कोविड-19: भारतीय महानगरों के लिए चुनौती - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

चर्चा का कारण

  • कोविड-19 संकट के दौरान महानगरों में संक्रमितों की संख्या में असामान्य वृद्धि देखने को मिली है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद देश COVID-19 के लगभग आधे मामलों के लिए उत्तरदायी हैं। कहीं न कहीं अनियोजित शहरीकरण कोरोना की प्रभावशीलता को और बढ़ा रहा है।

भारत की स्थिति

  • कोविड-19 महामारी के दौरान ऐसा देखने में आया है कि भारत के महानगरों में कोरोना संक्रमण की काफी भयानक स्थिति देखने को मिल रही है। दिल्ली, चेन्नई, बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद और कोलकाता जैसे महानगरों में कोरोना से संक्रमित व्यत्तिफ़यों की संख्या पूरे भारत का लगभग 50% समेटे हुए है।
  • ध्यातव्य है कि 2018 में भारत का जन स्वास्थ्य खर्च, जीडीपी का 1.28% था। विश्व बैंक के अनुसार, 2017 में भारत की 62.4% जनसंख्या ऐसी थी जिसके पास कोई स्वास्थ्य बीमा कवर नहीं था।
  • इसका तात्पर्य यह हुआ कि इनमें से कोई व्यत्तिफ़ बीमारी से ग्रसित होता है तो उसे इसका खर्च स्वयं वहन करना पड़ेगा।
  • विश्व बैंक के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर 2017 में आउट ऑफ पॉकेट स्वास्थ्य खर्च (out-of-pocket health expenditure) का प्रतिशत 18.2% था, जबकि भारत का 62.4% था।
  • आउट ऑफ पॉकेट स्वास्थ्य खर्च का तात्पर्य ऐसे स्वास्थ्य खर्च से है, जिसे जनता प्रत्यक्ष रूप से अपनी सेविंग (पॉकेट) से वहन करती है अर्थात जिस पर किसी भी प्रकार का स्वास्थ्य बीमा नहीं होता है।
  • भारत में डॉक्टर और जनसंख्या का अनुपात 1:1457 है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसे 1:1000 होना चाहिए।

महानगरों में संक्रमितों की संख्या में वृद्धि के कारण

  • 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत यह प्रावधान किया गया है कि जिस महानगर की जनसंख्या 9 मिलियन से ज्यादा है वहां पर महानगरीय योजना समिति (एमपीसी) का गठन किया जाएगा।
  • जिसका कार्य केंद्र, राज्य और स्थानीय प्राथमिकताओं (यथा-स्वास्थ्य, शिक्षा आदि) में सामंजस्य स्थापित करना, स्थानीय स्तर पर होने वाले कार्यों के मसौदे को तैयार करना आदि होगा।
  • परन्तु इसके विपरीत यह देखने में आया कि अधिकांश महानगरों में महानगरीय योजना समिति का गठन नहीं किया गया है और यदि किया भी गया है तो वह अपने कर्तव्यों का वहन भली-भांति नहीं कर रही है।
  • एनुअल सर्वे ऑफ इंडिया सिटी सिस्टम (ASICS) की वार्षिक रिपोर्ट 2017 के अनुसार 18 में से 9 ऐसे शहर हैं जिन्होंने सिर्फ कागजों पर ही महानगरीय योजना समिति (एमपीसी) का गठन किया है।
  • यह भी देखा गया है कि नगरपालिका की शक्तियों और स्टाफ में भी कमी रहती है। नगरपालिका के पास राजस्व एकत्रित करने की बहुत ही क्षीण शक्तियाँ होती हैं, उदाहरण के लिए-
  • बेंगलुरु की नगरपालिका अपने खर्च का 47.9%, चेन्नई 30.5% और मुंबई 36.1% अपने आय से प्राप्त करते हैं तथा शेष केंद्र तथा राज्य सरकार से प्राप्त करते हैं। इस स्थिति मे नगर पालिकाओं की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
  • नगरपालिका के मेयर को कम शक्ति प्रदान की गईं हैं तथा उनका कार्यकाल भी छोटा होता है, यथा-मुम्बई में 2.5 वर्ष, दिल्ली में 1 वर्ष और बेंगलुरु में 1 वर्ष इत्यादि।
  • साथ ही राज्य सरकारों द्वारा नगरपालिका के कार्यक्षेत्रें में व्यापक स्तर पर हस्तक्षेप किया जाता है।
  • इसके अलावा स्थानीय स्तर पर कार्य करने वाली विभिन्न एजेंसियों के मध्य सामंजस्य स्थापित न होनासाथ ही पारदर्शिता, जवाबदेही, नागरिकों की सहभागिता का सुनिश्चित न होना भी महामारी वृद्धि के कारणों में शामिल है।
  • एनुअल सर्वे ऑफ इंडिया सिटी सिस्टम (ASICS) के मुताबिक, मुंबई महानगर पालिका में एक लाख जनसंख्या पर लगभग 938 नगरपालिका अधिकारी हैं जो काफी कम संख्या है। वैश्विक स्तर पर देखें तो जोहान्स बर्ग में एक लाख जनसंख्या पर लगभग 2922 अधिकारी हैं तथा न्यूयॉर्क में एक लाख जनसंख्या पर 5446 अधिकारी हैं।
  • मैंकिन्स की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, अभी भारत के 54 महानगरों में भारत की जीडीपी का लगभग 40% प्राप्त होता है जो 2025 तक 69 महानगरों से जीडीपी के लगभग 50% से ज्यादा प्राप्त होने की सम्भावना है, फिर भी भारत में महानगर किसी भी विपदा से निपटने के लिए एक व्यवस्थित ढांचे का निर्माण नहीं कर रहे हैं।
  • इसके अतिरिक्त अन्य कारणों में मुंबई और दिल्ली की मलिन बस्तियां है ,जहां पानी की कमी है, वहां अपने हाथ धोना और शारीरिक दूरी कायम कर पाना ऐसी विलासिता है जिसे हर कोई वहन नहीं कर सकता।
  • हाल के वर्षों में भारतीय शहरों में आबादी के बढ़ते घनत्व के साथ वायु की गुणवत्ता का स्तर भी कम होता गया है। विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार सबसे खराब वायु प्रदूषण वाले दुनिया के 30 शहरों में से 21 शहर भारत में हैं। इन प्रदूषित शहरों में रहने वाले लोगों में विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं हैं।
  • जिन मेट्रो शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर सबसे खराब है उन शहरों में सबसे कमजोर इम्युनिटी है और यह सर्वविदित है कि कोरोना का सीधा संबंध हमारी इम्युनिटी से है, इस निष्कर्ष पर पहुंचना गलत नहीं कि वायु प्रदूषण के कारण कोरोनो वायरस से होने वाली मौतों का खतरा बढ़ सकता है।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार वायु प्रदूषण के लगातार संपर्क में आने से न केवल कोरोना वायरस की आशंका बढ़ती है, बल्कि अन्य प्रकार की बीमारी भी घातक हो जाती है।

