यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षा के लिए ब्रेन बूस्टर (विषय: संदिग्ध मतदाता अथवा डी-वोटर (Doubtful Voter or D-voter)

यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षा के लिए ब्रेन बूस्टर (Brain Booster for UPSC & State PCS Examination)


यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षा के लिए करेंट अफेयर्स ब्रेन बूस्टर (Current Affairs Brain Booster for UPSC & State PCS Examination)


विषय (Topic): संदिग्ध मतदाता अथवा डी-वोटर (Doubtful Voter or D-voter)

संदिग्ध मतदाता अथवा डी-वोटर (Doubtful Voter or D-voter)

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में असम के छह हिरासत केन्द्रों (detention centres) में से एक हिरासत केन्द्र में बचे अंतिम व्यक्ति को रिहा कर दिया गया है। हालांकि अभी अन्य पांच हिरासत केंद्रों में बंद लगभग 170 व्यक्तियों को रिहा किया जाना बाकी है।

पृष्ठभूमि

  • 2015 में मनिंद्र दास को ‘डी-वोटर’ (D-voter) अथवा संदिग्ध मतदाता के रूप में चिह्नित किया गया था और बाद में एक विदेशी अधिकरण (Foreigners' Tribunal) द्वारा एकतरफा निर्णय में उन्हे ‘विदेशी’ (foreigner) घोषित किया गया था। वह दक्षिणी असम की बराक घाटी में सिलचर सेंट्रल जेल के भीतर नजरबंदी केंद्र में बंद थे।

संदिग्ध मतदाता अथवा डी-वोटर

  • भारत निर्वाचन आयोग ने 1997 में ‘संदिग्ध मतदाता’ प्रणाली पेश की थी। यह ऐसे लोगों की सूची होती है जो अपनी भारतीय नागरिकता के पक्ष में सबूत नहीं पेश कर पाते। असम के अलावा यह सूची देश के किसी भी हिस्से में नहीं है।
  • असम में ‘राष्ट्रीय नागरिक पंजी’ (National Register of Citizens– NRC) को तैयार करने के दौरान जिन व्यक्तियों की नागरिकता संदेहास्पद थी या जो व्यक्ति नागरिकता प्रमाण-पत्रों को पेश नहीं कर पाया था, उन्हें ‘डी-वोटर’ के रूप में वर्गीकृत कर दिया गया था।
  • ‘डी’ वोटर असम की मतदाता सूची में बने रहते हैं, किन्तु वे तब तक चुनाव में मतदान नहीं कर सकते जब तक कि उनके मामले का फैसला विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा नहीं कर दिया जाता है। गौरतलब है कि वर्ष 2019 में संपन्न लोकसभा चुनावों में लगभग 1.2 लाख ‘डी’ वोटर्स ने भाग नहीं लिया।
  • ‘संदिग्ध मतदाता’ या ‘संदिग्ध नागरिकता’ को नागरिकता अधिनियम, 1955 या नागरिकता नियम 2003’ में भी परिभाषित नहीं किया गया है।

विदेशी अधिकरण

  • फॉरेनर्स एक्ट 1946 और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ऑर्डर 1964 के मुताबिक, किसी भी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने का अधिकार केवल फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पास ही है।
  • फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल अर्ध-न्यायिक निकाय हैं। विदेशी अधिनियम 1946 (Foreigners Act 1946) और विदेशी (ट्रिब्यूनल) के आदेश 1964 (Foreigners (Tribunals) 1964) के प्रावधानों के तहत केवल विदेशी ट्रिब्यूनल को ही किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने का अधिकार है।
  • फॉरेनर एक्ट, 1946 की धारा 3 में यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि केंद्र सरकार आदेश द्वारा विदेशियों के भारत में प्रवेश को निषिद्ध या विनियमित या प्रतिबंधित कर सकती है। इसी धारा 3 में दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए ही भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 23 सितंबर 1964 को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ऑर्डर 1964 जारी किया था।

घोषित विदेशी एवं उसके अधिकार

  • फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में नागरिकता को सिद्ध करने का भार बॉर्डर पुलिस द्वारा अवैध अप्रवासी घोषित किए गए व्यक्ति पर ही होता है। इसलिए शक की स्थिति में किसी को अपनी नागरिकता साबित करना बहुत मुश्किल हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो घोषित विदेशी’ वे व्यक्ति होते हैं, जो राज्य बार्डर पुलिस द्वारा अवैध अप्रवासी के रूप में चिह्नित किए जाने पर अपनी नागरिकता का प्रमाण देने में विफल रहते है, इस प्रकार के प्रकरण को बार्डर पुलिस फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को संदर्भित कर देती है।
  • फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल, भारतीय साक्ष्य अधिनियम का प्रयोग चयनात्मक तरीके से करता है। ग्राम प्रधान द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र, स्कूल के प्रमाण पत्र, निकाहनामा और गांव पंचायत द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र को प्राइवेट दस्तावेज माने जाने के कारण इन सभी को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 61 से 65 के अंतर्गत ग्राह्य (ऐडमिसिबल) नहीं माना जाता है।
  • विदेशी (अधिकरण) संशोधन आदेश, 2019 के अनुसार सभी व्यक्तियों को अधिकरणों में अपील करने का अधिकार प्रदान किया गया है। इससे पूर्व केवल राज्य प्रशासन ही किसी संदिग्ध के विरुद्ध विदेशी अधिकरण में याचिका दायर कर सकता था।