यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षा के लिए ब्रेन बूस्टर (विषय: आभासी न्यायालयों को जारी रखने के लिये विधि पैनल की सिफारिश (Recommendation of Law Panel to Continue Virtual Courts)

यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षा के लिए ब्रेन बूस्टर (Brain Booster for UPSC & State PCS Examination)


यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षा के लिए करेंट अफेयर्स ब्रेन बूस्टर (Current Affairs Brain Booster for UPSC & State PCS Examination)


विषय (Topic): आभासी न्यायालयों को जारी रखने के लिये विधि पैनल की सिफारिश (Recommendation of Law Panel to Continue Virtual Courts)

आभासी न्यायालयों को जारी रखने के लिये विधि पैनल की सिफारिश (Recommendation of Law Panel to Continue Virtual Courts)

चर्चा का कारण

  • हाल ही में राज्यसभा सांसद भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में कानून और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने कोविड 19 के पश्चात भी आभासी अदालतों के निरंतर उपयोग की सिफारिश की है। समिति ने सुझाव दिया है कि आभासी न्यायालयों (Virtual Courts) की कार्यवाही को जारी रखने के लिए विशेष रूप से जिला अदालतों में बुनियादी ढांचे को उन्नत करने की आवश्यकता है।

प्रमुख सुझाव

  • कानून और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने कहा कि अदालत, एक स्थान से अधिक, एक सेवा (more a service than a place) है। अधिवक्ताओं को फ्बदलते समय के साथ तालमेलय् रखना होगा क्योंकि प्रौद्योगिकी के माध्यम से न्याय सस्ता और सुलभ होगा।
  • इसके अलावा आभासी न्यायालयों की मदद से स्थानीय और आर्थिक बाधाओं को दूर कर गवाही प्रदान करने वाले कमजोर गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आभासी न्यायालय लंबित मामलों की प्रक्रियाओं में तेजी लाने और पारंपरिक न्यायालयों में सुधार के रूप बेहतरीन कार्य कर सकता है।
  • संसदीय पैनल ने तर्क दिया है कि कुछ मामलों की श्रेणी जैसे ट्रैफिक चालान या अन्य छोटे अपराधों से संबंधित मामले, नियमित अदालती प्रतिष्ठानों से आभासी अदालतों में स्थानांतरित करने से मामलों को जल्द से जल्द सुलझाया जा सकता है। वर्तमान में 30 मिलियन मामले लंबित हैं। ऐसे में नवीनतम तकनीक के माध्यम से आभासी न्यायालय की कार्यवाही जारी रखी जानी चाहिये।
  • पैनल ने सुझाव दिया कि देश भर में विभिन्न अपीलीय न्यायाधिकरण जैसे TDSAT, IPAB, NCLT में स्थायी रूप से अपनाया जा सकता है, जिसमें पक्षों/ अधिवक्ताओं की व्यक्तिगत उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होती है।

आभासी न्यायालय क्या हैं?

  • ई-कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये जेल परिसर से ही अपराधियों की पेशी और उनके मामले में सुनवाई की जाती है । यदि कोई अपराधी दूसरे राज्य अथवा शहर की जेल में बंद है और मामले की सुनवाई स्थानीय कोर्ट में चल रही है, तो वहाँ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा होने पर सीधे सुनवाई हो सकती है।
  • ई-कोर्ट परियोजना की परिकल्पना ‘भारतीय न्यायपालिका में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के कार्यान्वयन के लिये राष्ट्रीय नीति एवं कार्ययोजना-2005’ के आधार पर की गई थी।

आभासी अदालतों के समक्ष चुनौतियाँ

  • आभासी अदालतों के संदर्भ में जानकारों ने जो मूलभूत तर्क दिए हैं उनमें से एक सीमित संसाधन है। बार एसोशिएशन का मानना है कि भारत में 50 प्रतिशत अधिवक्ताओं के पास डिजिटल सुनवाई में भाग लेने के लिए कंप्यूटर या लैपटाप नहीं है।
  • भारत की डिजिटल पैठ की बात करें तो लाखों भारतीयों के पास अभी भी इंटरनेट नहीं है, यद्यपि भारत के शहरी केंद्र कनेक्टिविटी और गति की उच्च दरों से लाभान्वित होते हैं, लेकिन छोटे शहरों और क्षेत्रीय क्षेत्रें में सीमित इंटरनेट के कारण ऑनलाइन कार्यवाही में भाग लेने के लिये इंटरनेट की आवश्यक न्यूनतम गति 2mbps @ sec भी उपलब्ध नहीं हो पाती है।
  • देश भर में सिर्फ 3,477 अदालतों में ऐसी सुविधाएं हैं जो आभासी कार्यवाही को सक्षम बनाती हैं जबकि 14,443 अदालतों में ऐसी सुविधाएं मौजूद नहीं हैं।
  • कुछ विश्लेष्कों का कहना है कि एक वकील जजों के मनोदशा को समझता है और शारीरिक सुनवाई के दौरान उन्हें अपने केस को समझाने का बेहतर प्रयास करता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई अधिवक्ताओं के साथ-साथ न्यायाधीशों पर भी मनोवैज्ञानिक दबाव डालती है, क्योंकि इसके माध्यम से दर्ज साक्ष्य जैसे-चेहरे के भाव, मुद्राओं और इशारों जैसे गैर-मौखिक संकेतों को विकृत किया जा सकता है। इसके अलावा आभासी अदालतें डेटा की गोपनीयता के साथ-साथ अदालती कार्यवाही की गोपनीयता से समझौता कर सकती हैं।

आगे की राह

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग कर वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) तंत्र को भी अदालत की कार्यवाही में शामिल करने की आवश्यकता है। गौरतलब है कि ADR असहमत पक्षों को मुकदमेबाजी की प्रक्रिया में पड़े बिना किसी विवाद के समाधान हेतु स्थापित तंत्र है।