महामारी के दौर में मानव केंद्रित विकास मॉडल - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


महामारी के दौर में मानव केंद्रित विकास मॉडल - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चर्चा का कारण

  • कोरोना वायरस महामारी (Coronavirus pandemic) के कारण उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के श्रमिकों को गृह राज्य में वापस लाने के लिए दृढ़ संकल्प हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रदेश सरकार ने स्किल मैपिंग से हर हाथ को काम और हर घर में रोजगार उपलब्ध कराने की कार्रवाई को आगे बढ़ाया है। मुख्यमंत्री के अनुसार वह नहीं चाहते हैं कि भविष्य में उत्तर प्रदेश के नागरिक पलायन करें।
  • इसके अलावा, उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि वह पड़ोसी राज्यों (हरियाणा, मध्य प्रदेश, इत्यादि) के साथ प्रतिस्पर्धा करेगा, जो कि नौकरियों को बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। इस प्रकार कहा
    जा सकता है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को एक अच्छी योजना की जरूरत है। इस मामले में जानकारों का मानना है कि राज्य सरकारों को आधुनिक सिंगापुर के संस्थापक ली कुआन यू और राष्ट्रपिता
    महात्मा गांधी से कुछ सबक लेना चाहिये, जिन्होंने मानव-केंद्रित विकास मॉडल पर बल दिया था।

परिचय

  • प्रत्येक हाथ को काम हर परिवार को रोजगार देने के मिशन के तहत राज्य सरकारों ने कामगारों से जुड़ी नीतियों और नियमों में व्यापक सुधार सुनिश्चित किया है। जानकारों का मानना है कि समाज की कमजोर कड़ी का जितना विकास होगा वही वास्तविक विकास है, इसे मानव केन्द्रित विकास कहा जा सकता है।

सिंगापुर के विकास से सबक

  • मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच 707 वर्ग किलोमीटर में फैला सिंगापुर एक छोटा सा देश है जिसकी स्थापना 1965 में हुई थी। आधुनिक सिंगापुर के जनक कहे जाने वाले और इस देश के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआन यू ने एक छोटे से बंदरगाह को दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी केंद्रों में शुमार करा दिया। जानकार मानते हैं कि उस दौर में जब सिंगापुर मलेरिया की बीमारी के लिए बदनाम था, ये ली ही थे जिन्होंने इस छोटे से मुल्क को दुनिया के नक्शे पर एक कामयाब देश के तौर पर स्थापित किया।
  • ली ने देश में कारोबार की बेहतरीन परिस्थितियां बनाने के लिए विपक्षियों और मीडिया पर कड़ा नियंत्रण रखा। गौरतलब है कि सिंगापुर के पास तेल या खनिज जैसे कोई प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, जिसे वह
    अपने पश्चिम के देशों को बेच सकता था। साथ ही सिंगापुर के पास न तो खेती योग्य जमीन थी और न ही खनिज संपदा। ज्यादातर जनसंख्या भी झुग्गी बस्तियों में रहा करती थी।
  • वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1965 में सिंगापुर की प्रति व्यक्ति जीडीपी 516 अमरीकी डॉलर थी और करीब आधी जनसंख्या अशिक्षित थी। लेकिन इसके बावजूद सिंगापुर ने 1960 से 1980 तक प्रति
    व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद में 15 गुना की वृद्धि करने जैसा कीर्तिमान बनाया है।
  • यही नहीं, भ्रष्टाचार की समस्या से निपटने के लिए सिंगापुर में ऐसे कड़े कानून बनाए गए जिनकी वजह से भ्रष्टाचार में कमी देखी गई। सिंगापुर में शानदार सड़कें और हाइवे निर्माण पर जोर दिया गया जिससे आधारभूत ढांचे का विकास किया जा सके। इसके अतिरिक्त ली कुआन यी की सरकार ने शुरुआत से ही सिंगापुर में रहने वाली मिश्रित आबादी को शिक्षित करने और मानव संसाधन पर पैसा खर्च किया। ली ने अमेरिका, यूरोप और जापान की कंपनियों को सिंगापुर में विनिर्माण सुविधाएं स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया। आसियान देशों में कम लागत वाले श्रम के बड़े पूल से कंपनियां आकर्षित हुईं। इन देशों में, सिंगापुर अपने स्थान के लिए सबसे आकर्षक था। ली चाहते थे कि सिंगापुर में मजदूरी बढ़े, ताकि प्रति व्यक्ति आय बढ़े। इसलिए, वह चाहते थे कि कंपनियां सिंगापुर के लोगों को उच्च मूल्य वाले काम करने के लिए प्रशिक्षित करें।
  • सिंगापुर की सूरत बदलने में इसकी भौगोलिक स्थिति का भी एक बड़ा योगदान है। ये देश मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित है जहां से दुनिया का 40 फीसदी समुद्री व्यापार होकर गुजरता है जिससे इस देश को भारी कमाई होती है। इसकी 190 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा पर कई गहरे पानी वाले बंदरगाह हैं।

