यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षा के लिए ब्रेन बूस्टर (विषय: गुजरात का भालिया गेहूं (Gujarat's Bhalia Wheat)

यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षा के लिए ब्रेन बूस्टर (Brain Booster for UPSC & State PCS Examination)


यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षा के लिए करेंट अफेयर्स ब्रेन बूस्टर (Current Affairs Brain Booster for UPSC & State PCS Examination)


विषय (Topic): गुजरात का भालिया गेहूं (Gujarat's Bhalia Wheat)

गुजरात का भालिया गेहूं (Gujarat's Bhalia Wheat)

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में जीआई (भौगोलिक संकेतक) प्रमाणित गुजरात के भालिया गेहूं का निर्यात किया गया है।

मुख्य बिन्दु

  • गेहूं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में जीआई (भौगोलिक संकेतक) प्रमाणित भालिया किस्म के गेहूं की गुजरात से केन्या और श्रीलंका को निर्यात की गई है।
  • इस पहल से भारत से गेहूं निर्यात को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
  • उल्लेखनीय है कि वित्तीय वर्ष 2020-21 में, भारत से 4034 करोड़ रुपये का गेहूं निर्यात किया गया था, जो कि उसके पहले की वर्ष की तुलना में 808 फीसदी ज्यादा था। उस अवधि में 444 करोड़ रुपये का गेहूं निर्यात किया गया था।
  • भारत ने वर्ष 2020-21 के दौरान यमन, इंडोनेशिया, भूटान, फिलीपींस, ईरान, कंबोडिया और म्यांमार जैसे 7 नए देशों को पर्याप्त मात्रा में इस गेहूं का निर्यात किया था।
  • जीआई प्रमाणित भालिया गेहूं की इस वित्तीय वर्ष (2021-22) में अधिक निर्यात होने की संभावना है।

भालिया गेहूं के बारे में

  • इस जीआई प्रमाणित भालिया गेहूं में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है और यह स्वाद में मीठा होता है।
  • जीआई प्रमाणित भालिया गेहूं की फसल प्रमुख रुप से गुजरात के भाल क्षेत्र में पैदा की जाती है। भाल क्षेत्र में अहमदाबाद, आनंद, खेड़ा, भावनगर, सुरेंद्रनगर, भरूच आदि जिले शामिल हैं।
  • इस गेहूं की किस्म की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि इसे बारिश के मौसम में बिना सिंचाई के उगाया जाता है और गुजरात में लगभग दो लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में इसकी खेती की जाती है।
  • गेहूं की भालिया किस्म को जुलाई, 2011 में जीआई प्रमाणन प्राप्त हुआ था। जीआई प्रमाणीकरण का पंजीकृत प्रोपराइटर आणंद कृषि विश्वविद्यालय, गुजरात है।

भौगोलिक संकेतक क्या है?

  • भौगोलिक संकेतक या जियोग्राफिकल इंडीकेशन का इस्तेमाल ऐसे उत्पादों के लिये किया जाता है, जिनका एक विशिष्ट भौगोलिक मूल क्षेत्र होता है। इन उत्पादों की विशिष्ट विशेषता एवं प्रतिष्ठा भी इसी मूल क्षेत्र के कारण होती है। इस तरह का संबोधन उत्पाद की गुणवत्ता और विशिष्टता का आश्वासन देता है।
  • दूसरे शब्दों में भौगोलिक चिन्ह या संकेत (जीआई) का शाब्दिक अर्थ है एक ऐसा चिन्ह, जो वस्तुओं की पहचान, जैसे कृषि उत्पाद, प्राकृतिक वस्तुएं या विनिर्मित वस्तुएं, एक देश के राज्य क्षेत्र में उत्पन्न होने के आधार पर करता है, जहां उक्त वस्तुओं की दी गई गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य कोई विशेषताएं इसके भौगोलिक उद्भव में अनिवार्यतः योगदान देती हैं। यह दो प्रकार के होते हैं-
  • ˆपहले प्रकार में वे भौगोलिक नाम हैं जो उत्पाद के उद्भव के स्थान का नाम बताते हैं जैसे शैम्पेन, दार्जीलिंग आदि।
  • दूसरे हैं गैर-भौगोलिक पारम्परिक नाम, जो यह बताते हैं कि एक उत्पाद किसी एक क्षेत्र विशेष से संबद्ध है जैसे अल्फांसो, बासमती, रोसोगुल्ला आदि।
  • जीआई टैग को औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण के लिये पेरिस कन्वेंशन के तहत बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) के एक घटक के रूप में शामिल किया गया है।

जीआई टैग से लाभ

  • जीआई टैग किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले उत्पादन को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।
  • जीआई टैग के द्वारा उत्पादों के अनधिकृत प्रयोग पर अंकुश लगाया जा सकता है।
  • यह किसी भौगोलिक क्षेत्र में उत्पादित होने वाली वस्तुओं का महत्व बढ़ा देता है।
  • जीआई टैग के द्वारा सदियों से चली आ रही परंपरागत ज्ञान को संरक्षित एवं संवर्धन किया जा सकता है।
  • जीआई टैग के द्वारा स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में मदद मिलती है।
  • इसके द्वारा टूरिज्म और निर्यात को बढ़ावा देने में मदद मिलती है।

विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के मुताबिक निम्न को जीआई टैग दिया जा सकता है

  • कृषि उत्पादों जैसे चावल, जीरा, हल्दी, नींबू आदि।
  • खाद्यान्न वस्तुओं जैसे रसगुल्ला, लड्डू, मंदिर के विशिष्ट प्रसाद आदि।
  • वाइन और स्पिरिट पेय_ जैसे शैम्पेन और गोआ के एल्कोहलिक पेय पदार्थ फेनी आदि।
  • हस्तशिल्प वस्तुएं (हैंडीक्राफ्रट्स)_ जैसे मैसूर सिल्क, कांचीवरम सिल्क तथा इसके साथ ही मिट्टी से बनी मूर्तियां (टेराकोटा) और औद्योगिक उत्पाद।