आतंक-रोधी सहयोग को बढ़ावा मिलने के भी पर्याप्त अवसर है। इसके अलावा भारत द्वारा कुटनीतिक प्रयासों को बढाया जाना चाहिए जिससे उसे OIC में पर्यवेक्षक का दर्जा मिले और वह पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर अंकुश लगते हुए अन्य आतंकवाद संगठनो पर संयुक्त कार्यवाई के जरिये दवाब बना सके।
अभ्यास प्रश्न
  • भारत और खाड़ी देशों के बीच के सम्बन्धों की मजबूती भारत की आंतरिक सुरक्षा में कितना सहायक है? चर्चा कीजिए।