यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम: पेपर - IV (सामान्य अध्ययन-3: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन) - 11, जुलाई 2020


यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम (Answer Writing Practice for UPSC IAS & UPPSC/UPPCS Mains Exam)


मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम:

  • पेपर - IV: सामान्य अध्ययन- III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

प्रश्न - डिजिटल डेमोक्रेसी या ई -डेमोक्रेसी ने आप क्या समझते हैं? डिजीटल डेमोक्रेसी के लाभ तथा चुनौतियों की संक्षेप में चर्चा कीजिए! (250 शब्द)

मॉडल उत्तर:

  • चर्चा में क्यों है?
  • परिचय-डिजीटल डेमोक्रेसी या ई-डेमोक्रेसी क्या है?
  • मुख्य भागः
  • डिजीटल डेमोक्रेसी के लाभ।
  • डिजीटल डेमोक्रेसी की चुनौतियां।
  • निष्कर्ष

चर्चा में क्यों है?

हाल के कुछ वर्षों में इन्टरनेट ने भारत के सामाजिक आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन में परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

डिजीटल डेमोक्रेसी या ई-डेमोक्रेसी क्या है?

  • डिजीटल लोकतंत्र को ई—डेमोक्रेसी या इंटरनेट लोकतंत्र के रूप में भी जाना जाता है। यह सरकार का एक रूप है, जिसमें सभी वयस्क नागरिकों को प्रस्ताव, विकास और कानूनों के निर्माण में समान रूप से भाग लेने के लिए पात्र माना जाता है। भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सूचना क्रांति की आवश्यकता है।

डिजीटल डेमोक्रेसी के लाभ

  • सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि, इंटरनेट की मदद से लोगों का सशक्तिकरण हुआ है। तथा उन्हें पूर्व की अपेक्षा अधिक राजनीतिक भागीदारी प्राप्त हुई है।
  • डिजीटलीकरण के कारण ही आज, पूर्व की अपेक्षा लोग अपनी बातों को अधिक सहजता तथा मजबूती के साथ रख पाते है
  • इंटरनेट के माध्यम से आज वो लोग भी राजनीति में भागीदार ले रहे हैं, जिनकी समाज में सामान्यतः अनदेखी होती आई है।
  • आज हर इंसान बड़ै पैमान पर ऑनलाइन डेटा निर्मित कर रहा है, जिसमे मशीन लर्निंग की मदद से ज्यादा से ज्यादा जानकारी को प्रोसेस किया जा सकता है।
  • फैसले की प्रक्रिया में इंटरनेट का प्रयोग बढ़ता जा रहा है आज सरकारी क्षेत्र की विभिन्न योजनायें, वजीफे से लेकर आर्थिक मदद तक में इसका प्रयोग हो रहा है।

डिजीटल डेमोक्रेसी की चुनौतियां

  • सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति के अनुसार विज्ञापन तैयार करना और इनकी नेटवर्क संरचना के लिए जोखिम भरा है, इससे एक तरह का गिरोह तैयार होने का डर रहता है।
  • तकनीकी कंपनियाँ और सोशल मीडिया प्लेटफार्म, वैसी सामग्री को फिल्टर कर देते है, जिन्हें कोई शख्स देखना पसंद नहीं करता है । इसका परिणाम यह होता है कि इन्हें प्रयोग करने वालों को वही दिखता है, जिससे उनके विचार मेल खाते हैं।
  • विश्व स्तर पर सभी देश ऐसे उपाय अपना रहे हैं जिससे इंटरनेट की दुनिया में लोगों को अजनबी बनकर कार्य करने में समस्या आती है। इसके लिए सरकारें एनक्रिप्शन पर पाबंदी लगा रही हैं। यानी लोग गुप्त संदेशों का आदान—प्रदान नहीं कर सकते हैं।
  • नई—नई तकनीकें सरकार को ऑनलाइन दुनिया पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के नए- नए तरीके उपलब्ध कराती हैं। इनके साथ—साथ बड़ी तकनीकी कंपनियां जैसे—फेसबुक, गूगल, एप्पल और अमेजन भी बाजार में और अधिक सियासी तौर पर मजबूत हो रही हैं। ऐसे में नियामक संस्थाओं को लिए इन कंपनियों की बढ़ती ताकत पर काबू पाना मुश्किल होता जा रहा है, जो एक प्रमुख चुनौती है।

निष्कर्ष

लोकतंत्र का मतलब केवल हर व्यक्ति की अभिव्यक्ति या बहुसंख्यकों द्वारा फैसला लेना भर नहीं है। गौरतलब है कि किसी भी वेबसाइट पर मौजूद सामग्री के लिए उसी प्लेटफार्म को जिम्मेदार बनाने के लिए जो नई नीतियां बनाई जा रही हैं, वह इस दिशा में उठाया गया एक सकारात्मक कदम है। फ्रांस ने रेपिड रिस्पान्स लॉ बनाया है, जिसमें तकनीकी कंपनियों के लिए कानून और व्यवस्था के लिए काम करने वाली संस्थाओं के साथ सहयोग करना जरूरी बना दिया गया है।

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