अमेरिका में बढ़ता नस्लवाद : एक अवलोकन - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


अमेरिका में बढ़ता नस्लवाद : एक अवलोकन - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चर्चा का कारण

  • हाल ही में अमेरिका के मिनियापॉलिस शहर में अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिक जॉर्ज फ्रलॉयड की पुलिस हिरासत में मृत्यु के बाद पूरी दुनिया में नस्लवाद के ख़िलाफ़ आवाज उठ रही है। गौरतलब है कि नस्लवाद का मुद्दा भले ही सदियों पुराना हो लेकिन यह तब जितना प्रासंगिक था आज भी उतना ही है।
  • नस्लवाद के ख़िलाफ़ प्रदर्शन अमरीका से निकलकर लंदन, बर्लिन और ऑकलैंड जैसे शहरों में पहुंच गया। यहां ऐसे लोगों की मूर्तियों को, जिन्होंने उपनिवेशवाद या अश्वेतों की गुलामी को किसी भी तरह समर्थन दिया था, हटाने की मांगें उठ रही हैं।

नस्लवाद क्या है ?

  • नस्लवाद या नृजातिवाद (रेसिज्म) वह सिद्धान्त या अवधारणा है, जो किसी एक नस्ल को दूसरी से श्रेष्ठतर या निम्नतर मानती है। नस्लवादी लोगों के बीच जैविक अंतर की सामाजिक धारणाओं में आधारित भेदभाव और पूर्वाग्रह दोनों होते हैं।

नस्लभेद के खिलाफ संघर्ष का लंबा इतिहास

  • अमरीका में अगर नस्लभेद का लंबा इतिहास रहा है तो इसके ख़िलाफ़ लड़ाई का भी लंबा इतिहास है। अमरीका में हर समुदाय के लोगों ने नस्लभेद के खिलाफ समय-समय लड़ाई लड़ी है।
  • अमरीका में नस्लवाद की शुरुआत औपनिवेशिक दौर से हुई थी। गोरे अमरीकियों के अलावा सभी के साथ भेदभाव होता रहा। 17वीं सदी की शुरुआत में अफ्रीका से लोगों को गुलाम बनाकर अमरीका लाने का सिलसिला शुरू हुआ और अगले लगभग दो सौ सालों तक वस्तुओं की तरह उनकी खरीद-फरोख्त हुई।
  • 19वीं सदी के मध्य तक हवा बदलने लगी और गोरे लोग भी बड़ी संख्या में दास प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने लगे। 1861 में गृहयुद्ध छिड़ने की यह भी वजह थी। 1865 में राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने युद्ध के दौरान ही दास प्रथा को खत्म किया।
  • इसके बाद फिर लगातार संविधान में संशोधन होते रहे और धीरे-धीरे अफ्रीकी-अमरीकियों को उनके अधिकार दिए गए, लेकिन 20वीं सदी तक संविधान के प्रावधानों की अनदेखी होती रही और अफ्रीकी-अमरीकियों का संघर्ष भी जारी रहा।
  • 1954 में नागरिक अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन तेज हुआ। भेदभाव के खिलाफ समाज के कई हिस्सों के लोग आगे आए। सिविल राइट्स मूवमेंट खत्म होने के 40 साल बाद 2008 में जब बराक ओबामा अमरीका के राष्ट्रपति पद पर पहुंचने वाले पहले अफ्रीकी-अमरीकी बने, तब उम्मीद जताई जाने लगी थी कि अब नस्लवाद शायद खत्म हो जाएगा। मगर ऐसा नहीं हो पाया है।

