यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम: पेपर - III (सामान्य अध्ययन-2: शासन व्यवस्था, संविधान शासन-प्रणाली, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध) - 17, जुलाई 2020


यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम (Answer Writing Practice for UPSC IAS & UPPSC/UPPCS Mains Exam)


मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम:

  • पेपर - III: सामान्य अध्ययन- II: शासन व्यवस्था, संविधान शासन-प्रणाली, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

प्रश्न - सार्वजनिक प्राधिकरण से आप क्या समझते है? आर टी आई अधिनियम की परिधि में मुख्य न्यायधीश के कार्यालय को सम्मिलित किये जाने के संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर टिपप्णी कीजिए। (शब्द 250)

मॉडल उत्तर:

  • परिचय - सार्वजनिक प्राधिकरण को परिभाषित कीजिए।
  • मुख्य भाग
  • भारत के मुख्य न्यायधीश के कार्यालय से संबंधित हालिया निर्णय का उल्लेख कीजिए।
  • निर्णय के निहितार्थ
  • निष्कर्ष - संतुलित निष्कर्ष

सार्वजनिक प्राधिकरण की परिभाषा -

सार्वजनिक प्राधिकरण को सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धारा-2 (एच) में परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार, सार्वजनिक प्राधिकरण या लोक प्राधिकरण का अर्थ - वह कोई भी प्राधिकरण या संस्था जिसकी स्थापना या गठन निम्नलिखित के आधार पर किया गया हो -

  • संविधान द्वारा या उसके अधीन। या
  • संसद द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून द्वारा। या
  • राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून द्वारा।
  • या सरकार द्वारा किसी अधिसूचना या आदेश द्वारा किया गया हो।
  • सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण में या सरकार द्वारा वित्तपोषित संस्थायें।
  • अथवा कोई गैर सरकारी संस्थान जिसे सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वित्त पोषित किया गया हो। के आधार पर किया गाय हो, को सार्वजनिक प्राधिकरण कहा जायेगा

भारत के मुख्य न्यायधीश कार्यालय से संबंधित हालिया निर्णय

  • मुख्य न्यायधीश कार्यालय को सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में लाने के लिए कई वर्षों से बहस चल रही थी।
  • यह प्रतिवाद एक आर टी आई एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल द्वारा2007 में आर टी आई डालकर जजों की संपत्ति का ब्योरा मांगने से प्रारंभ हुआ था।जब सुभाष चंद्र अग्रवाल को आर टी आई से जानकारी नहीं मिली तो उन्होंने सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन का रूख किया। सेंट्रल इंफॉमेशन कमीशन ने कहा कि आर टी आई में मांगी गई जजों की संपत्ति की जानकारी सुभाष चन्द्र अग्रवाल को दी जानी चाहिए।
  • सेंट्रल इंफॉमेशन कमीशन (सी. आई. सी.) के इस फैसले को दिल्ली हाइकोर्ट में चुनौति दी गई। लेकिन दिल्ली हाइर्कोट ने भी सी. आई. सी. के फैसले को बरकरार रखा। परन्तु पुनः सर्वोच्च न्यायालय में इस फैसले के खिलाफ अपील की गई।
  • अन्त में, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि, मुख्य न्यायधीश (CJI) का कार्यालय सूचना के अधिकार के अन्तर्गत आता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा है कि, भारत के मुख्य न्यायधीश (CJI) का कार्यालय ‘‘एक सार्वजनिक प्रधिकरण है’’। और यह सर्वोच्च न्यायालय संस्था का एकअभिन्न अंग है, इसलिए यदि सर्वोच्च न्यायालय एक सार्वजनिक प्राधिकरण है तो भारत के मुख्य न्यायधीश का कार्यालय भी एक सार्वजनिक प्राधिकरण माना जायेगा।

निर्णय के निहितार्थ -

  • भारत के मुख्य न्यायधीश का कार्यालयसंविधान के अनुच्छेद 124 के तहत स्थापित किया गया था। संविधान के अन्तर्गत बनाया गया, कोई भी प्राधिकरण स्वतः एक सार्वजनिक प्राधिकरण बन जाता है।
  • बहुत से विद्वान इस बात की आलोचना करते आये हैं कि, सी जे आई कार्यालय इतने लंबे समय तक आर टी आई की परिधि से बाहर कैसेरखा गया है अर्थात् संविधान के अर्न्तगत स्थापित होने के बाद भी इसे लम्बे समय तक आर टी आई में सम्मिलित क्यों नहीं किया गया।
  • सी जे आई कार्यालय द्वारा आर टी आई की परिधि के अन्तर्गत सार्वजनिक प्राधिकरण के रूप में सम्मिलित होने का विरोध करना, एक दुर्भाग्यपूर्ण कदम था।
  • न्यायधीश का पद एक संवैधानिक पद है और इस पद पर वो एक सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन करते हैं। अतः न्यायपालिका का भाग होने के कारण सी जे आई का कार्यालय सार्वजनिक प्राधिकरण से अलग नहीं हो सकता है।
  • कई आलोचकों का तर्क है कि यह निर्णय सी जे आई के कार्यालयकी गोपनीयता को बाधित करेगा।
  • यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि भारत के मुख्य न्यायधीश के कार्यालय की जानकारी देने का निर्णय पारदर्शिता के साथ संतुलित भी होना चाहिए।
  • निर्णय में यह भी कहा गया है कि पारदर्शिता न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर नहीं करती है, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही साथ-साथ चलती है।
  • आर टी आई को निगरानी के एक उपकरण के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है क्योंकि पारदर्शिता के साथ न्यायिक स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना चाहिए।

निष्कर्ष:-

आर टी आई अधिनियम को एक शक्तिशाली हथियार के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। यह जवाबदेही तथा नागरिक सक्रियता प्रदान करता है जिसके फलस्वरूप सहभागी लोकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। उच्चतम न्यायालय के निर्णयसेपारदर्शिता को बढ़ावा मिलता है। उच्चतम न्यायालय का निर्णय पारदर्शिता को बढ़ावा देता है। तथा आर टी आई अधिनियम की परिधि में सी जे आई कार्यालय को सम्मिलित करने से कार्यालय की पारदर्शिता में वृद्धि होगी, जिससे लोगों के विश्वास में बढ़ोतरी होगी।