उपाय

  • कोरोना संक्रमितों की संख्या में वृद्धि को रोकने के उपाय निम्नलििखत हो सकते हैं -
  • महानगरीय योजना समिति (एमपीसी) का गठन किया जाए। विश्व स्तर पर, महानगरीय शहरों को शासन में विखंडन को कम करने के लिए मजबूत तंत्र के साथ एक सीधे निर्वाचित नेता द्वारा संचालित किया जाता है।
  • विकसित उदाहरणों में टोक्यो महानगरीय सरकार और यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया में हाल के प्रायोगिक मॉडल जैसे संयुक्त प्राधिकरण शामिल हैं। भारत को वैश्विक संदर्भों से संस्थागत डिजाइन उसके संदर्भ और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुकूल घरेलू समाधान की आवश्यकता है।
  • शहरी गरीबी को दूर करने के प्रयास करने के साथ-साथ स्वच्छता व स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। इस सन्दर्भ में स्वास्थ्य नीति 2017 विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगी।
  • किसी भी महामारी से निपटने के लिए स्थानीय स्तर की संस्थाओं का चहुमुखी सशक्तिकरण करना चाहिए। नगरपालिका में स्टाफ की संख्या में वृद्धि करने पर ध्यान देना होगा।
  • हालाँकि शहरी शासन की आर्थिक स्वायत्तता बढ़ाने हेतु मुन्सिपल बांड का आरम्भ किया गया है, फिर भी इसके कार्यान्वयन में सुधार की आवश्यकता है।
  • मेयर तथा मुख्यमंत्री के अलग राजनैतिक दल का होने से गतिरोध बढ़ जाता है अतः सहयोगी तथा प्रतिस्पर्धी उप संघवाद के तत्वार्थ की प्राप्ति हेतु आवश्यक है कि शहरी क्षेत्रें से राज्य सरकार के नियंत्रण को संविधान द्वारा विनियमित किया जाये।

आगे की राह

  • पारदर्शिता, जन-सहभागिता आदि जैसे स्मार्ट गवर्नेंस के तत्वों को बढ़ावा देना होगा और एक ऐसी सभा या संगठन को स्थापित करना चाहिए, जहां पर आमजन अपनी शिकायतों को आसानी से दर्ज करा सकें।
  • नगरपालिका के मेयर की शक्तियों को बढ़ाने तथा उसके कार्यकाल को कम से कम 5 वर्ष करने पर ध्यान देना चाहिए।
  • स्थानीय स्तर पर कार्य करने वाली विभिन्न एजेंसियों के मध्य सामंजस्य स्थापित करके एक-दूसरे के सहयोग हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • COVID-19 द्वारा उत्पन्न चुनौतियाँ भविष्य में जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं आदि के विभिन्न अन्य खतरों की एक झलक पेश करती हैं, जो भारतीय शहरों को और अधिक तनावग्रस्त करेंगी। यह समय है जब केंद्र और राज्य सरकारें एक महानगरीय प्रशासन प्रतिमान की दिशा में प्रयास करें।
  • सर्वप्रथम सरकार द्वारा पाँच साल के कार्यकाल, विकेन्द्रीकृत वार्ड स्तर के शासन के साथ सशक्त मेकर्स और अंतर-एजेंसी समन्वय शामिल करना आवश्यक है उसके उपरान्त प्रशासनिक क्षमता की बढ़ाना होगा। भारत को वर्तमान महामारी का उपयोग आत्मनिरीक्षण करने के अवसर के रूप में करना चाहिए।

सामान्य अध्ययन पेपर-2
  • द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/ अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले समझौते।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • भारत और चीन के बीच के मतभेदों के समाधान में आरआईसी किस प्रकार सहायक हो सकता है? टिप्पणी करें