अमेरिका में नस्लभेद उभरने के कारण

  • प्रायः देखा गया है कि अमरीका में सांस्कृतिक, आर्थिक और बुनियादी तौर पर नस्लभेद नजर आ जाता है। अमेरिकी विश्लेषकों का मानना है कि अफ्रीकी-अमरीकी समुदाय में अपराध ज्यादा है और पुलिस इनके खिलाफ सख्ती से कार्रवाई करती है। पुलिस की फायरिंग में सबसे ज्यादा अफ्रीकी-अमरीकी ही मरते हैं। कोर्ट केसों में भी दिखता है कि जब कम उम्र का अफ्रीकी-अमरीकी बच्चा कोई अपराध करता है तो उसे सख्त सजा दी जाती है और अगर गोरा ऐसा अपराध करे तो पहली-दूसरी बार उसे माफी दे दी जाती है ।
  • जानकारों का मानना है कि अमेरिका में नस्लभेदी सोच को मौजूदा प्रशासन से हवा मिल रही है। ट्रंप प्रशासन में कुछ लोग ऐसे हैं जिनका संबंध वाइट नैशनलिज्म से है। साथ ही अमरीका में नस्लीय अनुपात तेजी से बदलने के कारण गोरे समुदाय में अपना वर्चस्व खोने का डर भी देखा जा रहा है। अमेरिका में नस्लीय अनुपात तेजी से बदल रहा है। अंदाजा लगाया गया है कि 2050 तक गोरा समुदाय अल्पसंख्यक बन जाएगा, जो अभी 60 प्रतिशत है। इसलिए वो लोग डर रहे हैं कि हमारी ताकत और आर्थिक प्रभाव खत्म हो जाएगी।
  • अमेरिका में धार्मिक समुदायों में देखें तो सबसे अमीर और पढ़ा-लिखा समुदाय हिंदू समुदाय है। राष्ट्रीयता के आधार पर भारतीय इस मामले में आगे हैं, फिर चीनी। गोरा समुदाय ना तो सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा है और ना ही सबसे अमीर है। उनके पास जो संपत्ति है, वह सिर्फ विरासत में मिली संपत्ति है, ऐसे में गोरा समुदाय डर रहा है।
  • अमरीका के अंदर भी आबादी इधर से उधर हो रही है। गोरे लोग शहरों से उपनगरीय इलाकों की तरफ जा रहे हैं वहीं अफ्रीकी-अमरीकी और अन्य आर्थिक रूप से पिछड़े अल्पसंख्यक शहरों का रुख कर रहे हैं। इसी तरह से गोरे लोग कैलिफोर्निया से अन्य राज्यों में जा रहे हैं।

जॉर्ज फ्रलॉयड के समर्थन में प्रदर्शन और मूर्तियों का तोड़ा जाना

  • इंग्लैंड में नस्लवाद का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने 17वीं सदी में गुलामों की खरीद-फरोख्त करने वाले एक सौदाग, एडवर्ड कोलस्टन की मूर्ति गिरा दी है। प्रदर्शनकारियों ने इसे तुरंत एक बंदरगाह के गहरे पानी में डुबो दिया। माना जाता है कि एडवर्ड कोलस्टन अपने जहाजों में 80 हजार पुरुष, महिलाओं और बच्चों को अफ्रीका से ले गए थे।
  • स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबर्ग में गुलामी (दास प्रथा) को खत्म करने के लिए देर से कदम उठाने वाले एक राजनीतिक नेता हेनरी डनडेस की याद में बने स्मारक पर लोगों ने स्प्रे-पेंट कर जॉर्ज फ्रलॉयड और बीएलएम (ब्लैक लाइव्स मैटर्स) जैसे नारे लिख दिए। एडिनबर्ग के सेंट एंडर्ड्ढू स्कवेयर पर 150 फीट (46 मीटर) लंबे मेलविले स्मारक को 1823 में हेनरी डनडेस की याद में बनाया गया था। डनडेस 18वीं और 19वीं सदी में देश के सबसे प्रभावशाली राजनेताओं में से एक थे और उन्हें श्बेताज बादशाहश् भी कहा जाता था। कहा जाता है कि उन्होंने गुलामी खत्म करने के लिए काफी धीमे कदम उठाए थे। अगर उन्होंने दास प्रथा खत्म करने के लिए लाए गए संशोधन बिल को लेकर सक्रियता दिखाई होती तो यह प्रथा 1792 में ही खत्म हो जाती।
  • बेल्जियम में लोग सबसे लंबे समय तक देश पर शासन करने वाले राजा लियोपोल्ड -2 की मूर्तियों को तोड़ने की मांग कर रहे हैं। इसके समर्थन में ऑनलाइन याचिकाएं शेयर की जा रही हैं और इन पर हजारों लोग दस्तख्त कर चुके हैं। इस मामले में कुछ नस्लवाद विरोधी प्रदर्शनकारियों ने सीधी कार्रवाई की है। यहां के घेंट शहर में औपनिवेशिक काल के इस राजा की मूर्ति पर लाल रंग की पेंट पोत दी गई। सिर पर कपड़ा बांध दिया गया, जिसमें लिखा था, ष्आई कांट ब्रीदष्। किंग लियोपोल्ड-2 ने बेल्जियम में 1865 से लेकर 1909 तक शासन किया था। लेकिन वह कोंगो गणराज्य में किए अपने अत्याचार की वजह से कुख्यात रहे। यूरोप के सबसे छोटे देश के सम्राट ने 1885 से 1908 के बीच कोंगो गणराज्य (डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कोंगो) को अपना निजी उपनिवेश बना लिया। पुराने वत्तफ़ में इसे कोंगो फ्री स्टेट के नाम से जाना जाता था। उन्होंने इस देश को श्रमिकों के एक विशाल शिविर में बदल दिया और रबड़ के कारोबार से अकूत संपत्ति कमाई। जो लोग श्रमिकों की गुलामी के खिलाफ आवाज उठाते थे उन्हें अक्सर गोली मार दी जाती थी।
  • लंदन में पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया और इस पर प्रदर्शनकारियों ने नस्लवादी लिख दिया। दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटेन को जीत दिलाने के लिए चर्चिल की सराहना की जाती है। ब्रिटिश सरकार की वेबसाइट में उन्हें ष्एक प्रेरक राजनीतिज्ञ, लेखक, वत्तफ़ा और नेताष् कहा गया है। 2002 में बीबीसी के एक सर्वे में उन्हें अब तक का सबसे महान ब्रिटिश शख्स बताया गया था। लेकिन कुछ लोगों के लिए वह विवादास्पद शख्स हैं। नस्ल के बारे में उनके विचारों की वजह से लोग उन्हें विवादित व्यक्ति मानते हैं।

