यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम: पेपर - IV (सामान्य अध्ययन-3: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन) - 15, जुलाई 2020


यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम (Answer Writing Practice for UPSC IAS & UPPSC/UPPCS Mains Exam)


मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम:

  • पेपर - IV: सामान्य अध्ययन- III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

प्रश्न - ‘‘स्पेस इंटरनेट’’ से आप क्या समझते हैं? ‘‘स्टारलिंक नेटवर्क प्रोजेक्ट’’ के महत्व का उल्लेख करते हुए इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर:

  • परिचय - स्पेस इंटरनेट क्या हैं?
  • मुख्य भाग
  • स्टारलिंक प्रोजेक्ट का महत्व
  • स्टारलिंक प्रोजेक्ट के समक्ष आने वाली चुनौतियां
  • निष्कर्ष

स्पेस इंटरनेट

अंतरिक्ष आधारित इंटरनेट प्रणाली, वास्तव में कई वर्षो से प्रयोग की जा रही है परन्तु यहप्रणाली अभी तक कुछ ही उपयोगकर्त्ताओं तक सीमित थी। वर्तमान में अधिकांश सिस्टम भू-स्थैतिक कक्षा में उपग्रहों का उपयोग करते हैं। कंपनी की प्रस्तावित योजना के अन्तर्गत, पृथ्वी से करीब 280 किलोमीटर की ऊंचाई पर इन सैटेलाइटों को स्थापित किया जाएगा, इन्हें निर्धारित कक्षा में स्थापित करने के समय मार्ग में आने वालीकी तकनीकी अड़चनों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। दुनिया भर में आबादी वाले इलाकों तक इंटरनेट पहुँचाने के लिए इस तरहके उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, उसके पश्चात् इन सभी की नेटवर्किग की जायेगी जिससे नेटवर्क की समस्या का समाधान हो जाएगा।

महत्व

  • वर्तमान में, लगभग 4 बिलियन लोग विश्वसनीय इंटरनेट नेटवर्क तक पहुँच नहीं रखपाते हैं। इस प्रोजेक्टके पश्चात् लेागों की इंटरनेट तक पहुँच में वृद्धि होगी। क्योंकि कई दूरदराज के क्षेत्रों में स्थाई टॉवर लगाना संभव नहीं है ऐसे में अंतरिक्ष में उपग्रहों के संकेत के माध्यम से इन बाधाओं को समाप्त करने में सहायता मिलेगी।
  • कुछ सैटेलाइट पहले से ही अंतरिक्ष में स्थापित कर दिये गये हैं। अगले चरण में पूरी दुनिया के लिए इन्हीं सैटेलाइटों के माध्यम से इंटरनेट सेवा को प्रदान करने की योजना पर कार्य प्रारंभ हो जाएगा।
    स्पेस इन्टरनेट की मुख्य विशेषता इसका अबाध रूप से इंटरनेट प्रदान करने की क्षमता है।
  • स्पेस एक्स ऐजेंसी का कहना है कि यदि 60 में से किसी उपग्रह के साथ कोई समस्या हुई और वह पूर्व निर्धारित कक्षा में नहीं पहुँच पाया तो ऐसी स्थिति में उस खराब उपग्रह को वापस पृथ्वी के वातावरण में आने के निर्देश दिए जाएंगे, और वह बिना नुकसान पहुँचाए खुद ही जलकर समाप्त हो जाएगा। प्रत्येक उपग्रह में एक स्वचालित मशीन लगी हुई है जिससे वह अंतरिक्ष में पहुँचने के बाद वहां फैले कचरे से खुद को बचा सके।

चुनौतियां -

  • पृथ्वी से करीब 280 किलोमीटर की ऊंचाई पर इन सैटेलाइटों को स्थापित किया जाना है किन्तु उसी कक्षा में कई अन्य सैटेलाइट पहले से उपस्थिति हैं अतः इनके चक्कर काटने के दौरान एक सैटेलाइट से दूसरे के टकराने का भी खतरा है।
  • निचली कक्षामें कम ऊंचाई के कारण, उपग्रह के संकेत अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र को कवर करते हैं। परिणामस्वरूप ग्रह के हर हिस्से तक संकेतों को पहुँचाने के लिए कई उपग्रहों की आवश्यकता होगी।
  • इसके अतिरिक्त, इन कक्षाओं में उपग्रहों को गुरूत्वाकर्षण के प्रभाव को संतुलित करने के लिए उपग्रहों को 27000 किमी प्रति घंटे की गति से यात्रा करनी पड़ेगी।
  • वैज्ञानिकों तथा खगोलशास्त्रियों का मानना है कि मानव निर्मित सैटेलाइटों के प्रेक्षण से प्रकाश प्रदूषण का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

निष्कर्ष

अंतरिक्ष आधारित इंटरनेट प्रणाली अभी तक कुछ सरकारों तथा निजी अंतरिक्ष संस्थानों तक ही सीमित थी, इस प्रोजेक्ट के प्रारंभ होने से दूर दराज क्षेत्रों में भी इंटरनेट की पहुँच सुनिश्चित होगी, जिससे उन क्षेत्रों के विकास में सहयोग मिलेगा। परन्तु इस प्रोजेक्ट के बाद अंतरिक्ष में उपग्रहों के टकराव तथा अंतरिक्ष प्रदूषण में वृद्धि होगी, अतः इसके नकारात्मक तथ्यों के समाधान का भी प्रयास किया जाना आवश्यक है।

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