गांधीवादी अर्थशास्त्र

  • उत्तर प्रदेश जैसे राज्य सिंगापुर की तुलना में अधिक जटिल हैं। सिंगापुर लगभग 6 मिलियन नागरिकों वाला एक शहर है, जबकि 200 मिलियन से अधिक की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में दर्जनों शहर और हजारों गाँव हैं। प्रवासी भारत के शहरों से गांवों में वापस लौट रहे हैं और वे एक ऐसी दुनिया में लौट रहे हैं जिसे गांधी जी अच्छी तरह से जानते थे।
  • गांधी जी ने कहा था कि जब तक भारत के गांवों में लोगों को आर्थिक और सामाजिक आजादी नहीं मिलेगी तब तक, भारत स्वतंत्र देश नहीं हो सकता। यह उनका गरीबों का स्वराज का सपना था। उसके लिए, अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता रास्ते में महज एक कदम थी।
  • गांधीवादी अर्थशास्त्र एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था की संकल्पना पर आधारित है जिसमे फ्वर्गय् का कोई स्थान नही है लेकिन इस तरह का गांधीवाद, मार्क्सवाद से भिन्न है। गाँधी का अर्थशास्त्र एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने की बात करता है जिसमें एक व्यक्ति किसी दूसरे का शोषण नही करता है। अर्थात गांधीवादी अर्थशास्त्र_ सामाजिक न्याय और समता के सिद्धांत पर आधारित है।
  • गाँधी जी का अर्थशास्त्र छोटे और श्रम प्रधान उद्योगों के पक्ष में है। गाँधी जी बड़ी-बड़ी मशीनों के विरोधी थे हालाँकि यह बात वर्तमान समय में थोड़ी कम सार्थक है। उनका मानना था कि एक निर्जीव मशीन कई मनुष्यों का काम करती है जिसके कारण समाज में बेरोजगारी बढ़ती है। गाँधी जी मानते थे कि यदि व्यक्ति को कम संसाधनों के साथ रहने की आदत पड़ जाये तो व्यक्ति की जिंदगी में कभी भी ‘कुछ कम नही पड़ता है’। वे मानते थे कि आवश्यकताएं मृग तृष्णा जैसी होतीं हैं और आवश्यकताओं को जितना बढ़ाया जाए उतनी ही बढ़ती जातीं हैं। उत्पादन का लक्ष्य समाज की आवश्यकता की पूर्ती होना चाहिए ना कि लाभ कमाना। गाँधी जी पूँजीवाद को पूर्णतया नष्ट नहीं करना चाहते थे बल्कि वे उसे समाज के लिए उपयोगी बनाना चाहते थे।

आगे की राह

  • निवेशकों की तुलना में सरकारों को अपने नागरिकों और श्रमिकों की बात सुननी चाहिए और उनकी देखभाल करनी चाहिए। उन्हें केवल उन निवेशकों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो नागरिकों और श्रमिकों की देखभाल कर सकते हैं। सरकारों को सलाह देने वाले अर्थशास्त्रियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि मनुष्य निवेशकों के लिए रिटर्न बनाने के लिए उपकरण नहीं हैं बल्कि, पैसा इंसानों के लिए लाभ पैदा करने का एक उपकरण है।
सामान्य अध्ययन पेपर-1
  • Topic: स्वतंत्रता के पश्चात् देश के अंदर एकीकरण और पुनर्गठन।