आगे की राह

  • नस्लवाद यानी अपनी नस्ल या जाति को किसी दूसरी से बेहतर समझना, यही सोच पूर्व ग्रहों और भेदभाव यानी नस्लभेद को जन्म देती है। इंसान-इंसान के बीच फर्क पैदा करने वाली इस सोच के आरोप आज अमरीकी राष्ट्रपति पर लग रहे हैं, मगर असल में यह सोच पूरी दुनिया में अलग-अलग रूपों मे मौजूद है। और इसे खत्म करने के लिए अभी बहुत प्रयास करने होंगे।
  • साथ ही दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जातिवादी व अतिवादी विचारधाराओं पर आधारित राष्ट्रवाद का प्रसार हो रहा है, जिसे रोकने के लिए संबन्धित सरकारों को तत्काल कार्यवाही करने की आवश्यकता है।
  • इसके अतिरिक्त विभिन्न देशों में प्रवासियों, शरणार्थियों, अश्वेतों खासकर अफ्रीकी मूल के लोगों के प्रति हिंसात्मक घटनाएँ भी बढ़ रही हैं। ऐसे परिदृश्य में अंतर्राष्ट्रीय नस्लीय भेदभाव उन्मूलन संधि जैसे उपायों को अपनाने की आवश्यकता है।
  • नस्लीय भेदभाव के हर स्वरूप के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि के 1969 में लागू होने के 51 साल बाद भी यह चुनौती बनी हुई है। नस्लवाद के अंत के लिए और सभी के लिए समानता और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए- असहिष्णुता और भेदभाव से निपटना सिर्फ देशों या प्रशासनिक अधिकारियों की ही जिम्मेदारी नहीं है बल्कि हर व्यक्ति को इसमें अपनी भूमिका अदा करनी होगी।

सामान्य अध्ययन पेपर-1

  • विश्व के इतिहास में 18 वीं सदी की घटनाएं तथा औद्योगिक क्रांति, विश्व राष्ट्रीय सीमाओं का पुनः सीमांकन, उपनिवेशवाद, उपनिवेशवाद की समाप्ति, राजनीतिक दर्शनशास्त्र जैसे साम्यवाद, पूंजीवाद, समाजवाद, आदि, उनके रूप और समाज पर उनका प्रभाव शामिल होंगे।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • नस्लीय भेदभाव के हर स्वरूप के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि के 1969 में लागू होने के बाद भी यह चुनौती बनी हुई है। चर्चा कीजिये।

लेख को पीडीएफ में डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें


© www.dhyeyaias.com

<< मुख्य पृष्ठ पर वापस जाने के लिये यहां क्लिक करें